IIT कैंपस, तनाव में बैठा छात्र, रिजर्वेशन मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन का प्रतीकात्मक विजुअल, PC-@Chatgpt
IIT IIM Student Suicide NTF Report: भारत में आरक्षण और मेधा पर बहस अक्सर दो ध्रुवों के बीच बंट जाती है-एक पक्ष इसे सामाजिक न्याय का अंतिम सत्य मानता है, तो दूसरा प्रतिभा के साथ अन्याय. लेकिन इस वैचारिक खींचतान में वह छात्र कहीं गुम हो जाता है, जो देश के सबसे प्रतिष्ठित परिसरों (IIT और IIM) में प्रवेश तो पा लेता है, लेकिन वहां के अनकहे दबाव में बिखर जाता है.
IIT दिल्ली में छात्रों की आत्महत्याओं के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी राष्ट्रीय टास्क फोर्स (NTF) की 211 पन्नों की अंतरिम रिपोर्ट, संसद में पेश आधिकारिक आंकड़े, रोहिणी आयोग के निष्कर्ष और ASER की शिक्षा रिपोर्ट मिलकर एक ऐसी कड़वी सच्चाई बयां करते हैं, जिसे अब नारों से ऊपर उठकर तथ्यों के आधार पर समझना जरूरी हो गया है.
आंकड़ों का दर्पण: हर छात्र को झेलनी पड़ रही चोट
संसद में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों(IIT IIM Student Suicide NTF Report) के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में केंद्रीय विश्वविद्यालयों, IIT और IIM से 13,600 से अधिक आरक्षित वर्ग के छात्रों ने पढ़ाई छोड़ी. इनमें IIT के 3,542 छात्र (लगभग 60% आरक्षित) और 98 आत्महत्याएं शामिल हैं.
हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2017-19 के दौरान IIT छोड़ने वाले 2,461 छात्रों में से 1,290 (52.4%) छात्र सामान्य वर्ग के थे. साफ है कि प्रीमियर संस्थानों की दीवारें हर उस छात्र को चोट पहुंचाती हैं जो वहां अकेला पड़ जाता है; फर्क बस इतना है कि एक वर्ग का दर्द बहस में आता है और दूसरे का नहीं.
सुप्रीम कोर्ट टास्क फोर्स का निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट की नेशनल टास्क फोर्स (NTF) ने अपनी रिपोर्ट में ड्रॉपआउट के 4 प्रमुख कारण बताए हैं:
‘वाइब चेक’ का दबाव: अंग्रेजी लहजे, स्कूल, कोचिंग-हब और आर्थिक हैसियत के आधार पर बनने वाले सामाजिक दायरे.
निर्मम प्रतिस्पर्धा व ट्रांजिशन शॉक: स्कूल का टॉपर छात्र जब अपने जैसे ही प्रतिभाशाली साथियों के बीच पहुंचता है, तो CGPA और पैकेज की होड़ में उसका आत्मविश्वास डगमगा जाता है.
फैकल्टी में असंतुलन: राष्ट्रीय संस्थानों में 67.71% फैकल्टी सामान्य वर्ग से है, जबकि SC/ST का प्रतिनिधित्व बेहद कम है.
कमजोर मानसिक स्वास्थ्य तंत्र: 90% से अधिक फैकल्टी स्वीकार करती है कि वे छात्रों में तनाव के शुरुआती लक्षण पहचानने में प्रशिक्षित नहीं हैं.
समस्या की असली जड़ क्या?
वार्षिक शिक्षा रिपोर्ट (ASER 2023-24) के अनुसार, ग्रामीण भारत में 14 से 18 वर्ष के 26% बच्चे अपनी क्षेत्रीय भाषा में कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पाते और 56.7% साधारण भाग (Division) का सवाल हल नहीं कर पाते. जब करोड़ों बच्चों की स्कूली नींव ही कमजोर है, तो 18 साल की उम्र में केवल सीटों के बंटवारे से यह खाई कैसे पटेगी? प्रवेश का पैमाना अलग हो सकता है, लेकिन IIT का पाठ्यक्रम सबके लिए एक है—प्रवेश और पढ़ाई की कसौटी का यही अंतर छात्रों को ‘ट्रांजिशन शॉक’ देता है.
क्या आरक्षण का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा?
OBC उप-वर्गीकरण के लिए गठित न्यायमूर्ति जी. रोहिणी आयोग ने खुलासा किया कि केंद्रीय नौकरियों और IIT-IIM की 97% आरक्षित सीटें OBC की केवल 25% सक्षम उप-जातियों तक सिमट कर रह गईं, जबकि 37% जातियों का प्रतिनिधित्व शून्य रहा.
वहीं, सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की पीठ ने भी SC-ST के भीतर उप-वर्गीकरण और ‘क्रीमी लेयर’ को लागू करने की वकालत की है. इसके अलावा, EWS आरक्षण (10%) ने माना कि आर्थिक तंगी जाति में बंधी नहीं है. बक्सर या बलिया के हिंदी माध्यम का गरीब छात्र भी इसी आर्थिक और सामाजिक दीवार से टकराता है.
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कोटा बढ़ाने से ज्यादा व्यवस्था सुधारने पर जोर
टास्क फोर्स और विशेषज्ञों ने कोटा बढ़ाने के बजाय बुनियादी ढांचा सुधारने की सिफारिश की है:
स्कूली नींव में सुधार: असली लड़ाई कक्षा 3 से 8 के बीच है; पिछड़े जिलों में नवोदय जैसे उत्कृष्ट मॉडल स्कूल बनाए जाएं.
सबके लिए ब्रिज प्रोग्राम: ग्रामीण, हिंदी माध्यम और पहली पीढ़ी के हर छात्र को मुख्य पढ़ाई शुरू होने से पहले तैयारी का अवसर मिले.
पारदर्शी और न्यायपूर्ण मदद: फीस, हॉस्टल और स्कॉलरशिप का आधार पारिवारिक आय और वास्तविक जरूरत हो, ताकि हर वर्ग का गरीब छात्र संभल सके.
सहानुभूतिपूर्ण काउंसलिंग: गोपनीय मानसिक स्वास्थ्य सहायता का ढांचा तैयार किया जाए, जिसका अकादमिक रिकॉर्ड पर कोई बुरा असर न पड़े.
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-भारत एक्सप्रेस
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