उज्जैन/मनोज भटनागर: भैरवगढ़ केंद्रीय जेल में श्राद्ध पक्ष के दौरान मानवीय संवेदनाओं और भक्ति का एक अलौकिक और भावुक नजारा देखने को मिला. सलाखों के पीछे सजा काट रहे कैदियों ने न केवल अपने पितरों और पूर्वजों का तर्पण किया, बल्कि कई बंदियों ने अपने पुराने गुनाहों का प्रायश्चित करते हुए उन लोगों की आत्मा की मुक्ति के लिए भी पिंडदान किया, जिनकी हत्या के आरोप में वे जेल के अंदर सजा भुगत रहे हैं. धार्मिक आस्था और पश्चाताप के इस अनोखे संगम ने पूरी जेल के वातावरण को पूरी तरह आध्यात्मिक बना दिया है.
दोस्त की मुक्ति के लिए तर्पण
इस अनोखे महातर्पण में सबसे दिल छू लेने वाली और मार्मिक कहानी 5 साल से जेल में बंद यशवंत सिरासोदिया की है. यशवंत पर अपने ही दोस्त सोनू उर्फ अमन की हत्या का संगीन आरोप है. यशवंत ने नम आंखों से बताया कि 9 सितंबर 2021 को हरितालिका तीज के दिन अनजाने में उससे यह खौफनाक अपराध हो गया था. तब से दोस्त सोनू की आत्मा की शांति के लिए नियमित तर्पण और पिंडदान कर रहा है.
इतना ही नहीं, वह प्रायश्चित के तौर पर 16 श्राद्ध के दौरान सोनू के नाम से गौशालाओं में गायों को चारा-पानी दान करवाता है ताकि मृतक की आत्मा को मोक्ष मिले और उसे अपने भारी अपराधबोध से थोड़ी राहत मिल सके.
जेल प्रशासन की अनूठी पहल
जेल परिसर में आयोजित इस विशेष धार्मिक अनुष्ठान में लगभग 100 पुरुष और 25 महिला बंदियों ने पूरे विधि-विधान से अपने पितरों को जल अर्पित किया. धारा 302 के तहत उम्रकैद या सजा काट रहे कैदी दिलीप ने बताया कि पिता के देहांत के बाद वह जेल में तर्पण करने को लेकर काफी चिंतित था, लेकिन जेल प्रशासन की इस संवेदनशील पहल से उसका यह धार्मिक कर्तव्य पूरा हो पाया.
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भैरवगढ़ जेल अधीक्षक मनोज साहू ने बताया कि बीते साढ़े तीन सालों से वे बंदियों की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए हर वर्ष यह कार्यक्रम आयोजित करवा रहे हैं, जिससे कैदियों के मानसिक संताप को कम करने और उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने में काफी मदद मिल रही है.
11 साल से हो रहा है तर्पण
इस पूरे आयोजन में पवित्र शिप्रा नदी के सान्निध्य में बंदियों के आत्मिक सुधार के लिए तीर्थ पुरोहित आचार्य पंडित श्याम पंचोली (घोड़ीवाला पंडा) पिछले 11 वर्षों से बिना किसी स्वार्थ के यह महातर्पण करवा रहे हैं. ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के दिव्य भाव से आयोजित इस पूजन में कैदियों को कुश, तिल और जल उपलब्ध कराकर उनके पितृ दोष और अपराधबोध की निवृत्ति का संकल्प कराया जाता है. प्रशासन और पुरोहित की इस संयुक्त पहल ने सलाखों के पीछे बंद कैदियों के भीतर सुधार और पश्चाताप की एक नई रोशनी बिखेर दी है.
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