क्या अखिलेश यादव पर भरोसा करेगा ब्राह्मण समाज?
UP Brahmin Vote Bank: आज से तकरीबन 3 साल पहले 2 अक्टूबर 2023 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में यादव और ब्राह्मण गुटों में हिंसक झड़प हो गई. इस दौरान यादव समुदाय के लोगों ने एक ब्राह्मण के घर में घुसकर उसके परिवार के 5 लोगों की हत्या कर दी. इस मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ लिया. देवरिया से बीजेपी सांसद शलभमणि त्रिपाठी ने इस हत्याकांड को अंजाम देने वालों को कायर और नपुंसक करार दिया.
बीजेपी सांसद के इस बयान पर शिवपाल यादव ने कड़ा पलटवार करते हुए निष्पक्ष न्याय की वकालत की और प्रशासन पर एकतरफा कार्रवाई करने का आरोप लगाया. इस हत्याकांड को भले ही 3 साल बीत गए हों लेकिन घाव अभी भी ताजा हैं.
इसी बीच उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के शिक्षक सीटों पर चुनाव होने हैं. समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने 2 सीटों पर अपने घोषित प्रत्याशियों के टिकट काटकर बीजेपी के बागियों को प्रत्याशी घोषित कर दिया. इनमें डॉ. संजयन त्रिपाठी भी शामिल हैं. संजयन को समाजवादी पार्टी ने गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से टिकट दिया है. त्रिपाठी से पहले इस क्षेत्र से सपा ने कमलेश यादव को टिकट दिया था. शनिवार को जैसे ही अखिलेश यादव ने अपने प्रत्याशियों का ऐलान किया, राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर PDA+ब्राह्मण समीकरण की चर्चा तेज हो गई. राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि अखिलेश यादव ने कमलेश यादव का टिकट काटकर उनकी जगह संजयन त्रिपाठी को टिकट देकर अपने PDA फॉर्मूले को और मजबूत किया है. पर सवाल ये है कि क्या ब्राह्मण अखिलेश यादव पर भरोसा करेगा?
ब्राह्मणों को पाले में करने के लिए व्यूह रच रहे अखिलेश
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव यूपी की योगी सरकार पर लगातार हमला बोल रहे हैं. उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से इस सरकार को ठाकुरों (क्षत्रियों) की सरकार बता रहे हैं. अपने नैरेटिव को और ज्यादा धार देने के लिए हाल के दिनों में वो योगी सरकार से नाराज ब्राह्मण नेताओं को समाजवादी पार्टी में शामिल कर रहे हैं. उन्होंने अपने PDA फॉर्मूले में P का अर्थ पिछड़ा से बदलकर पंडित (ब्राह्मण) कर दिया, ताकि समाजवादी पार्टी में ब्राह्मण खुद को बाहरी न समझें.
प्रबुद्ध सम्मेलन का कर रहे आयोजन
साल 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए अखिलेश यादव लगातार यूपी में प्रबुद्ध सम्मेलनों का आयोजन करा रहे हैं. यह सम्मेलन पार्टी के बड़े ब्राह्मण नेता और अखिलेश के राजनीतिक गुरु कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित किया गया. इसमें काशी, अयोध्या, मथुरा और गोरखपुर जैसे इलाकों से संतों, विद्वानों और बड़े ब्राह्मण चेहरों को जोड़ा गया. इस सम्मेलन का मकसद ब्राह्मण समुदाय को पार्टी से जोड़ना था.
क्या ब्राह्मण करेंगे सपा पर भरोसा?
इस सवाल पर राजनीतिक विश्लेषकों में मतभेद नजर आता है. उनका कहना है कि अभी यह दावा नहीं किया जा सकता कि ब्राह्मण बीजेपी को छोड़कर सपा की तरफ जाएंगे. क्योंकि बीजेपी के कोर वोटबैंक में ब्राह्मण अहम भूमिका में है. चाहे बड़े पदों पर नियुक्ति हो या फिर सीएम योगी के कार्यालय में अहम पद हों. सभी पर ब्राह्मण समुदाय की भूमिका काफी अच्छी नजर आती है.
