आज सुबह करीब 3:30 बजे यमुना एक्सप्रेसवे पर मथुरा के राया इलाके में एक बार फिर मौत का तांडव देखने को मिला. एक तेज रफ्तार कार आगे चल रहे भारी ट्रक में पीछे से इतनी बेरहमी से जा घुसी कि कार के परखच्चे उड़ गए और मौके पर ही 4 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई. कड़े सुरक्षा दावों और करोड़ों के इंफ्रास्ट्रक्चर वाले इस एक्सप्रेसवे पर यह कोई पहला हादसा नहीं है.
सरकारी और आरटीआई (RTI) के डराने वाले आंकड़े बताते हैं कि साल 2012 में इसकी शुरुआत से लेकर अब तक इस 165 किलोमीटर लंबे ट्रैक पर 7,600 से अधिक भयानक सड़क दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें 1,300 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. आखिर ऐसा क्या है कि देश का सबसे आधुनिक दिखने वाला यह कंक्रीट का रनवे अब ‘यमराज का एक्सप्रेसवे’ और ‘किलर हाईवे’ बनता जा रहा है? इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह वो नहीं है जो आम तौर पर पुलिस डायरी में लिखी जाती है.
क्या है हादसों की सबसे बड़ी वजह?(Yamuna Expressway Accident)
बताते चलें कि जब भी ऐसे हादसे होते हैं, तो अक्सर अखबारों में लिख दिया जाता है कि ‘ड्राइवर को नींद की झपकी आ गई’. लेकिन आईआईटी दिल्ली की रोड सेफ्टी ऑडिट रिपोर्ट और आरटीआई के आंकड़े एक बेहद चौंकाने वाला सच सामने लाते हैं. यमुना एक्सप्रेसवे पर होने वाले करीब 44 फीसदी हादसों का कारण ओवरस्पीडिंग या आम नींद नहीं बल्कि एक साइकोलॉजिकल बीमारी है जिसे विज्ञान की भाषा में ‘हाइवे हिप्नोसिस’ कहा जाता है. दरअसल, ग्रेटर नोएडा से आगरा को जोड़ने वाला यह एक्सप्रेसवे बिल्कुल सीधा है. इसमें न तो कोई तीखा मोड़ है, न कोई बड़ा गड्ढा है और न ही कोई बड़ी रुकावट. कंक्रीट की यह सड़क पूरी तरह से एक जैसी यानी मोनोटोनस है.
जब कोई ड्राइवर लगातार ऐसी सपाट सड़क पर 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ी चलाता है, तो उसका दिमाग एक ‘ट्रांस’ यानी अर्ध-चेतन अवस्था (Hypnotic State) में चला जाता है. इस स्थिति में ड्राइवर की आंखें तो पूरी तरह खुली रहती हैं, स्टीयरिंग पर हाथ भी होता है, लेकिन उसका दिमाग सामने चल रही गाड़ी या खतरे को प्रोसेस करना पूरी तरह बंद कर देता है. आज सुबह मथुरा के राया में भी ठीक यही हुआ, जहां खुली आंखों के सम्मोहन में फंसा ड्राइवर सीधे आगे चल रहे ट्रक में जा घुसा.
कंक्रीट की जलती हुई सतह भी बनती है वजह(Yamuna Expressway Accident cause )
यमुना एक्सप्रेसवे पर मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण इसका कंक्रीट (सिमेंटेड) से बना होना है. आम तौर पर हाईवे डामर या कोलतार के बनाए जाते हैं, जो गर्मी को सोख लेते हैं, लेकिन कंक्रीट की सतह धूप में बहुत जल्दी और बहुत ज्यादा गर्म हो जाती है. जब गाड़ियां इस गर्म सतह पर 100 या 120 की रफ्तार से लगातार दौड़ती हैं, तो सड़क और टायर के बीच होने वाले घर्षण (Friction) के कारण टायरों के अंदर की हवा अत्यधिक गर्म होकर फैलने लगती है.
नाइट्रोजन के बजाय साधारण हवा होने के कारण टायरों का प्रेशर बर्दाश्त से बाहर हो जाता है और चलती गाड़ी का टायर अचानक किसी बम की तरह फट जाता है. तेज रफ्तार में टायर फटते ही गाड़ी हवा में तैरने लगती है और अनियंत्रित होकर डिवाइडर तोड़कर दूसरी तरफ से आ रही गाड़ियों से टकरा जाती है.
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सर्दियों में अंधा कोहरा बन जाता है जानलेवा
यमुना एक्सप्रेसवे पूरी तरह से कृषि क्षेत्रों और खुले मैदानों के बीच से गुजरता है. इसके चलते सर्दियों के दिनों में, खासकर दिसंबर से फरवरी के बीच, यहां अचानक इतना अत्यधिक घना कोहरा छा जाता है कि दृश्यता शून्य तक पहुंच जाती है. एक्सप्रेसवे के डिजाइन की वजह से हवा के झोंके कोहरे को और घना बना देते हैं. सबसे बड़ी लापरवाही यह होती है कि विजिबिलिटी खत्म होने के बावजूद लोग अपनी गाड़ियों की रफ्तार कम नहीं करते.
नतीजा (Yamuna Expressway Accident cause ) यह होता है कि आगे चल रही किसी एक गाड़ी के ब्रेक लगाते ही पीछे से आ रही दर्जनों गाड़ियाँ एक के बाद एक आपस में टकराती चली जाती हैं. ऐसे मल्टी-व्हीकल कोलिजन इस एक्सप्रेसवे पर हर साल सर्दियों में दर्जनों परिवारों को हमेशा के लिए तबाह कर देते हैं, जिससे यह साफ है कि जब तक ड्राइवर खुद ‘हाइवे हिप्नोसिस’ और रफ्तार के इस जाल को नहीं समझेंगे, तब तक यमराज का यह सफर यूं ही जारी रहेगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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