आमतौर पर देशभर में रामलीला की शुरुआत शारदीय नवरात्र से होती है और यह 10-12 दिनों में दशहरा के साथ संपन्न हो जाती है. लेकिन धर्मनगरी काशी के रामनगर में एक ऐसी रामलीला खेली जाती है, जो मात्र एक नाटक नहीं बल्कि 220 से अधिक वर्षों पुरानी जीवंत संस्कृति है.
यूनेस्को की ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ में शामिल रामनगर की रामलीला (Ramnagar Ramlila Varanasi) में न तो मॉडर्न एलईडी लाइटें इस्तेमाल होती हैं और न ही लाउडस्पीकर. बिना किसी माइक और पर्दे के, पेट्रोमैक्स (लालटेन) की मद्धम रोशनी में अगले 31 दिनों तक पूरा रामनगर शहर ही रामायण का जीवंत रंगमंच बना रहेगा.
1783 में काशी नरेश ने रखी थी नींव(Ramnagar Ramlila Varanasi )
रामनगर की इस विश्वप्रसिद्ध रामलीला की शुरुआत साल 1783 में काशी के तत्कालीन राजा उदित नारायण सिंह ने कराई थी. उनका उद्देश्य भगवान श्री राम के पावन चरित्र और उनके आदर्शों को बिना किसी आडंबर के जन-जन तक पहुंचाना था. इस रामलीला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बोला जाने वाला एक-एक संवाद और चौपाई हूबहू गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ पर आधारित होता है, जिसमें आज तक एक शब्द का फेरबदल नहीं किया गया है.
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नवरात्र नहीं, अनंत चतुर्दशी से 31 दिनों तक आयोजन
देशभर की रामलीलाओं से अलग, रामनगर में रामलीला का मंचन नवरात्रों में नहीं बल्कि भाद्रपद की अनंत चतुर्दशी के दिन से शुरू होता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन लंकापति रावण का जन्म हुआ था. यही कारण है कि यह रामलीला 10 दिनों की न होकर पूरे 31 दिनों तक अनवरत चलती है. आज भी पुरानी परंपरा को निभाते हुए काशी नरेश अपने शाही ठाठ-बाट के साथ हाथी पर सवार होकर रोजाना इस लीला को देखने और आरती में शामिल होने पधारते हैं.
पूरा शहर ही बन जाता है रामायण का सेट
आम रामलीलाओं में एक ही मंच (Stage) पर सारे दृश्य दिखाए जाते हैं, लेकिन रामनगर में पूरा शहर ही रामायण का मैदान बन जाता है. यहां अयोध्या नगरी, जनकपुरी, पंचवटी, अशोक वाटिका और लंका के लिए पूरे रामनगर में अलग-अलग स्थायी स्थल और मंच बने हुए हैं. दर्शकों को पूरी रामलीला देखने के लिए कलाकारों के साथ-साथ हर दिन शहर के अलग-अलग लोकेशनों पर पैदल चलना पड़ता है. इसी बेजोड़ और अनोखे स्वरूप को देखते हुए यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया था.
बिना टेक्नोलॉजी के हजारों दर्शकों तक पहुंच
डिजिटल युग और आधुनिकता के इस दौर में भी रामनगर की रामलीला में कोई साउंड सिस्टम या माइक इस्तेमाल नहीं होता. व्यासजी और पात्र (स्वरूपी) अपनी बुलंद प्राकृतिक आवाज में ही संवाद बोलते हैं, जो शांति के माहौल में हजारों की भीड़ तक साफ पहुंचती है. वहीं, आधुनिक फ्लड लाइटों की जगह डीजल और तारपीन के तेल के मिश्रण से जलने वाली पारंपरिक पेट्रोमैक्स (मशाल/लालटेन) की रोशनी का उपयोग किया जाता है, जो माहौल को त्रेतायुग जैसा दिव्य बना देती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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