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अमेरिका-चीन में 30 अरब डॉलर पर टैरिफ घटा, हाथ मिलाते ही भारत को कितना हो सकता है नुकसान?

US China Trade Deal: अमेरिका और चीन ने वॉशिंगटन वार्ता के बाद 30 अरब डॉलर के आयात पर टैरिफ घटाने का ऐलान किया है.

US-China tariffs reduced on $30 billion

अमेरिका-चीन में 30 अरब डॉलर पर टैरिफ घटा

US China Trade Deal: पिछले कुछ सालों से अमेरिका और चीन के बीच व्यापार को लेकर लगातार खींचतान चल रही थी. दोनों देश एक-दूसरे पर टैक्स बढ़ा रहे थे. लेकिन अब खबर आ रही है कि दोनों ने बिना ज्यादा शोर मचाए कई मुद्दों पर हाथ मिला लिया है. चीन के वाणिज्य मंत्रालय यानी MOFCOM ने 28 सितंबर को बताया है कि दोनों देशों ने 30 अरब डॉलर के आयात पर लगने वाला टैरिफ कम करने का फैसला किया है.

ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात ने बदला खेल

बताया जा रहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वॉशिंगटन में तीन दिन तक चला शिखर सम्मेलन हुआ. इसी मीटिंग में दोनों नेताओं के बीच 8 पॉइंट पर सहमति बनी. इसी सहमति के तहत तय हुआ कि दोनों देश एक-दूसरे के 30-30 अरब डॉलर के सामान पर टैरिफ घटाएंगे. भारतीय करेंसी में ये रकम करीब ढाई लाख करोड़ रुपये होती है. अब चीन ने इस पर अमल शुरू कर दिया है.

किन सामानों पर घटेगा टैक्स?

इस नई डील के बाद अमेरिका को बड़ा फायदा होने वाला है. चीन ने अमेरिकी कृषि प्रोडक्ट्स, सी-फूड और मेडिकल डिवाइस पर लगने वाले टैरिफ में राहत देने का फैसला किया है. वहीं अमेरिका ने भी चीन के खिलौने और घर में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक सामानों पर टैक्स कम करने की हामी भरी है. मतलब दोनों तरफ के सामान अब थोड़े सस्ते हो जाएंगे.

ट्रेड डील की तारीख भी बढ़ाई गई

सिर्फ टैरिफ घटाना ही नहीं, दोनों देशों ने अपने पुराने व्यापार समझौते जिसे बुसान समझौता कहा जाता है, उसकी मियाद भी बढ़ा दी है. अब ये समझौता 10 जनवरी 2027 तक लागू रहेगा. इसके अलावा दोनों देश एक नया प्लेटफॉर्म शुरू करने जा रहे हैं जिसका नाम U.S.-China Super Intelligence Dialogue रखा गया है. इस पर दोनों देश AI और नई टेक्नोलॉजी को लेकर बातचीत करेंगे.

भारत को अब तक मिल रहा था फायदा

जब से अमेरिका और चीन के बीच लड़ाई चल रही थी, तब से भारत को इसका अप्रत्यक्ष फायदा मिल रहा था. कई बड़ी कंपनियां चीन से निकलकर भारत में फैक्ट्री लगाने की सोच रही थीं. अमेरिका भी भारत को अपना करीबी साझेदार मानकर चल रहा था. लेकिन अब जब दोनों महाशक्तियां आपस में समझौता कर रही हैं तो भारत के लिए थोड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है.

भारतीय सामानों पर पड़ेगा असर?

अमेरिका में चीनी खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स और रोजमर्रा के सामानों पर टैरिफ कम होने से वो सामान अमेरिकी मार्केट में सस्ता हो जाएगा. ऐसे में भारतीय कंपनियों का जो इंजीनियरिंग का सामान और कंज्यूमर प्रोडक्ट अमेरिका जाता है, उसे तगड़ा कॉम्पिटिशन झेलना पड़ेगा. भारतीय सामान महंगा लग सकता है और चीनी सामान सस्ता बिकेगा.
मेक इन इंडिया पर भी ब्रेक लग सकता है

मेक इन इंडिया पर भी ब्रेक लग सकता है?

