संस्कृत साहित्य के शिखर पुरुष और ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ जैसी अमर कृतियों के रचनाकार महाकवि कालिदास के जीवन से जुड़े कई पन्ने आज भी इतिहास के पन्नों में धुंधले पड़े हैं. वे कब और कहाँ पैदा हुए, उनका निजी जीवन कैसा था, जैसे सवाल सदियों से अनुत्तरित ही रहे हैं. अब इसी अनछुए सफर और जिज्ञासा को शांत करने के लिए एक नया उपन्यास ‘कहो कालिदास!’ पाठकों के सामने आया है.
दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एक खास कार्यक्रम के दौरान इस ऐतिहासिक कथा-पुस्तक का लोकार्पण किया गया. केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस किताब का विमोचन करते हुए इसकी जमकर सराहना की. उनका कहना था कि यह एक लेखक द्वारा महाकवि के व्यक्तित्व को बिल्कुल नए नजरिए से गढ़ने का बेहद खूबसूरत प्रयास है. आने वाले समय में पाठक इस किताब के जरिए कालिदास को नए संदर्भों और आज के दौर की प्रासंगिकता के साथ समझ सकेंगे.
इस उपन्यास का नाम ही अपने आप में एक पुकार की तरह है ‘कहो कालिदास!’. लेखक युगल जोशी ने कालिदास की रचनाओं को आधार बनाकर उनके जीवन, प्रेरणाओं और उनके भीतर के कवि को तलाशने की कोशिश की है. असल में, कालिदास ने अपने बारे में बहुत ज्यादा लिखकर नहीं छोड़ा; उनकी रचनाएं ही उनका असली परिचय हैं. हालांकि, उनके नाम से जुड़ी ढेरों लोक-कथाएं और किंवदंतियां देश के कोने-कोने में मशहूर हैं.
लेखक ने इन्हीं किंवदंतियों और महाकवि के साहित्य को मिलाकर एक बेहद दिलचस्प कल्पना-प्रधान कहानी गढ़ी है. इस उपन्यास के पन्नों में आपको कालिदास की अनुभूतियों, प्रेम और विरह की गहराइयों के साथ-साथ उस दौर के समाज और राजनीति की झलक भी मिलेगी. उनकी सातों कालजयी रचनाओं की गूंज, प्रकृति प्रेम और मानवीय भावनाओं का ऐसा ताना-बाना बुना गया है कि पाठक भावनाओं के सागर में डूबता-उतराता महसूस करता है. यह महज किसी की जीवनी नहीं है, बल्कि साहित्य के जरिए जीवन को दोबारा जीने का एक नायाब तरीका है.
इस किताब के पीछे की शख्सियत बेहद दिलचस्प है. उत्तराखंड के एक दूर-दराज के गांव से ताल्लुक रखने वाले युगल जोशी ने आईआईटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर तक का लंबा शैक्षिक सफर तय किया है. एक लोक-सेवक के रूप में वर्तमान में वे नीति आयोग से जुड़े हुए हैं.
इससे पहले उनका उपन्यास ‘अग्निकाल’ (जो मलिक काफूर पर आधारित था) साहित्य जगत में काफी सराहा जा चुका है. पौराणिक कथाओं, मिथकों और इतिहास पर उनकी गहरी पकड़ है. ‘कहो कालिदास!’ उनकी उसी शोध-दृष्टि और जिज्ञासा का एक और बेहतरीन विस्तार है, जहां वे इतिहास और कल्पना के बीच एक बेहतरीन संतुलन साधते नजर आते हैं.
कालिदास पर पहले भी बहुत कुछ लिखा गया है चाहे वो शोध-ग्रंथ हों, आलोचनाएं हों या फिर लोक-कथाएं. लेकिन एक मुकम्मल उपन्यास के रूप में उनके जीवन को उनकी ही रचनाओं के धागों से पिरोना एक बड़ा और रोमांचक काम था.
‘कहो कालिदास!’ सिर्फ एक उपन्यास भर नहीं है, बल्कि यह महाकवि से संवाद करने और भारतीय ज्ञान-परंपरा को आधुनिक नजरिए से देखने का एक खुला बुलावा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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