ऐतिहासिक मतभेद भुलाना नहीं है आसान
समाजवादी पार्टी को पारंपरिक तौर पर मुस्लिम और यादव की पार्टी मानी जाती रही है. पार्टी स्तर को छोड़कर अलग स्थानीय स्तर पर देखें तो कई जिलों में जमीन, निकाय चुनाव और सामाजिक वर्चस्व को लेकर यादव और ब्राह्मणों में कड़ा टकराव रहा है. अखिलेश यादव के लिए इस खाई को पाटना आसान नहीं है.
समाजवादी पार्टी को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा. साल 2012 के विधानसभा चुनाव में जब अखिलेश यादव ने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई थी तब सपा को लगभग 19 प्रतिशत ब्राह्मणों ने वोट किया था. लेकिन साल 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में यह घटकर 6-7 प्रतिशत रह गया.
सबकी ब्राह्मणों पर ही क्यों है नजर?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर दलित और मुस्लिम आबादी को अलग रख दिया जाए, तो ब्राह्मण समुदाय उन जातियों में शामिल है जिनका जनाधार सबसे बड़ा और प्रभाव सबसे व्यापक माना जाता है. यह समुदाय किसी खास क्षेत्र में सीमित न रहकर पूरे यूपी में समान रूप से फैला हुआ है. एक अनुमान के मुताबिक यूपी में 10-12 प्रतिशत जनसंख्या ब्राह्मणों की है. हालांकि पूर्वांचल और अवध में इनका दबदबा ज्यादा दिखाई देता है. जिले वार बात करें तो चंदौली, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, जौनपुर, अमेठी, गोरखपुर, बस्ती सहित करीब 12 जिलों में इस समुदाय की आबादी 15 प्रतिशत से ज्यादा है.
NDTV के मुताबिक विधानसभा क्षेत्रों के लिहाज से यूपी में ब्राह्मण समुदाय 97 से लेकर 115 सीटों पर सीधी पकड़ रखता है. इन सीटों पर ब्राह्मणों की संख्या 15 प्रतिशत से अधिक है. जो किसी भी चुनाव में किंगमेकर की भूमिका निभाते हैं.
ब्राह्मण समुदाय से रहे हैं कई मुख्यमंत्री
उत्तर प्रदेश के अबतक के चुनावी इतिहास में 6 मुख्यमंत्री ब्राह्मण समुदाय से रहे हैं. इनमें नरायण दत्त तिवारी, गोविंद वल्लभ पंत, कमलापति त्रिपाठी कांग्रेस के बैनर तले यूपी का नेतृत्व किया है. साल 1987 में एक ही विधानसभा में 87 ब्राह्मण विधायक चुनकर पहुंचे थे, जो आजतक एक रिकॉर्ड है. इनमें से अधिकतर कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव जीते थे.
कहा जाता है ओपिनियन लीडर
परंपरागत रूप से ब्राह्मण समाज को यूपी की राजनीति में ओपिनियन लीडर माना जाता रहा है. इनमें साक्षरता दर ज्यादा होने और समाजिक संरचना में शीर्ष पर बैठने की वजह से यह समाज बौद्धिक, धार्मिक और सोशल नैरेटिव अपने पक्ष में करने में सफल रहता है. अगर यह समुदाय किसी दल के विरोध में अपना नैरेटिव बनाने लगता है तो वह काफी कारगर माना जाता है.
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शिक्षा, न्यायपालिका, मीडिया और ब्यूरोक्रेसी में पहुंच होने की वजह से इनका सामाजिक प्रतिनिधित्व और प्रभाव हमेशा मजबूत रहा है. यही वजह है कि राज्य की सियासत में ब्राह्मण वोट बैंक हमेशा से सत्ता के समीकरण तय करने वाला अहम फैक्टर रहा है. राजनीतिक विश्वलेषकों का मानना है कि अगर सपा ब्राह्मण समुदाय को लेकर अपना स्पष्ट रुख रखती है तो इस समाज के एक हिस्से का झुकाव उनकी तरफ हो सकता है.
-भारत एक्सप्रेस
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