Ganeshotsav 2025: गणेश चतुर्थी का पर्व पूरे देश में बड़े घूम-धाम से मनाया जा रहा है. चाहे उत्तर भारत हो या दक्षिण, हर राज्य में गणपति बप्पा के जयकारे गूंज रहे हैं. लेकिन जब बात आती है महाराष्ट्र की, तो गणेशोत्सव की भव्यता का अंदाजा वहीं जाकर लगाया जा सकता है. मुंबई का लालबाग के राजा जहां हर साल लाखों भक्तों दर्शन देते है, वहीं इस बार गुजरात के सूरत शहर ने भी देशभर का ध्यान खींच लिया है. वजह है 16 फीट ऊंची और 6 फीट चौड़ी ऐसी गणेश प्रतिमा, जो पूरी तरह टिशू पेपर से बनाई गई है.
यह अनूठी पहल ‘सरकार गणेश उत्सव मंडल’ ने की है. मंडल ने दावा किया है कि यह गुजरात की अब तक की सबसे बड़ी पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमा है. खास बात यह है कि इसे न तो प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से गढ़ा गया है और न ही पारंपरिक मिट्टी से, बल्कि 350 किलो टिशू पेपर का इस्तेमाल कर इसे आकार दिया गया है.
एक महीने की मेहनत से बनी अद्भुत प्रतिमा
मुंबई के 15 अनुभवी कारीगरों ने लगभग एक महीने की कठिन मेहनत के बाद इस प्रतिमा को तैयार किया. मूर्ति में बारीक से बारीक सजावट और शिल्पकारी इतनी शानदार है कि पहली नजर में किसी को भी यह यकीन करना मुश्किल होगा कि यह सिर्फ टिशू पेपर से बनी है. गणपति के आभूषणों से लेकर उनकी मुद्रा तक हर पहलू को बड़ी बारीकी से गढ़ा गया है.
परंपरा के साथ पर्यावरण का संदेश
मंडल के सागर राजपूत ने बताया कि इस पहल के पीछे प्रेरणा मुंबई में माधी गणेश उत्सव से मिली. वहां POP मूर्तियों के विसर्जन पर प्रतिबंध था. इसी से उन्हें विचार आया कि क्यों न गणेश प्रतिमा को पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल बनाया जाए. उनका मानना है कि इस कदम से श्रद्धालु परंपरा को निभाते हुए प्रकृति की रक्षा भी कर सकते हैं.
गौरतलब है कि पारंपरिक POP मूर्तियों के कारण विसर्जन के वक्त नदियों और समुद्रों में प्रदूषण बढ़ता है. केमिकल रंग और प्लास्टर जीवन के लिए खतरा बनते हैं. ऐसे में टिशू पेपर की यह मूर्ति एक स्थायी और सुरक्षित विकल्प पेश करती है.
विसर्जन का अनोखा इंतजाम
इस बार इस प्रतिमा का विसर्जन पारंपरिक तरीके से समुद्र या नदी में नहीं होगा. मंडल ने इसके लिए एक विशेष झील तैयार की है. जैसे ही मूर्ति पानी में उतरेगी, टिशू पेपर आसानी से घुल जाएगा और पर्यावरण को किसी तरह का नुकसान नहीं होगा. विसर्जन के बाद बचा हुआ लुगदी प्राकृतिक खाद के रूप में खेतों में इस्तेमाल किया जाएगा. इस तरह यह पहल एक संपूर्ण पर्यावरणीय चक्र का उदाहरण बन रही है.
सूरत में इस प्रतिमा के आगमन के लिए भव्य शोभायात्रा निकाली गई. हजारों भक्त इस जुलूस में शामिल हुए. ढोल-नगाड़ों की थाप और “गणपति बप्पा मोरया” के जयकारों से पूरा शहर गूंज उठा. भक्तों के चेहरों पर गणेशजी के स्वागत की खुशी और उत्साह साफ झलक रहा था. यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक था, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि आस्था और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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