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AIIMS के बाहर खुले आसमान में सोने को मजबूर मरीज; दिल्ली हाई कोर्ट सख़्त, केंद्र और दिल्ली सरकार से मांगा जवाब

दिल्ली हाई कोर्ट ने कड़ाके की ठंड में एम्स के बाहर खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर मरीजों और उनके तीमारदारों की स्थिति पर संज्ञान लिया है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने ठंड में दिल्ली एम्स के बाहर मरीजों और उनके तीमारदारों के खुले आसमान के नीचे सोने की स्थिति पर स्वतः संज्ञान लिया है. साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से इसपर जवाब मांगा है. कोर्ट ने मीडिया रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया है. कड़ाके की ठंड की वजह से रैन बसेरे के भरने के चलते लोग खुले आसमान में सोने को मजबूर है. हालांकि इसका एक कारण यह भी है कि जल्द नंबर आ जाए उसके लिए लाइन में लगना पड़ता है, इसके चलते भी लोग खुले आसमान में सो रहे है.

वही हालही में एम्स ने कहा था कि एम्स के बाहर सो रहे सभी लोग तीमारदार नहीं है. मरीजों के परिजनों के ठहरने के लिए एम्स में उचित व्यवस्था है. तीमारदारों को बाहर सोने की जरूरत नही है. दिल्ली एम्स और एम्स झज्जर में दो बड़े विश्राम सदन सहित कुछ धर्मशालाएं भी है. इनमें कुल मिलाकर 1500 बेड की व्यवस्था है. जहां कम खर्च में ही रहने और खाने की सुविधा दी जाती है.

मरीजों की भीड़ या सिस्टम की नाकामी?

कोर्ट ने प्रशासन से पूछा है कि ऐसी परिस्थितियों में मरीज और उनके तीमारदारों के लिए क्या व्यवस्था की गई है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे. एम्स में रात के समय पर्चा के लिए कोई औपचारिक टोकन या स्पष्ट व्यवस्था नहीं दिखती है. लोग आपस में कागज पर नंबर लिखकर, कंबल या चादर रखकर अपनी जगह तय करते है.

एम्स के श्री साई विश्राम सदन में 100 बेड और राजगढ़िया विश्राम सदन में 149 बेड, ट्रामा सेंटर के पीछे वाले पावरग्रिड विश्राम सदन में 281 बेड, सीआरपीएफ द्वारा तैयार किया गया आश्रय शेल्टर में 180 के करीब बेड उपलब्ध है.

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-भारत एक्सप्रेस



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