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ग्रीन रिवोल्यूशन 2.0: कैसे सूर्य प्रताप शाही ने यूपी की कृषि अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाया

UP Agriculture में डिजिटल खेती, कृषि रिसर्च, प्राकृतिक खेती, सोलर पंप और बेहतर बाजार व्यवस्था पर जोर बढ़ रहा है. जानें ग्रीन रिवोल्यूशन 2.0 के प्रमुख पहलू.

UP Green Revolution 2.0

जानें ग्रीन रिवोल्यूशन 2.0 के प्रमुख पहलू

Edited by Sahil Singh

UP Green Revolution 2.0: उत्तर प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था में ग्रीन रिवोल्यूशन 2.0 का एक व्यावहारिक रूप देखने को मिल रहा है. इसमें ज्यादा उत्पादन, बेहतर बाजार पहुंच, तकनीक का समझदारी से इस्तेमाल और मिट्टी व जलवायु को मजबूत बनाने पर जोर दिया जा रहा है. कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही के नेतृत्व में राज्य का एजेंडा तेजी से शोध संस्थानों, डिजिटल सिस्टम, सौर ऊर्जा, प्राकृतिक खेती और किसानों तक पहुंच को एक साथ जोड़कर कृषि के आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है. इसका नतीजा किसी एक योजना के रूप में नहीं, बल्कि इस बदलाव के तौर पर सामने आ रहा है कि देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य में खेती की योजना कैसे बनाई जाती है, उसे किसानों तक कैसे पहुंचाया जाता है और कृषि पर चर्चा कैसे की जाती है.

उत्तर प्रदेश के लिए ग्रीन रिवोल्यूशन 2.0 का क्या मतलब है?

ग्रीन रिवोल्यूशन 2.0 का मतलब पहली हरित क्रांति के सिर्फ ज्यादा उपज देने वाले बीज, सिंचाई और उर्वरकों पर ध्यान देने से आगे बढ़कर एक संतुलित मॉडल अपनाना है. इसमें उत्पादन के साथ टिकाऊ खेती, आंकड़ों के साथ स्थानीय जानकारी और बाजार तक पहुंच के साथ किसानों की मजबूती पर जोर है. पहली हरित क्रांति ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत कई इलाकों में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में मदद की थी. लेकिन आज की चुनौती इससे कहीं बड़ी है. किसानों को स्थिर आय, बेहतर मिट्टी, कम जोखिम और बदलते मौसम से निपटने के लिए बेहतर साधनों की जरूरत है.

उत्तर प्रदेश में इस नए दौर की झलक इस बात से मिलती है कि अब नीतिगत चर्चाओं में प्रिसिजन एग्रीकल्चर, डिजिटल सलाह, जलवायु के अनुकूल किस्में, जैविक खेती के तरीके, सोलर पंप, प्राकृतिक खेती और कृषि उत्पादों में वैल्यू एडिशन जैसे मुद्दे शामिल हो रहे हैं. शाही की भूमिका कृषि को सिर्फ उत्पादन के रूप में देखने के बजाय एक ऐसे पूरे सिस्टम के रूप में पेश करने की रही है, जो विज्ञान, कृषि विस्तार, ऊर्जा, मंडियों, प्रमाणन और ग्रामीण कारोबार को जोड़ता है. उदाहरण के लिए, ICAR-ATARI, कानपुर में उनके दौरे को लेकर ICAR के नोट में किसानों तक कृषि अनुसंधान और तकनीक पहुंचाने पर उनके जोर को टिकाऊ कृषि विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है.

विज्ञान और पहुंच पर आधारित आधुनिकीकरण का एजेंडा

उत्तर प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव खेती के लिए योजना आधारित सहायता से ज्ञान आधारित सहायता की ओर बढ़ना है. बीज, सब्सिडी और सरकारी खरीद अभी भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अब ये अकेले पर्याप्त नहीं हैं. किसानों को समय पर मौसम की जानकारी, फसल संबंधी सलाह, मिट्टी की जानकारी, कीटों से जुड़ी चेतावनी और स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के हिसाब से नई किस्मों की जानकारी भी चाहिए.

