Nepal Protest: नेपाल में सोशल मीडिया पर लगे बैन के बाद हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मंगलवार (9 सितंबर) को इस्तीफ़ा दे दिया. भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनकारियों द्वारा अनिश्चितकालीन कर्फ्यू का उल्लंघन करने के बाद भड़की हिंसा में 22 लोगों की मौत हो गई और 250 से ज़्यादा घायल हो गए. प्रदर्शन के दौरान देश की संसद में घुसने की कोशिश कर रही भीड़ पर पुलिस ने आँसू गैस और रबर की गोलियां चलाई.
हालंकि, केपी ओली की सरकार ने सोमवार को विरोध प्रदर्शनों (Nepal Gen-Z Protest) के हिंसक हो जाने के बाद सोशल मीडिया पर लगा प्रतिबंध हटा लिया. नेपाल के सामने यह दशकों में सबसे बुरा संकट है. इस प्रदर्शन ने 2008 में राजशाही के खात्मे के बाद से इस नेपाल की गहरी राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक चुनौतियों को उजागर किया है.
कौन हैं के पी शर्मा ओली?
पूर्वी नेपाल में 1952 में जन्मे खड़गा प्रसाद शर्मा ओली (KP Sharma Oli) ने बचपन में स्कूल छोड़ दिया था. 22 साल की उम्र में वह एक किसान, धर्म प्रसाद ढकाल की हत्या के आरोप में जेल गए. केपी ओली का राजनीतिक जीवन 12 साल की उम्र में ही शुरू हो गया था, जब वे कम्युनिस्ट नेता रामनाथ दहल की मदद से झापा चले गए थे. इस समय तक ओली मार्क्स और लेनिन के दर्शन से प्रभावित हो चुके थे और 1966 तक वे कम्युनिस्ट राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश कर चुके थे.
1970 में केपी ओली 18 साल की उम्र में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए और राजनीतिक गतिविधियों की वजह से जल्द ही गिरफ्तार कर लिए गए, जहां उन्होंने 14 साल, 1973 से 1987 तक जेल में बिताए. हालांकि वह अपनी कैद के बारे में कम ही बात करते हैं, लेकिन उनके करीबी कहते हैं कि इसने उन्हें गहराई से प्रभावित किया. पूर्व पीएम ओली को 1980 के दशक के मध्य में शाही क्षमादान मिलने के बाद रिहा कर दिया गया था.

1971 में केपी ओली ने झापा विद्रोह का नेतृत्व संभाला, जो नेपाली कम्युनिस्ट आंदोलन का एक महत्वपूर्ण समय था. झापा विद्रोह ने नेपाल में कम्युनिस्ट आंदोलन में एक महत्वपूर्ण बदलाव था, जो उसके वैचारिक रुख से सशस्त्र विद्रोह की ओर ले गया. इस दौरान केपी शर्मा ओली ने देश के विभिन्न हिस्सों में कई महीने जेल में बिताए.
1990 के दशक में केपी ओली ने पंचायत शासन को गिराने वाले लोकतांत्रिक आंदोलन में अपने प्रयासों के लिए लोकप्रियता हासिल की. अगले कुछ वर्षों में वे नेपाली राजनीति में एक प्रमुख व्यक्ति और कम्युनिस्ट पार्टी के एक महत्वपूर्ण नेता बन गए.
केपी ओली का राजनीतिक जीवन उथल-पुथल भरा रहा
एक अनुभवी नेपाली कम्युनिस्ट राजनेता के तौर पर केपी ओली का राजनीतिक जीवन उथल-पुथल भरा रहा है. उनके राष्ट्रवादी बयानों और पड़ोसी भारत के साथ टकराव की यात्रा से उनके राजनीतिक करियर को दर्शाती है. केपी शर्मा ओली 2015-2016 और 2018-2021 तक दो बार नेपाल के प्रधानमंत्री रहे हैं, इससे पहले कि उन्हें एक विवादास्पद फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पद से हटा दिया था.
2015 में 597 में से 338 वोट जीतकर वे प्रधानमंत्री चुने गए. हालांकि, जुलाई 2016 में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी-केंद्र) द्वारा अपना समर्थन वापस लेने और संसद में अविश्वास प्रस्ताव हारने के बाद केपी ओली को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा.
उनकी लोकप्रियता तब और बढ़ गई जब नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी (CPN-UML) ने पुष्प कमल दहल प्रचंड के नेतृत्व वाली नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी-केंद्र) के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन में 2018 के चुनावों में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया.

