भारत छोड़ो आंदोलन की आग जब पूरे देश में फैल रही थी, तब पूर्वी उत्तर प्रदेश का गाजीपुर भी इससे अछूता नहीं रहा. गांव-गांव में आजादी की आवाज बुलंद हो रही थी और नौजवान अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती देने के लिए तैयार थे. इसी दौर में गाजीपुर के शेरपुर गांव ने ऐसी मिसाल कायम की, जिसे आज भी वहां के लोग गर्व से याद करते हैं.
18 अगस्त 1942 का दिन शेरपुर के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया. इसी दिन मोहम्मदाबाद तहसील मुख्यालय पर तिरंगा फहराने निकले शेरपुर के क्रांतिकारियों का अंग्रेजी सैनिकों से सामना हुआ. गोलीबारी में आठ स्वतंत्रता सेनानियों ने देश के लिए अपनी जान दे दी. बाद में इन्हीं वीरों को ‘अष्ट शहीद’ के नाम से जाना गया.
महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद 9 अगस्त 1942 से भारत छोड़ो आंदोलन ने जोर पकड़ लिया था. गाजीपुर में भी आंदोलनकारियों का उत्साह बढ़ता जा रहा था. शेरपुर के युवाओं ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ कई गतिविधियों में हिस्सा लिया.
14 अगस्त को यमुना गिरी के नेतृत्व में युवाओं ने गौसपुर हवाई अड्डे पर धावा बोल दिया और वहां आग लगा दी. इसके बाद 17 अगस्त को मुंसिफी और पोस्ट ऑफिस पर तिरंगा फहराने की कोशिश की गई. उसी रात शेरपुर में एक गुप्त बैठक हुई. फैसला लिया गया कि अगले दिन मोहम्मदाबाद तहसील भवन से यूनियन जैक उतारकर उसकी जगह तिरंगा फहराया जाएगा.
18 अगस्त की सुबह शेरपुर में महावीर जी की पूजा-अर्चना के बाद बड़ी संख्या में लोग मोहम्मदाबाद की ओर निकल पड़े. इस जत्थे का नेतृत्व डॉक्टर शिवपूजन राय कर रहे थे. उनके साथ बड़ी संख्या में नौजवान थे. कई युवाओं के पास हथियार भी बताए जाते हैं.
जब जत्था अहिरौली गांव पहुंचा, तो डॉक्टर शिवपूजन राय ने लोगों को संबोधित किया. उन्होंने सभी से संकल्प लेने को कहा और हथियार वहीं रखवा दिए. उनका साफ मानना था कि आंदोलन को गांधीजी के बताए अहिंसा और सत्य के रास्ते पर ही आगे बढ़ना चाहिए.
इसके बाद जत्था तहसील मुख्यालय की ओर बढ़ा. किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर में यह शांतिपूर्ण मार्च खूनी संघर्ष में बदल जाएगा.
मोहम्मदाबाद तहसील पहुंचकर आंदोलनकारियों ने यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराने की मांग की. ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की. हालात बिगड़े और आखिरकार गोली चलाने का आदेश दे दिया गया.
इसके बाद अंग्रेज सैनिकों ने भीड़ पर गोलियां चला दीं. कई लोग घायल हुए और देखते ही देखते कई आंदोलनकारी जमीन पर गिर पड़े. लेकिन गोलियों की आवाज के बीच भी तिरंगा आगे बढ़ता रहा. एक सत्याग्रही गिरता तो दूसरा झंडा अपने हाथ में ले लेता.
इसी गोलीबारी में डॉक्टर शिवपूजन राय समेत आठ क्रांतिकारियों ने शहादत दी. शेरपुर के इन वीरों को आज अष्ट शहीद के रूप में याद किया जाता है. विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में इनके नामों के उल्लेख में थोड़ा अंतर मिलता है, लेकिन डॉक्टर शिवपूजन राय सहित इन आठ बलिदानियों की शहादत शेरपुर की स्वतंत्रता संग्राम की पहचान बन चुकी है.
डॉक्टर शिवपूजन राय को कई गोलियां लगीं, फिर भी वे तिरंगा थामे आगे बढ़ते रहे. आखिरकार देश के लिए लड़ते हुए उन्होंने प्राण न्योछावर कर दिए.
इस घटना में सीताराम राय भी गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हुए थे. अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें मृत समझ लिया और कठवा मोड़ के पास बेसों नदी में फेंक दिया. लेकिन उनकी सांसें चल रही थीं. वे किसी तरह बच गए.
बाद के वर्षों में सीताराम राय को लोग ‘जिंदा शहीद’ के नाम से याद करने लगे. उनकी कहानी बताती है कि उस दौर में आजादी के लिए लड़ने वालों ने किस तरह मौत को भी बेहद करीब से देखा.
भारी गोलीबारी और बलिदान के बावजूद आंदोलनकारियों का हौसला नहीं टूटा. अंततः तहसील परिसर में यूनियन जैक उतारा गया और तिरंगा फहराया गया. यह सिर्फ एक झंडा बदलने की घटना नहीं थी. उस समय यह ब्रिटिश शासन को सीधी चुनौती थी.
इस घटना के बाद कुछ समय के लिए मोहम्मदाबाद क्षेत्र में अंग्रेजी प्रशासन की पकड़ कमजोर पड़ गई. लेकिन इसका खामियाजा शेरपुर को भी भुगतना पड़ा.
अष्ट शहीदों की घटना के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने शेरपुर गांव को निशाना बनाया. गांव में कई बार लूटपाट की गई और भारी जुर्माना लगाया गया. अंग्रेजों की नजर में शेरपुर एक ऐसा गांव बन चुका था, जहां आजादी की भावना को दबाना आसान नहीं था. कहा जाता है कि एक ही गांव से आठ शहीद और करीब 99 स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान शेरपुर को देश के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अलग पहचान देता है. यही वजह है कि शेरपुर को आज भी ‘स्वतंत्रता सेनानियों का गांव’ कहा जाता है.
मोहम्मदाबाद में अष्ट शहीदों की स्मृति में पार्क और स्मारक मौजूद है. हर वर्ष 18 अगस्त को यहां शहादत दिवस मनाया जाता है. इस मौके पर लोग उन वीरों को याद करते हैं, जिन्होंने तिरंगे की आन और देश की आजादी के लिए अपने प्राण दे दिए.
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