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पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका को किया खारिज, क्या बोली अदालत?

सुप्रीम कोर्ट ने पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी के प्रसार को रोकने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने कहा कि ऐसी याचिकाओं का उद्देश्य सनसनी फैलाना होता है.

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सर्वोच्च न्यायालय ने पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ कथित रूप से की गई आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियों के मामले में दायर एक जनहित याचिका (PIL) को सुनने से पूरी तरह इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सख्त रुख अपनाया. पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस प्रकार की याचिकाएं शीर्ष अदालत में दायर करने का असल मकसद कानूनी राहत पाना नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील मामलों को बेवजह सनसनीखेज बनाना होता है.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि यह पूरा मामला एक हालिया पॉडकास्ट में की गई कुछ बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़ा हुआ है, जिससे एक खास धार्मिक समुदाय की धार्मिक भावनाएं गंभीर रूप से आहत हुई हैं. दायर याचिका में कोर्ट से गुहार लगाई गई थी कि वह एक सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर द्वारा पैगम्बर मोहम्मद के खिलाफ कथित तौर पर की गई इन विवादित टिप्पणियों के ऑनलाइन प्रसार और वीडियो क्लिपिंग्स को रोकने के लिए तुरंत आवश्यक निर्देश व प्रतिबंध जारी करे. याचिका में यह भी तर्क दिया गया था कि यह मामला देश के सांप्रदायिक सौहार्द और आंतरिक शांति को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है.

जस्टिस अमानुल्लाह का पुराना रुख

उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी इस विवाद को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत में एक याचिका दायर की जा चुकी है. तब जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की बेंच ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद याचिका का उचित दिशा-निर्देशों के साथ निपटारा कर दिया था.

उस सुनवाई के दौरान जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने याचिकाकर्ता के वकील से सीधे सवाल पूछा था कि क्या इस गंभीर संबंध में स्थानीय पुलिस के पास कोई आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई गई है? उन्होंने कानूनी प्रक्रिया स्पष्ट करते हुए कहा था कि देश के स्थापित कानून के तहत नागरिकों को पहले निचले स्तर पर उपलब्ध उचित कानूनी प्रक्रिया और मंचों को अपनाना चाहिए. यदि निचले स्तर या हाई कोर्ट पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं होती है, केवल तभी विशेष परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाना चाहिए.

क्या बोली अदालत?

जस्टिस अमानुल्लाह ने देशव्यापी अदालती व्यवस्था पर जोर देते हुए कहा था कि हर छोटे-बड़े मामले को सीधे सुप्रीम कोर्ट में खींच लाने की यह बढ़ती प्रवृत्ति कतई ठीक नहीं है. उन्होंने याचिकाकर्ता से कहा था, “हमारी न्यायिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा रखिये. सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है और उसकी प्राथमिक भूमिका कानून की निगरानी करने की है. यदि हर आपराधिक या दीवानी मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट में ही लाया जाने लगेगा, तो इससे देश की निचली अदालतों और हाई कोर्ट्स की भूमिका व महत्ता बुरी तरह प्रभावित होगी.” अदालत ने तब भी हिदायत दी थी कि ऐसी संवेदनशील सांप्रदायिक घटनाओं को सार्वजनिक रूप से सनसनीखेज बनाने से हर हाल में बचना चाहिए. यदि किसी भी व्यक्ति ने देश के कानून का खुला उल्लंघन किया है, तो उसके खिलाफ स्थापित कानून के अनुसार पुलिस द्वारा सख्त से सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए.

क्या है पूरा मामला?

विवाद की पृष्ठभूमि और आधिकारिक रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर नाजिया इलाही खान ने जून महीने में एक चर्चित पॉडकास्ट के दौरान पैगंबर मोहम्मद और उनके परिवार के खिलाफ कुछ बेहद अपमानजनक और विवादित टिप्पणियां की थीं.

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पॉडकास्ट के प्रसारण के तुरंत बाद उसकी यह छोटी वीडियो क्लिप सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर तेजी से वायरल हो गई, जिससे तनाव फैल गया. यह पूरी घटना सामने आने के बाद कानून के उल्लंघन और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में उक्त इंफ्लुएंसर नाजिया इलाही खान के खिलाफ पुलिस में एक नियमित एफआईआर (FIR) दर्ज कर कानूनी जांच शुरू कर दी गई थी.



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