आधुनिकता की चकाचौंध के बीच उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा लिया है. यहां एक ऐसी अभूतपूर्व सांस्कृतिक क्रांति देखने को मिली, जिसने हमारी सदियों पुरानी लोक संस्कृति को दुनिया का सबसे बड़ा मुकुट पहना दिया. ‘पहल’ (Pahal) संस्था के तत्वावधान में आयोजित एक भव्य सांस्कृतिक महाकुंभ में 2500 महिलाओं ने एक साथ, एक सुर और एक ताल में पारंपरिक ‘सोहर’ का गायन कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (Guinness Book of World Records) में अपना नाम दर्ज करा लिया है.
अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा ‘सोहर’
भारतीय समाज में सोहर केवल एक लोकगीत नहीं है; यह जीवन के सृजन, बच्चे के जन्म और लोक-कल्याण का एक ऐसा मांगलिक गान है जो हमारे संस्कारों की आत्मा है. अमूमन घरों के आंगन तक सीमित रहने वाले इस सोहर को जब मुख्य संयोजक मनीष मिश्रा ने 2500 महिलाओं के सामूहिक कंठों के जरिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर पेश किया, तो यह एक वैश्विक सांस्कृतिक आंदोलन बन गया.
केसरिया और पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं का अनुशासन और उनकी सुरीली तान देखकर गिनीज बुक की टीम भी हैरान रह गई. जैसे ही रिकॉर्ड की आधिकारिक पुष्टि हुई, पूरा जनपद ‘भारत माता की जय’ के नारों से गूंज उठा.
आज का दिन बस्ती के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हुआ।
‘रामजी का सोहर’ के इस भव्य आयोजन ने बस्ती की आस्था, मातृशक्ति, लोकपरंपरा और सामूहिक चेतना का अद्भुत दर्शन पूरे देश के सामने प्रस्तुत किया। 2500 माताएं-बहनों का एक साथ श्रीराम के सोहर का गायन… यह दृश्य केवल भावुक करने… pic.twitter.com/hUnkP8nXha
— Manish Mishra (@ManishMPahal) May 25, 2026
अमित शाह को ‘नक्सल-मुक्त’ भारत के लिए धन्यवाद
यह ऐतिहासिक समागम केवल लोकगीत गाने और कीर्तिमान स्थापित करने तक ही सीमित नहीं रहा. इस मंच ने ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की एक ऐसी नई परिभाषा गढ़ी, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा. आयोजन में शामिल हजारों ग्रामीण और शहरी महिलाओं ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता ज्ञापित की. महिलाओं ने एक स्वर में कहा कि जिस तरह देश को नक्सलवाद के खूनी दंश से मुक्त कराकर आंतरिक सुरक्षा को मजबूत किया गया है, उसने देश की माताओं-बहनों को एक सुरक्षित और भयमुक्त भविष्य दिया है.
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कलाकारों के लिए खुले नए द्वार
कार्यक्रम के प्रणेता मनीष मिश्रा इस ऐतिहासिक सफलता पर भावुक नजर आए. उन्होंने इसे बस्ती की मातृशक्ति को समर्पित करते हुए कहा, “यह भगीरथ प्रयास केवल रिकॉर्ड की संख्या छूने के लिए नहीं था, बल्कि अपनी लोक संस्कृति को सहेजने की जिद थी. बस्ती की इस वैश्विक उपलब्धि के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में हर्ष का माहौल है. जानकारों का मानना है कि इस एक रिकॉर्ड ने यूपी की लोक विधाओं और ग्रामीण कलाकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय संभावनाओं के नए दरवाजे खोल दिए हैं. आज बस्ती ने इतिहास बदला भी है और एक नया इतिहास रचा भी है.
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