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बैडमिंटन कोर्ट से चेस बोर्ड तक, जानिए भारत की नई ग्रैंडमास्टर दिव्या देशमुख की कहानी

Divya Deshmukh Success Story: बैडमिंटन से शुरुआत कर भारत की चौथी महिला ग्रैंडमास्टर बनने वाली दिव्या देशमुख ने फिडे विमेंस वर्ल्ड कप जीतकर नया इतिहास रचा है. अपनी आक्रामक खेल शैली और बेबाक अंदाज के लिए मशहूर दिव्या ने शतरंज की दुनिया में लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी मजबूत आवाज उठाई है.

Divya Deshmukh Chess Grandmaster gold medal

photo credit: @divyachess

Divya Deshmukh Success Story: जिंदगी कभी-कभी हमें उस रास्ते पर ले जाती है, जिसकी कल्पना हमने खुद भी नहीं की होती. भारतीय शतरंज की नई मिसाल बन चुकीं दिव्या देशमुख की कहानी भी एक खूबसूरत इत्तेफाक से शुरू होती है. महज चार-पांच साल की उम्र में दिव्या अपनी बड़ी बहन आर्या को देखकर बैडमिंटन खिलाड़ी बनने का सपना लिए कोर्ट पहुंची थीं. लेकिन छोटी कद-काठी के कारण वे नेट तक भी नहीं पहुंच पाती थीं. किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था; उसी हॉल के एक कोने में शतरंज की बिसात बिछी थी. मोहरों की उस खामोश जंग ने नन्हीं दिव्या का दिल जीत लिया और बैडमिंटन का रैकेट छूटकर हाथ में वजीर और बादशाह आ गए.

शुरुआती बोरियत से ‘आक्रामक’ पहचान तक

यह जानकर हैरानी हो सकती है कि जिस खेल में आज दिव्या दुनिया को अपनी चालों से मात दे रही हैं, वह शुरुआत में उन्हें काफी बोरिंग लगता था. लेकिन जैसे-जैसे मोहरों की समझ बढ़ी, खेल के प्रति उनका नज़रिया बदल गया. आज वे चेस बोर्ड पर अपनी बेहद आक्रामक शैली के लिए जानी जाती हैं. दिव्या अपनी इस आक्रामकता और बेबाक साफगोई का श्रेय अपने माता-पिता और अपनी बेहतरीन परवरिश को देती हैं.

लैंगिक भेदभाव पर करारा प्रहार

दिव्या सिर्फ चेस बोर्ड तक सीमित रहने वाली खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि वे समाज की सोच को भी आईना दिखाती हैं. फरवरी 2024 में नीदरलैंड्स के टाटा स्टील टूर्नामेंट के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर महिला खिलाड़ियों के साथ होने वाले लैंगिक भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाई. उन्होंने लिखा कि दर्शकों का ध्यान उनके खेल से ज़्यादा उनके कपड़ों, बालों और बोलने के तरीके (एक्सेंट) पर था. इस 18-19 साल की लड़की की निडर पोस्ट ने अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में महिलाओं के प्रति सोच और समानता पर एक बड़ी बहस को जन्म दिया.

ऐतिहासिक विश्वकप जीत और ‘गुलाबी’ रंग का जादू

जुलाई 2025 में दिव्या ने फिडे विमेंस वर्ल्ड कप जीतकर इतिहास रच दिया. वे यह खिताब जीतने वाली देश की पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं. आमतौर पर ग्रैंडमास्टर (GM) बनने के लिए खिलाड़ी को 3 कठिन ‘नॉर्म्स’ पूरे करने होते हैं, लेकिन दिव्या ने सीधे वर्ल्डकप जीतकर बिना किसी पिछले नॉर्म के भारत की चौथी महिला ग्रैंडमास्टर बनने का गौरव हासिल किया. इस ऐतिहासिक सफर में एक दिलचस्प लकी कनेक्शन भी रहा. 2025 के वर्ल्डकप के दौरान हर टाई-ब्रेकर मैच में दिव्या ने गुलाबी प्रिंटेड कुर्ता और बेज पैंट पहनी थी, और हर बार जीत उन्हीं के नाम रही.

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पारिवारिक विरासत और पर्सनल लाइफ

बहुत कम लोग जानते हैं कि दिव्या के परिवार में शतरंज की जड़ें काफी पुरानी हैं. उनकी मम्मी के नाना जी प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी विनोबा भावे के साथ नियमित रूप से चेस खेला करते थे. खेल के भारी तनाव को दूर करने के लिए दिव्या भरपूर नींद लेती हैं और संगीत की बहुत बड़ी शौकीन हैं. हिंदी-अंग्रेजी के साथ-साथ वे पंजाबी, मराठी, तमिल और तेलुगू गाने सुनती हैं. यही नहीं, जब वे अकेली होती हैं तो अपने कमरे में गानों की धुन पर खुलकर डांस करना पसंद करती हैं. महान चेस मास्टर सुजान पोल्गार ने भी उनके टैलेंट को सराहते हुए उन्हें शतरंज का एक नया चमकता सितारा कहा है.

दिव्या देशमुख ने कई गोल्ड मेडल किए अपने नाम

बता दें कि 2014 डरबन में दिव्या देशमुख ने वर्ल्ड यूथ (अंडर-10) का गोल्ड मेडल अपने नाम किया था. 2017 ब्राजील में आयोजित वर्ल्ड यूथ (अंडर-12) में गोल्ड मेडल अपने नाम किया था. 2020 में फिडे ऑनलाइन चेस ओलिंपियाड में भारतीय टीम के साथ गोल्ड जीता था. 2021 में वुमन ग्रैंडमास्टर (WGM) का आधिकारिक खिताब दिव्या देशमुख ने अपने नाम किया था. 2023 में दिव्या देशमुख एशियन वुमेन्स चेस चैम्पियनशिप की विजेता रह चुकी हैं. साल 2025 में फिडे विमेंस वर्ल्ड कप जीतकर दिव्या भारत की 4वीं महिला ग्रैंडमास्टर बनीं.

भारत एक्सप्रेस



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