इस गठबंधन की वजह से दोनों दलों का नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में ऐतिहासिक विलय हुआ, जिसमें ओली और प्रचंड सह-अध्यक्ष बने और प्रधानमंत्री पद साझा करने पर सहमत हुए.
केपी ओली के कार्यकाल में “समृद्ध नेपाल, सुखी नेपाली” जैसे महत्वाकांक्षी वादे किए गए. लेकिन यह उम्मीदों के पूरा न होने और सत्ता के केंद्रीकरण, जिसमें जांच एजेंसियों को प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन लाना भी शामिल था, के कारण धूमिल हो गया.
प्रचंड के साथ सत्ता-साझाकरण समझौते का सम्मान करने में उनकी अनिच्छा और वफादारों को तरजीह देने के कारण पार्टी के आंतरिक संघर्ष हुए, जिसके परिणामस्वरूप प्रचंड ने समर्थन वापस ले लिया और बाद में गठबंधन टूट गया.
अलग-अलग मौकों पर गंवाई सत्ता
पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली की सत्ता पर पकड़ तब और कमज़ोर हो गई जब उन्होंने 20 दिसंबर, 2020 को संसद को अचानक भंग कर दिया. उन्होंने संवैधानिक प्रतिबंधों के बावजूद, अपने वादों को पूरा करने में बाधा का हवाला दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इस विघटन को रद्द कर दिया और संसद को फिर से बहाल कर दिया, लेकिन ओली को संसदीय सत्रों से बचने और अध्यादेश द्वारा शासन करने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा.
मई 2021 में विश्वास मत विफल होने के बाद उन्हें अनुच्छेद 76(3) के तहत फिर से प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया क्योंकि कोई भी विपक्षी दल तय समय के अंदर बहुमत वाली सरकार नहीं बना सका या अपना दावा पेश नहीं कर सका.

इसके बाद राष्ट्रपति ने 22 मई, 2021 की मध्यरात्रि में प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया और ओली अल्पमत के प्रधानमंत्री बने रहे. परिणामस्वरूप, ओली सरकार 12 से 19 नवंबर, 2021 तक होने वाले नए चुनावों तक एक अंतरिम सरकार बन गई.
2024 में फिर से बने प्रधानमंत्री
हालांकि, इस कार्रवाई को चुनौती दी गई और सुप्रीम कोर्ट ने 12 जुलाई 2021 को न केवल विघटन को रद्द कर दिया, बल्कि केपी ओली की नियुक्ति को भी रद्द कर दिया और शेर बहादुर देउबा को प्रधानमंत्री नियुक्त करने का निर्देश दिया.
2022 के चुनावों के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. उसके बाद CPN-UML दूसरे और माओवादी सेंटर पार्टी तीसरे स्थान पर होगी. CPN-माओवादी सेंटर के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की. हालांकि, संसद में बहुमत नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास था, इसलिए उन्होंने दहल को नया प्रधानमंत्री मानने से इनकार कर दिया.
इसके बाद दहल ने अपनी उम्मीदवारी को मज़बूत करने के लिए CPN-UML और नवगठित राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) से समर्थन मांगा और दहल को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया, जिससे ओली किंगमेकर की भूमिका में आ गए.
मगर प्रतिनिधि सभा में विश्वास मत हारने के बाद पुष्प कमल दहल को 12 जुलाई 2024 को नेपाल के प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया, जिसके बाद 14 जुलाई 2024 को केपी शर्मा ओली को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया.
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-भारत एक्सप्रेस
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