लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल के बीच अगर किसी बात को लेकर विवाद हो जाए और दोनों अलग होने का फैसला कर लें, तो ऐसी स्थिति में महिला के अधिकार क्या होंगे? क्या वह अपने पार्टनर की संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए? या फिर लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के अधिकार शादीशुदा महिलाओं से अलग होने चाहिए? ये ऐसे सवाल हैं, जिन पर अब कानूनी और सामाजिक स्तर पर चर्चा हो रही है.
महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर गठित समिति ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े नियमों पर लोगों की राय मांगी है. समिति के सवालों में खास तौर पर यह मुद्दा शामिल है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को रिश्ते के टूटने की स्थिति में आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए या नहीं. इसके तहत गुजारा भत्ता और संपत्ति में अधिकार जैसे सवाल काफी अहम है.
लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को हर परिस्थिति में गुजारा भत्ता मिलने का स्वतः अधिकार नहीं है, लेकिन कानून कुछ परिस्थितियों में उसे आर्थिक सहायता दिला सकता है.
लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं के कानूनी अधिकार
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत ऐसी महिला राहत मांग सकती है, यदि उसका रिश्ता कानून की नजर में विवाह की प्रकृति का संबंध मानने योग्य हो. इस कानून के तहत परिस्थितियों के आधार पर महिला अपने लिए आर्थिक राहत, भरण पोषण, निवास से जुड़ी सुरक्षा और अन्य कानूनी सहायता मांग सकती है. हालांकि केवल लिव-इन रिलेशनशिप में रहने से ही गुजारा भत्ता मिलने की गारंटी नहीं हो जाती.
कोर्ट रिश्ते की प्रकृति, साथ रहने की परिस्थितियों और मामले से जुड़े अन्य तथ्यों को देखती है. लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को अपने पार्टनर की संपत्ति में केवल साथ रहने के आधार पर अपने आप मालिकाना हक नही मिल जाता. संपत्ति का अधिकार इस बात पर निर्भर कर सकता है कि संपत्ति किसके नाम पर है, उसे किसने खरीदा है, महिला का उसमें कोई कानूनी या आर्थिक हित है या नहीं और मामले के अन्य तथ्य क्या है.
गुजारा भत्ता और संपत्ति में हिस्सेदारी दो अलग कानूनी अधिकार हैं
हालांकि महिला को कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में साझा घर मे रहने का अधिकार या अन्य राहत मिल सकती है. लेकिन साझा घर मे रहने का अधिकार और पार्टनर की संपत्ति का मालिकाना हिस्सा मिलना दो अलग-अलग बातें है. इसलिए गुजारा भत्ता और संपत्ति में हिस्सेदारी को एक ही तरह का अधिकार नहीं माना जा सकता. समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विभिन्न समुदायों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और परिवार से जुड़े कुछ मामलों में समान कानूनी प्रावधानों की संभावना पर विचार करना है.
लिव-इन रिलेशनशिप के मामले में सवाल यह है कि ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं को किस हद तक कानूनी और आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए. यदि किसी महिला ने लंबे समय तक अपने पार्टनर के साथ जीवन बिताया है, घरेलू जिम्मेदारियां निभाई है या आर्थिक रूप से उसपर निर्भर रही है, तो रिश्ता टूटने के बाद उसकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए?
दूसरी ओर संपत्ति के अधिकार तय करते समय मालिकाना हक, आर्थिक योगदान और संबंधित व्यक्तियों के कानूनी अधिकारों को किस तरह संतुलित किया जाए? ये ऐसे मुद्दे है, जिनपर स्पष्ट नियमों की जरूरत.महसूस की जा रही है. अब महाराष्ट्र की यूसीसी समिति के सामने मूल सवाल यह है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को रिश्ते के टूटने पर कितनी आर्थिक और कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए.
क्या उन्हें गुजारा भत्ता देने के लिए स्पष्ट प्रावधान होने चाहिए? क्या लंबे समय तक रहने या घरेलू जिम्मेदारियों में योगदान देने की स्थिति में संपत्ति से जुड़े अधिकार भी तय किए जाने चाहिए?
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-भारत एक्सप्रेस
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