अमेरिका-चीन के बीच तनाव कम होने से एक और नुकसान भारत को हो सकता है. जो विदेशी कंपनियां चीन को छोड़कर भारत में मैन्युफैक्चरिंग शिफ्ट करने का प्लान बना रही थीं, अब वो अपना फैसला टाल सकती हैं. उन्हें लगेगा कि जब अमेरिका और चीन में ही सब ठीक हो रहा है तो चीन में ही बने रहना बेहतर है. इससे भारत के मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के सपने को झटका लग सकता है.

क्या भारत के लिए ये खतरे की घंटी है?

ये नई दोस्ती भारत के लिए सीधा खतरा नहीं है, लेकिन अप्रत्यक्ष दबाव जरूर बनाती है. अमेरिका और चीन AI के नियम और ग्लोबल स्टैंडर्ड आपस में मिलकर तय करने लगे तो भारत जैसे उभरते टेक्नोलॉजी देश को साइडलाइन किया जा सकता है. अमेरिका का ध्यान अगर चीन से लड़ने की बजाय उसके साथ डील करने पर रहेगा, तो इंडो-पैसिफिक इलाके में भारत की जो अहम भूमिका है, वो कमजोर पड़ सकती है.

मजबूरी में हुआ समझौता

वैसे ये समझौता दोस्ती से ज्यादा मजबूरी में हुआ है. अमेरिका को अपने देश में बढ़ती महंगाई को काबू करना है और रेयर अर्थ जैसी जरूरी चीजों की सप्लाई चेन को सुरक्षित रखना है. वहीं चीन का निर्यात पिछले कुछ महीनों से सुस्त पड़ा है, उसे अमेरिकी बाजार की सख्त जरूरत है. इसलिए दोनों ने अपने फायदे के लिए हाथ मिलाया है.

ईरान और एनर्जी पर भी बनी बात

सूत्रों की मानें तो दोनों देशों ने ईरान संकट और ग्लोबल एनर्जी क्राइसिस जैसे मुद्दों पर भी एक अनकही समझ बना ली है. खासकर होर्मुज स्ट्रेट जैसे संवेदनशील इलाके को लेकर दोनों ने एक-दूसरे को नुकसान न पहुंचाने का फॉर्मूला अपनाया है. ये दिखाता है कि भू-राजनीति में कोई परमानेंट दुश्मन नहीं होता.

भारत के लिए इसमें सबक क्या है?

भारत के लिए सबसे बड़ी सीख यही है कि इंटरनेशनल रिलेशन में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, सिर्फ अपने हित स्थायी होते हैं. अगर अमेरिका और चीन ताइवान और साउथ चाइना सी जैसे मुद्दों पर आपस में समझ बना लेते हैं, तो हिंद महासागर में चीन का हौसला और बढ़ सकता है, जो भारत के लिए चिंता की बात होगी.

क्या भारत के लिए कुछ अच्छा भी है?

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. अमेरिका-चीन के बीच ट्रेड वॉर थमने से दुनिया में मंदी का खतरा कम होगा. एनर्जी के दाम भी स्थिर रह सकते हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर है. ग्लोबल सप्लाई चेन सुधरेगी तो भारत के आयात-निर्यात को भी फायदा मिलेगा.

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आगे भारत को क्या करना चाहिए?

ये अमेरिका-चीन की नजदीकी भारत के लिए अस्तित्व का संकट नहीं है, बल्कि अलर्ट रहने का सिग्नल है. भारत को समझना होगा कि अमेरिका अपने आर्थिक फायदे के लिए किसी से भी हाथ मिला सकता है. इसलिए भारत को अपनी PLI स्कीम, डिफेंस प्रोडक्शन और मैन्युफैक्चरिंग को और मजबूत करना होगा. हमें ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी जगह ऐसी बनानी होगी कि कोई भी दो बड़ी ताकतें भारत को इग्नोर न कर पाएं.

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-भारत एक्सप्रेस



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