यही वजह है कि शोध आधारित खेती पर शाही का बार-बार जोर ग्रीन रिवोल्यूशन 2.0 की कहानी का एक अहम हिस्सा है. राज्य स्तरीय खरीफ उत्पादकता सेमिनार 2025 में उन्होंने कथित तौर पर नवाचार, शोध, जलवायु के अनुकूल खेती, उन्नत फसल किस्मों और आधुनिक तकनीकों पर जोर दिया. साथ ही उन्होंने कंपोस्ट और हरी खाद जैसी जैविक और प्राकृतिक खेती की पद्धतियों को बढ़ावा देने की बात भी कही.

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश एक जैसा कृषि क्षेत्र नहीं है. पूर्वी यूपी, बुंदेलखंड, पश्चिमी यूपी और मध्य जिलों में मिट्टी, पानी, फसल और बाजार की परिस्थितियां अलग-अलग हैं. आधुनिक कृषि अर्थव्यवस्था एक जैसी सलाह पर निर्भर नहीं रह सकती. इसके लिए स्थानीय स्तर पर शोध, सक्रिय कृषि विज्ञान केंद्र, खेतों में प्रदर्शन और किसानों व वैज्ञानिकों के बीच लगातार फीडबैक की जरूरत है.

डिजिटल कृषि बदल रही है किसानों के फैसले लेने की प्रक्रिया

उत्तर प्रदेश में कृषि के आधुनिकीकरण का एक सबसे साफ संकेत डिजिटल कृषि की ओर बढ़ता कदम है. 2024 में राज्य कैबिनेट के एक फैसले में डिजिटल कृषि नीति की दिशा को मंजूरी दी गई, जिसमें किसानों को तकनीकी सुविधाएं, मौसम की जानकारी और तकनीकी सलाह देने के लिए डेटा के इस्तेमाल की बात कही गई.

यह सुनने में प्रशासनिक बात लग सकती है, लेकिन इसका व्यावहारिक फायदा सीधा है साथ ही सही समय पर बेहतर फैसला. अगर किसी किसान को बुवाई, सिंचाई, खाद डालने या कीट नियंत्रण से पहले उसके इलाके के हिसाब से सलाह मिलती है, तो खेती अनुमान के भरोसे कम और जानकारी के आधार पर ज्यादा होती है. समय के साथ यही वह जगह है जहां छोटे किसानों के लिए भी प्रिसिजन एग्रीकल्चर उपयोगी हो जाता है.

प्रिसिजन फार्मिंग का मतलब यह जरूरी नहीं है कि महंगे रोबोट या बड़े कॉरपोरेट फार्म ही हों. उत्तर प्रदेश के संदर्भ में इसकी शुरुआत इन चीजों से हो सकती है:

  • मौसम से जुड़ी सलाह, जिससे किसान बुवाई, सिंचाई या छिड़काव से जुड़े फैसलों में बदलाव कर सकें.
  • मिट्टी और पोषक तत्वों से जुड़ी जानकारी, ताकि खाद का इस्तेमाल सिर्फ परंपरा के आधार पर न होकर जरूरत के हिसाब से हो.
  • फसल की किस्मों की सलाह, जो स्थानीय मौसम, पानी की उपलब्धता और बीमारी के खतरे के आधार पर दी जाए.
  • डिजिटल बाजार की जानकारी, जिससे किसानों को कीमतों का बेहतर अंदाजा हो और अनौपचारिक चैनलों पर निर्भरता कम हो.
  • रिमोट मॉनिटरिंग और डेटा संग्रह, जिससे विभाग फसल में तनाव, बीमारी या नुकसान की पहचान जल्दी कर सकें.

इस तरह डिजिटल उपकरण उत्पादकता और टिकाऊ खेती, दोनों को बढ़ावा दे सकते हैं. लक्ष्य सिर्फ तकनीक का इस्तेमाल करना नहीं है. लक्ष्य बर्बादी कम करना, सही समय पर सही काम करना और किसानों को बीज, खाद, मजदूरी या सिंचाई में पैसा लगाने से पहले ज्यादा भरोसे के साथ फैसला लेने में मदद करना है.

शाही के मॉडल में टिकाऊ खेती कैसे फिट होती है?

