Ghooskhor Pandit Supreme Court notice: वेब सीरीज‘घूसखोर पंडत’ का प्रोमो आने के बाद से फिल्म लगातार विवादों में घिरी हुई है. वेब सीरीज के टाइटल पर इतना हंगामा मचा कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा गया. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिल्ममेकर नीरज पांडे की फिल्म के टाइटल को लेकर कड़ी नाराजगी जताते हुए इस टाइटल से फिल्म के रिलीज पर रोक लगा दी है. साथ ही संकेत दिया कि यदि फिल्म का नाम नहीं बदला गया तो इसकी रिलीज़ की अनुमति नहीं दी जाएगी. कोर्ट ने दो टूक कहा कि किसी समाज के एक वर्ग को इस तरह के नाम से क्यों बदनाम किया जा रहा है? इस टाइटल से फिल्म रिलीज नहीं होगी.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में क्या?
जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने डायरेक्टर को फटकार लगाते हुए कहा कि आपको क्या इन शब्दों का मतलब पता नहीं था? अगर आप स्पष्ट नहीं करते कि जानबूझकर ऐसा नहीं किया है तो हम फिल्म को रिलीज नहीं होने देंगे. ” कोर्ट ने आगे कहा कि जानबूझकर बहुत से समुदायों को टारगेट किया जा रहा है. किसी को व्यक्तिगत तौर पर आप कैसे टारगेट कर सकते हैं? हम सिर्फ फिल्म नहीं, बल्कि देश की एकता, कानून व्यवस्था और मोरैलिटी को लेकर चिंतित हैं. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इस तरह की हरकतों से देश का सौहार्द खराब होता है. भविष्य में ऐसा करने की इजाजत किसी को नहीं है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि किसी को आहत करें.
डायरेक्टर की ओर से जवाब
डायरेक्टर की ओर से पेश वकील ने कहा कि हम टाइटल बदल रहे हैं. वकील ने दावा किया कि यह एक पुलिस का ड्रामा है. कोर्ट ने कहा कि कोई पुजारी है. वकील ने कहा कि फिल्म रिलीज नहीं हुई है. कोर्ट ने नया टाइटल लेकर आने को कहा है.
याचिका में क्या दावा?
याचिका ब्राह्मण समाज की ओर से अतुल मिश्रा ने दायर की थी. याचिका में कहा गया है कि फिल्म सांप्रदायिक रूप से आपत्तिजनक और मानहानिकारक है. ब्राह्मण समुदाय की गरिमा और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती है. फिल्म के जरिए पंडित को भ्रष्ट और घूसखोर बताना अनैतिक और भ्रष्ट आचरण है. याचिकाकर्ता का कहना है कि फिल्म की रिलीज से ब्राह्मण समुदाय की छवि को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचेगा और सामाजिक सद्भाव बिगड़ेगा. नेटफ्लिक्स और संबंधित नियामक संस्थाओं ने इस पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया है. याचिका में डर जताया गया है कि यह शो सामूहिक मानहानि, हेट स्पीच और सांप्रदायिक तनाव पैदा करेगा. इसलिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत तत्काल हस्तक्षेप और अंतरिम रोक की मांग की गई थी.
दिल्ली हाई कोर्ट में पिछला दौर
इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट में भी मामला गया था. वहां डायरेक्टर ने कहा था कि हम फिल्म के नाम बदलने जा रहे हैं. हाई कोर्ट ने नेटफ्लिक्स द्वारा टाइटल बदलने और प्रमोशनल सामग्री हटाने के फैसले को नोट करते हुए कहा था कि अब याचिका पर आगे आदेश देने का कोई औचित्य नहीं रह गया और इस आधार पर मामले का निपटारा किया जाता है.
अब सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया है. 9 फरवरी को होने वाली सुनवाई में कोर्ट के फैसले से फिल्म की किस्मत तय होगी. ब्राह्मण समाज और अन्य समुदायों में इस फिल्म को लेकर गुस्सा है. कोर्ट का यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण होगा
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-भारत एक्सप्रेस
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