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ट्रंप के कट्टर दुश्मन ने ब्राजील में गाड़ा झंडा! लूला दा सिल्वा फिर से चुनाव जीत बने राष्ट्रपति

ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव में लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की जीत का दावा किया गया है, जबकि फ्लावियो बोल्सोनारो को हार का सामना करना पड़ा.

Brazil

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जो चेहरा फूटी आंख नहीं सुहाता, उसी वामपंथी दिग्गज नेता लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा (Luiz Inácio Lula da Silva) ने ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव के रनऑफ में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर एक बार फिर दुनिया को चौंका दिया है. 80 पार कर चुके लूला दा सिल्वा ने रविवार को हुए दूसरे चरण के मतदान में ट्रंप समर्थित कंजर्वेटिव प्रत्याशी फ्लावियो बोल्सोनारो को बेहद कड़े मुकाबले में शिकस्त देकर चौथी बार ब्राजील की सत्ता पर कब्जा जमा लिया है. इस नतीजे के सामने आते ही वाशिंगटन से लेकर लैटिन अमेरिका तक की राजनीति में भूचाल आ गया है.

51.75% वोट के साथ लूला की जीत

ब्राजील के निर्वाचन प्राधिकरण और आधिकारिक नतीजों के मुताबिक, बेहद करीबी मुकाबले में लूला दा सिल्वा को 51.75% वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी और पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे फ्लावियो बोल्सोनारो 48.25% वोट पर ही सिमट गए. यह जीत ब्राजील के इतिहास में एक अनूठा चमत्कार मानी जा रही है, क्योंकि 1985 में सैन्य तानाशाही के खात्मे के बाद यह पहला मौका है जब कोई उम्मीदवार राष्ट्रपति चुनाव के पहले राउंड में पिछड़ने के बावजूद दूसरे राउंड में बाजी पलटने में कामयाब रहा.

पहले दौर में पिछड़े, फिर यूं पलटी बाजी

4 अक्टूबर को हुए पहले दौर की मतगणना में लूला दा सिल्वा अपने प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो से लगभग 22 लाख वोटों के भारी अंतर से पीछे चल रहे थे. लेकिन इस अनुभवी वामपंथी नेता ने हार मानने के बजाय अपने पूरे चुनाव अभियान की दिशा ही बदल दी. लूला ने युवाओं और असमंजस में पड़े न्यूट्रल वोटरों को साधने के लिए दिन-रात रैलियां कीं. उन्होंने जमीनी स्तर पर मतदाताओं से सीधे संवाद किया, जिसका नतीजा यह रहा कि दूसरे चरण में बोल्सोनारो का गढ़ ढह गया और लूला ने बाजी मार ली.

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ब्राजील के नतीजे से ट्रंप खेमे में खलबली

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और लूला दा सिल्वा के बीच रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे हैं. ट्रंप हमेशा से बोल्सोनारो परिवार के कट्टर समर्थक रहे हैं और लूला की वामपंथी नीतियों से सख्त खार खाते आए हैं. लूला की इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में वामपंथी सरकार का दबदबा बरकरार रहना तय हो गया है, जो ट्रंप प्रशासन के लिए एक बहुत बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है.

-भारत एक्सप्रेस



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