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Allahabad Passenger Book

यह उपन्यास उन संकरी गलियों और 75 पैसे वाली चाय की खुशबू की वापसी है, जहाँ भविष्य गढ़ा जाता था. 'इलाहाबाद पैसेंजर' महज़ एक कहानी नहीं, बल्कि 1990 के दशक के इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उस दौर की जीवंत धड़कन है.

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