रिपोर्टर- विमलेंद्र राय
हिंदू धर्म में नवरात्रि के नौ दिनों का विशेष आध्यात्मिक महत्व है और इनमें छठा दिन शक्ति के उस स्वरूप को समर्पित है, जिसे ‘कात्यायनी’ कहा जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि कात्यायन की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था, जिसके कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा. चार भुजाओं वाली माता अपने दाहिने ऊपरी हाथ में अभय मुद्रा और निचले हाथ में वरद मुद्रा धारण किए हुए हैं, जबकि उनके बाएं हाथों में तलवार और कमल का पुष्प सुशोभित है. सिंह पर सवार मां कात्यायनी को ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है और मान्यता है कि द्वापर युग में गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए इन्हीं की आराधना की थी.
विवाह संबंधी दोषों का ‘रामबाण’ इलाज
धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिन कन्याओं के विवाह में बार-बार अड़चनें आ रही हों या कुंडली में मांगलिक दोष के कारण रिश्ता तय होने में परेशानी हो, उनके लिए मां कात्यायनी की पूजा किसी वरदान से कम नहीं है. माना जाता है कि छठे दिन पीले वस्त्र धारण कर माता को शहद का भोग लगाने और उनके विशेष मंत्रों का जाप करने से शीघ्र विवाह के योग बनते हैं.
इतना ही नहीं जो लोग प्रेम विवाह की इच्छा रखते हैं या अपने वैवाहिक जीवन में तनाव महसूस कर रहे हैं, उन्हें भी मां कात्यायनी की शरण में जाने से सुखद और संतुलित जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है. कुंडली में बृहस्पति (गुरु) ग्रह को मजबूत करने के लिए भी माता की यह पूजा अत्यंत प्रभावशाली मानी गई है.
कात्यायनी मां के व्रत का क्या है महत्व?
मां कात्यायनी का संबंध विशेष रूप से ब्रज की भूमि से रहा है. कहा जाता है कि यमुना तट पर स्थित मां कात्यायनी के मंदिर में आज भी हजारों श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर पहुँचते हैं. नवरात्रि के छठे दिन भक्त सुबह स्नान कर कलश पूजन के बाद माता का आवाहन करते हैं. पूजा में पीले रंग के फूलों और नैवेद्य का विशेष प्रयोग किया जाता है क्योंकि पीला रंग माता को अत्यंत प्रिय है.
बता दें कि ‘ॐ ह्रीं नम:’ और ‘कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि’ जैसे मंत्रों के उच्चारण से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है. सच्चे मन से की गई यह आराधना न केवल सांसारिक सुख प्रदान करती है बल्कि साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति भी कराती है.
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ऋषि की तपस्या और असुरों का संहार
मां कात्यायनी का प्राकट्य केवल ऋषि की मनोकामना पूरी करने के लिए नहीं बल्कि महिषासुर जैसे अत्याचारी असुर के विनाश के लिए भी हुआ था. देवताओं के तेज से निर्मित इस देवी ने अपनी वीरता से असुरों का संहार कर धर्म की स्थापना की थी. यही कारण है कि मां कात्यायनी को ‘विजय की देवी’ भी कहा जाता है. आज के दिन की पूजा विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता और करियर में सफलता की राह भी खोलती है. जो भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ माता को शहद और मीठे हलवे का भोग लगाते हैं, उनके जीवन से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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