Balen Shah Reforms: नेपाल में जेन-जेड आंदोलन के बाद सत्ता संभालने वाले बालेन्द्र शाह ने महज तीन महीने में ही राजनीतिक माहौल बदल दिया. रैपर से प्रधानमंत्री बने बालेन ने 5 मार्च के चुनाव में अप्रत्याशित जीत हासिल की थी. भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों ने पुरानी सरकार को गिराया और बालेन को सत्ता तक पहुंचाया.
शुरुआती कदम
शपथ लेने के अगले ही दिन पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और उनके गृह मंत्री की गिरफ्तारी ने सबको चौंका दिया. यह कदम सरकार की कार्यशैली का संकेत बन गया. तेज फैसले और बड़े राजनीतिक संदेश उनकी पहचान बन गए, हालांकि कई निर्णय कानूनी चुनौतियों में उलझे.
जनता से दूरी
बालेन शाह ने खुद को सार्वजनिक मंचों से दूर रखा है. वह ज्यादातर सोशल मीडिया के जरिए संवाद करते हैं. यहां तक कि जीत का भाषण भी उन्होंने रैप गाने के रूप में दिया. विदेशी नेताओं से मुलाकात से बचते हुए उन्होंने पड़ोसी देशों की यात्राएं अपने विदेश मंत्री को सौंप दीं. पत्रकारों और विशेषज्ञों का कहना है कि जनता को अब भी उनके बारे में बहुत कम जानकारी है.
सुधारों की रफ्तार
सत्ता संभालते ही बालेन सरकार ने 100 सूत्रीय सुधार कार्यक्रम शुरू किया. इसमें भ्रष्टाचार पर रोक, डिजिटल व्यवस्था, बेहतर शासन और सरकारी सेवाओं में सुधार जैसे मुद्दे शामिल थे. सरकार का दावा है कि इनमें से 70 सुधार लागू हो चुके हैं. जून में पार्टी बैठक में बालेन ने कहा कि उनकी सरकार बदलाव की दिशा में एक्सप्रेसवे पर दौड़ रही है.
बजट और प्राथमिकताएं
सरकार ने 2.1 ट्रिलियन नेपाली रुपये का बजट पेश किया है. इसमें बुनियादी ढांचे, तकनीक, स्वास्थ्य और शिक्षा को मजबूत करने पर जोर दिया गया है. साथ ही अर्थव्यवस्था को स्थिर करने का वादा भी किया गया है.
आलोचनाओं का दौर
तेज फैसलों के कारण बालेन शाह के समर्थक तो बढ़े हैं, लेकिन आलोचक भी कम नहीं. विपक्षी दल सीपीएन-यूएमएल ने सरकार को कमजोर और विवादों से भरा बताया. अध्यादेशों के जरिए सुधार लागू करने पर लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर होने की आशंका जताई गई.
संवैधानिक विवाद
एक अध्यादेश के तहत संवैधानिक परिषद अब साधारण बहुमत से फैसले ले सकती है. न्यायपालिका में नियुक्तियां भी इसी प्रक्रिया से हो रही हैं. इससे संस्थागत संतुलन पर सवाल उठे हैं. संविधान संशोधन और संघीय ढांचे में बदलाव की चर्चाओं ने भी राजनीतिक विवाद को हवा दी है.
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100 दिनों में बालेन शाह ने नेपाल की राजनीति को नई दिशा दी है. तेज फैसलों और सुधारों ने उन्हें लोकप्रिय बनाया, लेकिन कानूनी और संवैधानिक विवादों ने आलोचना भी खड़ी कर दी है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि उनकी सरकार बदलाव की रफ्तार बनाए रखती है या लोकतांत्रिक संस्थाओं के दबाव में धीमी पड़ती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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