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‘पेंशन दान नहीं, कानूनी अधिकार है’, अलग रह रही पत्नी को मिलेगा हक; जानिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

Allahabad High Court: पारिवारक पेंशन के मामले में इलाहाबाद हाकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. न्यायालय ने कहा पति की मृत्यु के बाद भी अलग रह रही पत्नी को पारिवारिक पेंशन पाने का अधिकार है.

Allahabad High Court On Family Pension

इलाहाबाद हाईकोर्ट

Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक 62 वर्षीय महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसे पारिवारिक पेंशन का अधिकार दिया है. कोर्ट ने पेंशन को लेकर यह भी कहा है कि पारिवारिक पेंशन कानूनी अधिकार है वह किसी तरह का दान नहीं है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि पति की मृत्यु के बाद अलग रह रही पत्नी को पारिवारिक पेंशन पाने का अधिकार है और यह अधिकार उसके नियोक्ता के रिकॉर्ड में पति द्वारा नामित पुत्रों के अधिकार पर भी लागू होता है.

न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने उर्मिला सिंह की रिट याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया. उर्मिला सिंह अपने पति से अलग रह रही थीं, लेकिन एक पारिवारिक न्यायालय के निर्देशानुसार अपने पति द्वारा दिए गए 8,000 रुपये के भरण-पोषण भत्ते पर पूरी तरह निर्भर थीं.

आवेदन कर दिया गया था खारिज

उर्मिला सिंह के पति एक सहायक शिक्षक थे, जो 2016 में सेवानिवृत्त हुए और 2019 में अपनी मृत्यु तक पेंशन प्राप्त कर रहे थे. उनकी मृत्यु के बाद सिंह ने पारिवारिक पेंशन प्राप्त करने के लिए एक आवेदन दायर किया. इस आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि पेंशन स्वीकृति के लिए उनके पति द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों में परिवार के सदस्यों के विवरण में उनका नाम नहीं था.

हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया

विभागीय आदेश के विरुद्ध उर्मिला सिंह ने उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने दावा किया कि वह उनकी पत्नी हैं और ग्राम प्रधान के प्रमाण पत्र से यह साबित होता है. उन्हें 8000 रुपये का गुजारा भत्ता मिल रहा था. न्यायालय ने माना कि 62 वर्षीय पत्नी, जो अपने पति से गुजारा भत्ता प्राप्त कर रही थी, पारिवारिक पेंशन पाने की हकदार है.

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‘पेंशन को अधिकार है दान नहीं’

27 जुलाई के अपने फैसले में न्यायालय (Allahabad High Court) ने कहा कि पारिवारिक पेंशन वैधानिक है और कर्मचारी के एकतरफा नियंत्रण से परे है. पारिवारिक पेंशन को कानूनी अधिकार माना जाता है, दान नहीं है. तदनुसार, रिट याचिका स्वीकार की जाती है और प्रतिवादी प्राधिकारी को याचिकाकर्ता के पक्ष में पारिवारिक पेंशन जारी करने का निर्देश दिया जाता है.



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