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किताबें नहीं होंगी तो अगली पीढ़ी सोना कैसे बनाएगी? CMD उपेंद्र राय बोले- किताबों से दूरी ने बनाया गुलाम

प्रयागराज में सीएमडी उपेंद्र राय ने ‘कैलाश गौतम स्मृति पुस्तकालय’ के उद्घाटन पर किताबों की महत्ता समझाई और समाज की पढ़ने की आदतों पर प्रहार किया.

cmd Upendrra Rai specch on Value of Books in Kailash Gautam Library Prayagraj

संगम नगरी के मेजा स्थित श्री काशी प्रसाद सिंह इंटरमीडिएट कॉलेज, कठौली में आयोजित ‘कैलाश गौतम स्मृति पुस्तकालय’ के लोकार्पण समारोह में भारत एक्सप्रेस न्यूज़ नेटवर्क के सीएमडी उपेंद्र राय ने समाज की बौद्धिक शून्यता पर गहरा प्रहार किया. मुख्य अतिथि के रूप में छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जिस देश ने दुनिया को ‘विश्व गुरु’ का मार्ग दिखाया, आज वही देश पढ़ने की आदतों में पिछड़ रहा है.

अगली पीढ़ी के लिए ‘सोना’ बनाने की मशीन

उपेंद्र राय ने इतिहास के पन्नों से जूलियस सीजर का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग साझा किया. उन्होंने बताया कि जब सीजर का जहाज भयंकर समुद्री तूफान में फंसा, तो उन्होंने कीमती सोने-चांदी को समंदर में फेंकने का आदेश दिया, लेकिन अपनी किताबों को बचा लिया. जब सेनापति ने इस पर आपत्ति जताई, तो सीजर ने ऐतिहासिक जवाब दिया— “मूर्ख! अगर ये किताबें नहीं रहीं, तो अगली पीढ़ी सोना कैसे बनाएगी? ज्ञान खत्म हो गया, तो सब खत्म हो जाएगा.” सीएमडी ने जोर देकर कहा कि जो देश किताबों को सोने से ऊपर रखते हैं, वे आज दुनिया का नेतृत्व कर रहे हैं.

वैश्विक दिग्गजों का ‘रीडिंग मंत्र’

उन्होंने मार्क जुकरबर्ग, बिल गेट्स और एलन मस्क जैसे आधुनिक दिग्गजों का उदाहरण देते हुए बताया कि ये लोग साल में कम से कम 30 दिन की छुट्टी सिर्फ किताबें पढ़ने के लिए लेते हैं. उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “उनके पास खरबों की संपत्ति है, फिर भी वे पढ़ते हैं. हमारे पास सुविधाओं का अभाव है, फिर भी हम पढ़ना नहीं चाहते.” उन्होंने चिंता जताई कि 150 करोड़ की आबादी वाले भारत में नोबेल विजेताओं की कमी हमारी शैक्षणिक और मानसिक गिरावट का संकेत है.

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अतीत्मुखी ज्ञान बनाम भविष्य की चेतना

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि भारत का अधिकांश ज्ञान ‘अतीत्मुखी’ है. हम केवल पुरानी बातों पर गर्व करते हैं, लेकिन भविष्य की चेतना से शून्य हैं. उन्होंने मेजा के विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे पुस्तकालय का उपयोग केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी मेधा और चेतना को वैश्विक स्तर तक ले जाने के लिए करें.



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