हर साल 30 सितंबर को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस मनाया जाता है. यह दिन उन लोगों के नाम है, जो अलग-अलग भाषाओं के बीच संवाद की राह आसान बनाते हैं. अनुवादक सिर्फ एक भाषा के शब्दों को दूसरी भाषा में नहीं बदलते, बल्कि वे दो अलग समाजों, संस्कृतियों और विचारों को एक-दूसरे के करीब लाने का काम करते हैं.
इस दिन को संत जेरोम की स्मृति से भी जोड़ा जाता है. संत जेरोम को अनुवादकों का संरक्षक संत माना जाता है. चौथी-पांचवीं शताब्दी में उन्होंने बाइबल का लैटिन भाषा में अनुवाद किया था, जिसे बाद में ‘वुल्गेट’ के नाम से जाना गया. खास बात यह थी कि उन्होंने मूल हिब्रू और ग्रीक भाषाओं से सीधे अनुवाद किया, ताकि धार्मिक ग्रंथ ज्यादा लोगों तक पहुंच सके.
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2017 में प्रस्ताव 71/288 के जरिए 30 सितंबर को आधिकारिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस घोषित किया. इसका मकसद अनुवादकों, दुभाषियों और भाषा विशेषज्ञों के योगदान को पहचान देना है.
आज जब दुनिया पहले से कहीं ज्यादा एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, अनुवाद की भूमिका भी बढ़ी है. किसी किताब, कहानी या विचार को दूसरी भाषा में पहुंचाना महज शब्दों का फेरबदल नहीं है. इसके साथ उस समाज की संस्कृति, सोच, परंपरा और जीवन का एक हिस्सा भी दूसरी दुनिया तक पहुंचता है.
खासकर साहित्य में यह काम और मुश्किल हो जाता है. किसी रचना की भाषा के साथ उसका लोकजीवन, मुहावरे, संगीत, भावनाएं और सांस्कृतिक संदर्भ भी जुड़े होते हैं. इन्हें दूसरी भाषा में उसी असर के साथ पेश करना अनुवादक के लिए बड़ी चुनौती होती है.
भोजपुरी के चर्चित उपन्यास ‘फूलसूंघी’ का अंग्रेजी अनुवाद इसी कोशिश की एक खास मिसाल है.
‘फूलसूंघी’ की कहानी पहुंची अंग्रेजी पाठकों तक
डॉ. गौतम चौबे ने भोजपुरी के क्लासिक उपन्यास ‘फूलसूंघी’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया. इसे वर्ष 2020 में पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के हैमिश हैमिल्टन इम्प्रिंट से प्रकाशित किया गया. इसे भोजपुरी उपन्यास के अंग्रेजी में पहले अनुवाद के रूप में उल्लेखित किया जाता है.
‘फूलसूंघी’ मूल रूप से 1977 में भोजपुरी संस्थान, पटना से प्रकाशित हुआ था. इसके बाद यह भोजपुरी साहित्य के पाठकों के बीच अपनी खास पहचान बनाने में सफल रहा.
इस उपन्यास के लेखक पाण्डेय कपिल (1930-2017) को भोजपुरी साहित्य की महत्वपूर्ण हस्तियों में गिना जाता है. उन्होंने लंबे समय तक ‘भोजपुरी सम्मेलन’ पत्रिका का संपादन किया और अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई. युवा लेखकों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने भोजपुरी संस्थान नाम से एक प्रकाशन संस्था भी शुरू की थी.
प्रेम, समाज और औपनिवेशिक बिहार की कहानी
‘फूलसूंघी’ की कहानी औपनिवेशिक बिहार की पृष्ठभूमि में बुनी गई है. इसका कालखंड लगभग 1840 से 1931 के बीच का है. उपन्यास में भोजपुरी लोककवि महेंद्र मिसिर और मशहूर तवायफ ढेलाबाई के अधूरे प्रेम को केंद्र में रखा गया है.
लेकिन यह केवल प्रेम कहानी नहीं है. इसके भीतर उस दौर का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी दिखाई देता है. मुजरे और महफिलों से लेकर जमींदारी व्यवस्था, अदालतों के मामले, नकली मुद्रा और सरयू नदी के किनारे का जीवन—कहानी में उस समय के बिहार की कई तस्वीरें एक साथ सामने आती हैं.
उपन्यास का नाम भी अपने आप में प्रतीकात्मक है. ‘फूलसूंघी’ एक ऐसे पक्षी का नाम है जो फूलों के आसपास मंडराता रहता है और पिंजरे में बंद होने पर मुरझा जाता है. इसे ढेलाबाई की स्वतंत्र प्रवृत्ति और उसके भीतर की आजाद आत्मा के प्रतीक के तौर पर देखा जा सकता है.
भोजपुरी की खुशबू अंग्रेजी में बचाए रखना चुनौती
डॉ. गौतम चौबे दिल्ली विश्वविद्यालय के आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक हैं. वे शिक्षक होने के साथ-साथ अनुवादक और स्तंभकार भी हैं. भोजपुरी साहित्य को व्यापक, खासकर अंतरराष्ट्रीय पाठक वर्ग तक पहुंचाने में उनके काम की भूमिका महत्वपूर्ण रही है.
‘फूलसूंघी’ का अंग्रेजी अनुवाद आसान काम नहीं था. भोजपुरी के लोक मुहावरे, सांस्कृतिक संकेत, संगीत परंपरा और स्थानीय जीवन से जुड़े संदर्भ ऐसी चीजें हैं, जिन्हें सिर्फ शब्दशः अनुवाद करके दूसरी भाषा में सही ढंग से नहीं उतारा जा सकता.
यही वजह है कि साहित्यिक अनुवाद में अनुवादक को मूल रचना के शब्दों के साथ-साथ उसके भाव और माहौल को भी समझना पड़ता है. डॉ. चौबे के अनुवाद के जरिए अंग्रेजी पढ़ने वाले पाठकों को भोजपुरी समाज, उसकी संस्कृति और उस दौर के ऐतिहासिक परिवेश से परिचित होने का अवसर मिला.
अभिनेता मनोज बाजपेयी ने भी ‘फूलसूंघी’ को भोजपुरी कलाकार की धड़कती आत्मा को जीवंत करने वाला उत्कृष्ट उपन्यास बताया है.
क्षेत्रीय भाषाओं के लिए बड़ा रास्ता
‘फूलसूंघी’ का अंग्रेजी में आना सिर्फ एक किताब के दूसरी भाषा में पहुंचने की कहानी नहीं है. यह इस बात की मिसाल भी है कि क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य दूसरी भाषाओं के पाठकों तक कैसे पहुंच सकता है.
भारत जैसे बहुभाषी देश में यह काम खास महत्व रखता है. हिंदी, भोजपुरी, मैथिली, बंगाली, तमिल, मराठी, असमिया या किसी भी दूसरी भारतीय भाषा में लिखा गया साहित्य अपने भीतर किसी खास समाज का अनुभव और इतिहास समेटे रहता है. जब उसका अच्छा अनुवाद होता है, तो वह साहित्य अपनी मूल भाषा की सीमाओं से बाहर निकलकर नए पाठकों तक पहुंचता है.
अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस इसी भूमिका को याद करने का मौका देता है. अनुवाद भाषाओं के बीच दीवार खड़ी करने के बजाय पुल बनाने का काम करता है. ‘फूलसूंघी’ जैसे साहित्यिक अनुवाद यह दिखाते हैं कि किसी क्षेत्र की कहानी, संस्कृति और संवेदनाएं दूसरी भाषा के पाठकों के लिए भी उतनी ही दिलचस्प हो सकती हैं.
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