बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री बनाए जाने के फैसले के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) आगामी 4 अगस्त 2026 को सुनवाई करेगी. माननीय मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष खंडपीठ इस संवेदनशील याचिका की सुनवाई कर रही है. मामले की प्राथमिक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से कड़ा सवाल पूछते हुए कहा है कि आखिर कैसे कोई व्यक्ति राज्य विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बने बिना संविधान द्वारा तय 6 महीने की अधिकतम अवधि से अधिक समय तक मंत्री पद पर बना हुआ है? शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को इस संवैधानिक विसंगति का जवाब देना होगा.
सुनवाई के दौरान बिहार सरकार की ओर से पेश हुए वकील ने कोर्ट को अवगत कराया कि यह मामला अदालत में पहले से ही 27 अगस्त के लिए सूचीबद्ध है. हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील ने पुरजोर दलील दी कि 6 महीने से अधिक की संवैधानिक समय-सीमा पहले ही बीत चुकी है, लेकिन इसके बावजूद दीपक प्रकाश अब भी गैर-कानूनी तरीके से मंत्री पद पर आसीन हैं.
अनुच्छेद 164(4) का उल्लंघन
यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर की गई है. याचिका में संविधान के ‘अनुच्छेद 164(4)’ का हवाला देते हुए मांग की गई है कि मंत्री दीपक प्रकाश से ‘कारण बताओ’ (Quo Warranto) पूछा जाए कि वे किस संवैधानिक और कानूनी आधार पर अपने पद पर बने हुए हैं. साथ ही, 7 मई 2026 को हुई उनकी दोबारा नियुक्ति को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित किया जाए.
संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो राज्य विधायिका (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य नहीं है, वह अधिकतम 6 महीने की अवधि तक ही मंत्री पद पर रह सकता है. इस 6 महीने की अवधि के भीतर यदि वह सदन का सदस्य बनने में विफल रहता है, तो उसे अनिवार्य रूप से मंत्री पद छोड़ना पड़ता है.
कार्यकाल में ब्रेक देकर दोबारा बनाया मंत्री
पहली नियुक्ति: दीपक प्रकाश को 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में पहली बार पंचायती राज मंत्री बनाया गया था. उस समय भी वे बिहार विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे. इस लिहाज से उनकी 6 महीने की संवैधानिक सीमा मई 2026 में समाप्त हो गई थी.
सत्ता परिवर्तन: इसी बीच अप्रैल 2026 में बिहार में राजनीतिक घटनाक्रम बदला और नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद पूरी मंत्रिपरिषद भंग हो गई. इसके बाद 15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी ने बिहार के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.
पुनर्नियुक्ति का विवाद: लगभग 22 दिनों तक दीपक प्रकाश मंत्री पद पर नहीं रहे. लेकिन 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल के विस्तार में उन्हें दोबारा पंचायती राज मंत्री बना दिया गया.
याचिका में सीधा आरोप लगाया गया है कि राज्य सरकार ने 6 महीने की संवैधानिक सीमा को दरकिनार करने के लिए जानबूझकर कार्यकाल के बीच में 22 दिनों का कृत्रिम ब्रेक (विराम) दिखाया और उसी व्यक्ति को दोबारा मंत्री पद की शपथ दिला दी. याचिकाकर्ता का कहना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संसदीय लोकतंत्र की मर्यादा, संवैधानिक जवाबदेही और कार्यपालिका (Executive) की शक्तियों की सीमाओं की रक्षा से जुड़ा हुआ गंभीर प्रश्न है.
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सॉफ्टवेयर इंजीनियर से पंचायती राज मंत्री तक का सफर
37 वर्षीय दीपक प्रकाश के शैक्षणिक और पेशेवर करियर का जिक्र करते हुए याचिका में बताया गया है कि उन्होंने प्रतिष्ठित संस्थान एमआईटी (MIT), मणिपाल से कंप्यूटर साइंस में बीटेक (B.Tech – 2011) की डिग्री हासिल की है. इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद दीपक ने वर्ष 2011 से 2013 तक एक कॉर्पोरेट कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में भी कार्य किया था. अब 4 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट इस बात का फैसला करेगा कि उनकी यह पुनर्नियुक्ति संविधान के दायरे में है या नहीं.
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