शाही के मॉडल में टिकाऊ खेती को आधुनिक खेती से पीछे हटने के बजाय उत्पादकता की एक रणनीति के तौर पर देखा गया है. राज्य की दिशा यह बताती है कि बेहतर बीज, वैज्ञानिक सलाह, मिट्टी को फिर से उपजाऊ बनाने वाली खेती, प्राकृतिक इनपुट और पानी व ऊर्जा के बेहतर प्रबंधन को साथ अपनाकर ज्यादा उत्पादन और पर्यावरण की जिम्मेदारी दोनों को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है.

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज खेती को गर्मी के बढ़ते दबाव, अनियमित बारिश, बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती गुणवत्ता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. जलवायु के अनुकूल खेती का तरीका किसानों को इन जोखिमों के हिसाब से खुद को बदलने में मदद करता है, साथ ही खेती को आर्थिक रूप से व्यवहारिक बनाए रखने पर भी जोर देता है. इसमें सूखा सहने वाली किस्में, फसल विविधीकरण, मिट्टी में जैविक पदार्थ की बहाली, माइक्रो-इरिगेशन, सौर ऊर्जा और फसल अवशेषों का बेहतर प्रबंधन शामिल हो सकता है.

उत्तर प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना भी इसी बड़े बदलाव का हिस्सा है. नीति आयोग के प्राकृतिक खेती पोर्टल के अनुसार, उत्तर प्रदेश ने BPKP दिशानिर्देशों के तहत 35 जिलों में 38,670 हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती लागू करने के लिए एक कार्ययोजना तैयार की थी. राष्ट्रीय स्तर पर भी नीति का रुख इसी दिशा में आगे बढ़ा है. नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग को केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में मंजूरी दी गई है, जिसका उद्देश्य पूरे भारत में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना है.

किसानों के लिए इसका व्यावहारिक संदेश यह नहीं है कि हर खेत को तुरंत रसायन मुक्त कर दिया जाए. इसका मतलब यह है कि मिट्टी की सेहत, इनपुट का बेहतर इस्तेमाल और पर्यावरणीय संतुलन अब खेती की मुख्य अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं. कंपोस्ट बनाना, हरी खाद, जैविक इनपुट, मल्चिंग और फसल चक्र जैसी जैविक खेती की पद्धतियां, अगर सही तरीके और स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से अपनाई जाएं, तो खरीदे जाने वाले इनपुट पर निर्भरता कम कर सकती हैं.

सौर ऊर्जा और कृषि ढांचा भी कृषि अर्थव्यवस्था का हिस्सा

आधुनिक खेती की कहानी ऊर्जा से भी जुड़ी है. सिंचाई, कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग और बाजार तक सामान पहुंचाने के लिए भरोसेमंद और सस्ती बिजली जरूरी है. उत्तर प्रदेश में PM-KUSUM स्वच्छ ऊर्जा और कृषि उत्पादकता के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी रहा है. संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 29 जुलाई 2024 तक इस योजना से राज्य के 51,097 किसानों को लाभ मिला था.

सोलर पंप डीजल और अनियमित बिजली आपूर्ति पर निर्भरता कम कर सकते हैं, लेकिन उनका फायदा सिर्फ लागत बचाने तक सीमित नहीं है. इससे सिंचाई को ज्यादा भरोसेमंद बनाया जा सकता है, समय पर खेती के काम किए जा सकते हैं और खेती में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा से जुड़े उत्सर्जन को कम किया जा सकता है. जब इन्हें पानी के जिम्मेदार इस्तेमाल के साथ जोड़ा जाता है, तो ये सिर्फ एक और सब्सिडी नहीं रहते, बल्कि जलवायु के अनुकूल खेती का हिस्सा बन जाते हैं.

बाजार का ढांचा भी उतना ही महत्वपूर्ण है. राज्य की ओर से जारी जानकारी में ई-मंडी की गतिविधियों, ई-लाइसेंस, ऑनलाइन पर्चियों, जैविक और प्राकृतिक उत्पादों के आउटलेट और सोलर पंप के आवंटन को किसानों की सहायता से जुड़े पूरे सिस्टम का हिस्सा बताया गया है. ये व्यवस्थाएं कृषि अर्थव्यवस्था को सिर्फ कच्चे उत्पादन से आगे बढ़ाकर व्यवस्थित व्यापार, दस्तावेजीकरण और किसानों के लिए बेहतर मूल्य हासिल करने की दिशा में ले जाने में मदद करती हैं.

