वह महान राजा राजेन्द्र चोल थे-राजा राज चोल के पुत्र. उनके शासनकाल में चोल साम्राज्य न केवल दक्षिण भारत बल्कि हिंद महासागर के विशाल हिस्से पर अपना प्रभाव जमा चुका था. राजेन्द्र चोल की नौसेना ने श्रीलंका को जीता, मालदीव पर नियंत्रण किया और 1025 ईस्वी के आसपास श्रीविजय साम्राज्य (आज के मलेशिया-इंडोनेशिया क्षेत्र) तक अभियान चलाकर ‘कदारम कोंडन’ (कदारम विजेता) की उपाधि अर्जित की. यह कोई तटीय या ‘ब्राउन वॉटर’ बेड़ा नहीं था; यह खुले समुद्र में लंबी दूरी के अभियान चलाने में सक्षम वास्तविक ब्लू-वॉटर नौसेना थी.
इतिहास की किताबों में चोल साम्राज्य को कम जगह क्यों?
फिर भी भारतीय इतिहास की मुख्यधारा की किताबों में चोल साम्राज्य का उल्लेख अपेक्षाकृत कम जगह पाता है. मौर्य, गुप्त, दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य को जितना विस्तार मिलता है, उतना दक्षिण की महान शक्तियों – चोल, पांड्य, चालुक्य या विजयनगर – को नहीं मिलता. संसदीय समितियों ने भी इस असंतुलन की ओर इशारा किया है. कई इतिहासकारों और टिप्पणीकारों का मानना है कि औपनिवेशिक काल से चली आ रही दिल्ली-केंद्रित दृष्टि, फारसी स्रोतों की अधिक उपलब्धता और बड़े केंद्रीकृत साम्राज्यों पर जोर देने की प्रवृत्ति ने दक्षिण भारतीय राजवंशों को ‘क्षेत्रीय’ बना दिया. स्वतंत्रता के बाद NCERT जैसी संस्थाओं द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रमों में भी यह पूर्वाग्रह कुछ हद तक जारी रहा. हाल के वर्षों में इस पर बहस तेज हुई है – अभिनेता आर. माधवन सहित कई आवाजें चोल और पांड्य साम्राज्यों को पर्याप्त जगह न मिलने की आलोचना कर चुकी हैं.
चोलों की समुद्री शक्ति सिर्फ क्षेत्रीय गौरव का मुद्दा नहीं
यह सिर्फ क्षेत्रीय गौरव का मुद्दा नहीं है. चोल साम्राज्य ने प्रशासन, मंदिर वास्तुकला (बृहदेश्वर मंदिर), कांस्य मूर्तिकला और समुद्री व्यापार के क्षेत्र में जो योगदान दिया, वह भारत की वैश्विक उपस्थिति का महत्वपूर्ण अध्याय है. उनकी नौसेना ने दक्षिण-पूर्व एशिया तक भारतीय संस्कृति, व्यापार और प्रभाव पहुँचाया. इसे नजरअंदाज करना पूरे भारतीय इतिहास को अधूरा छोड़ देता है.
भारतीय नौसेना के नए ध्वज में शिवाजी की राजमुद्रा
इसी संदर्भ में भारतीय नौसेना के नए ध्वज (2022) का प्रसंग भी महत्वपूर्ण हो जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा INS विक्रांत के कमीशनिंग के अवसर पर अनावरण किए गए नए एन्साइन में छत्रपति शिवाजी महाराज के राजमुद्रा (अष्टकोणीय मुहर) से प्रेरणा ली गई. आधिकारिक बयान में कहा गया कि यह औपनिवेशिक अवशेषों (सेंट जॉर्ज क्रॉस) से मुक्ति और शिवाजी की समुद्री दृष्टि का सम्मान है. शिवाजी और बाद में कान्होजी आंग्रे की नौसेना ने कोंकण तट पर यूरोपीय शक्तियों को चुनौती दी और तटीय सुरक्षा का मजबूत तंत्र बनाया – यह निर्विवाद है.
लेकिन कई नौसेना विशेषज्ञों और इतिहासकारों ने ठीक ही सवाल उठाया कि ब्लू-वॉटर नौसेना का प्रतीक चुनते समय चोल साम्राज्य की विशाल समुद्री परंपरा को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई. मराठा नौसेना मुख्यतः तटीय (littoral) थी, जबकि चोल नौसेना खुले महासागर में अभियान चलाती थी. ‘द वायर’ जैसी रिपोर्टों में भी इस अंतर को रेखांकित किया गया था. प्रतीक चुनना राजनीतिक और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं का मामला भी होता है, लेकिन ऐतिहासिक सच्चाई यह है कि भारत की सबसे प्रभावशाली पूर्व-आधुनिक समुद्री शक्ति चोल ही थे.
चोल विरासत को समझना आज क्यों जरूरी है?
इतिहास लेखन कभी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होता. स्रोत, उपलब्धता, राजनीतिक माहौल और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं उस पर असर डालती हैं. लेकिन एक राष्ट्र के रूप में हमें सभी क्षेत्रों की उपलब्धियों को संतुलित तरीके से प्रस्तुत करना चाहिए. चोल साम्राज्य को महज ‘दक्षिण भारतीय इतिहास’ कहकर सीमित करना उतना ही गलत है जितना मराठा या मुगल योगदान को नकारना.
आज जब भारत अपनी समुद्री शक्ति को फिर से मजबूत कर रहा है, तो राजेन्द्र चोल की विरासत को याद रखना सिर्फ गर्व का विषय नहीं, बल्कि रणनीतिक और सांस्कृतिक आवश्यकता भी है. इतिहास की किताबों में जगह मिले या न मिले, समुद्र की लहरें चोल नौसेना की गाथा अभी भी सुनाती हैं.
-भारत एक्सप्रेस
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