यूपी के ग्रीन रिवोल्यूशन 2.0 के व्यावहारिक स्तंभ

उत्तर प्रदेश में कृषि के आधुनिकीकरण को पांच आपस में जुड़े स्तंभों के जरिए समझा जा सकता है. इनमें से हर एक दूसरे को मजबूत करता है. यही वजह है कि यह बदलाव किसी एक कार्यक्रम से ज्यादा प्रभावी हो सकता है.

शोध से खेत तक तकनीक और जानकारी पहुंचाना: वैज्ञानिक जानकारी तभी उपयोगी होती है जब वह खेत तक पहुंचे. प्रदर्शन, कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विस्तार से जुड़े कर्मचारी किसानों को यह समझने में मदद करते हैं कि उनकी फसल, मिट्टी और बजट के लिए कौन सी तकनीक सही है.

डिजिटल और प्रिसिजन कृषि: डेटा के आधार पर दी जाने वाली सलाह सही समय पर फैसला लेने में मदद कर सकती है और इनपुट की बर्बादी कम कर सकती है. मोबाइल अलर्ट, मौसम की जानकारी और मिट्टी के आधार पर दी जाने वाली सलाह जैसी बुनियादी सुविधाएं भी छोटे खेतों में खेती को ज्यादा सटीक बना सकती हैं.

पुनर्जीवित और प्राकृतिक खेती के तरीके: पुनर्जीवित खेती, कंपोस्ट का इस्तेमाल, हरी खाद, फसल चक्र और रसायनों पर कम निर्भरता मिट्टी की सेहत को फिर से बेहतर बनाने में मदद करती है. इन तरीकों का सबसे ज्यादा फायदा तब होता है जब किसानों को सिर्फ नारे नहीं, बल्कि प्रशिक्षण दिया जाए.

ऊर्जा और सिंचाई में सुधार: सोलर पंप और पानी का बेहतर प्रबंधन खेतों को ज्यादा मजबूत बना सकते हैं. इसमें जरूरी है कि ऊर्जा की उपलब्धता के साथ भूजल के जिम्मेदार इस्तेमाल को भी जोड़ा जाए.

बाजार और वैल्यू चेन का आधुनिकीकरण: डिजिटल मंडियां, प्रमाणन में मदद, किसान उत्पादक संगठन (FPO), प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग किसानों को फसल कटने के समय होने वाले संकट से आगे निकलने में मदद करते हैं. बेहतर बाजार व्यवस्था कृषि में किए गए नवाचार को आय के अवसर में बदल सकती है.


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उत्तर प्रदेश से बाहर भी यह क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर प्रदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कृषि से जुड़े उसके फैसलों का असर खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और राष्ट्रीय बाजार में कृषि उत्पादों की आपूर्ति पर पड़ता है. अगर एक बड़ा और विविध कृषि राज्य उत्पादकता को टिकाऊ खेती के साथ जोड़ सकता है, तो यह उन दूसरे क्षेत्रों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है जहां छोटे किसानों को पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हुए आधुनिकीकरण की जरूरत है.

शाही के दौर की कृषि की यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें यह बात सामने आती है कि खेती की अगली क्रांति सिर्फ उत्पादन बढ़ाने से नहीं आएगी. यह उन किसानों के जरिए आएगी जो विज्ञान का इस्तेमाल कर सकें, जलवायु से जुड़े दबावों के अनुसार खुद को बदल सकें, मिट्टी की रक्षा कर सकें, बाजार तक पहुंच बना सकें और जानकारी के आधार पर फैसले ले सकें. यही ग्रीन रिवोल्यूशन 2.0 का असली वादा है.

हालांकि, अभी भी कई चुनौतियां हैं. डिजिटल उपकरण किसानों तक ऐसी भाषाओं में पहुंचने चाहिए जिन्हें वे आसानी से समझ सकें. प्राकृतिक खेती को प्रशिक्षण, बदलाव के दौर में सहायता और भरोसेमंद बाजार का समर्थन मिलना जरूरी है. प्रिसिजन एग्रीकल्चर छोटे और सीमांत किसानों की पहुंच के भीतर होना चाहिए. और टिकाऊ खेती का आकलन सिर्फ नीतियों की घोषणाओं से नहीं, बल्कि खेतों, मंडियों और परिवारों की आय में होने वाले बदलाव से किया जाना चाहिए.

-भारत एक्सप्रेस



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