छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया" जी हां बेशक! मगर किस पैमाने पर?
1 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ को आज 26 वर्ष पूरे हो रहे हैं. हर वर्ष की तरह इस बार भी प्रदेश की राजधानी और जिला मुख्यालयों में राज्योत्सव सजेगा. रोशनी होगी, सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे, सरकारी विभागों के स्टॉल लगेंगे, उपलब्धियों के आंकड़े चमकेंगे और शाम होते-होते पूरा परिवार पिकनिक के मूड में मेले का आनंद लेने पहुंचेगा. लोग सरकारी स्टॉलों का एक चक्कर लगाएंगे, कुछ तस्वीरें खिंचवाएंगे और फिर चाट-पकौड़ों के सामूहिक भोज में व्यस्त हो जाएंगे. कुछ निजी कंपनियां अपने नए उत्पादों का बाजार तलाशेंगी. सब कुछ होगा, बस शायद वह नहीं होगा जिसकी सबसे अधिक जरूरत है, आत्ममंथन!
राज्योत्सव की एक और विडंबना है कि इस आयोजन में स्थानीय कलाकारों और संस्कृति की जगह प्राय: बाहरी कलाकारों पर भारी रकम लुटाई जाती है. प्रदेश के प्रतिभाशाली लोक कलाकार उपेक्षित रहते हैं. पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया भी कम विवादास्पद नहीं. हर वर्ष राज्य सम्मान घोषित होते ही पक्षपात और अपात्र चयन के आरोप उठते हैं. हाल में गौसेवा के लिए सम्मानित व्यक्ति के बारे में महज छह महीने से इस कार्य में सक्रिय होने की खबर आई, (हालांकि मैं इस खबर की पुष्टि नहीं करता) , दूसरी ओर एक ऐसे किसान को, जिसे पिछले 25 सालों में केंद्र सरकार के पांच अलग-अलग कृषि मंत्रियों के हाथों पांच से अधिक बार राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ किसान का सम्मान मिल चुका है, प्रदेश का सर्वोच्च किसान सम्मान आज तक नहीं मिला. जब पुरस्कार योग्यता के बजाय कृपा, राजनीतिक झुकाव और पहुंच के तराजू पर तौले जाने लगें, तो सम्मान की चमक ही नहीं, उसकी विश्वसनीयता भी धूमिल होती है. लगता है, राज्य सम्मान भी ज्यादातर ‘अपनों को रेवड़ी बांटने’ का सरकारी संस्करण बनते जा रहे हैं.
सरकारी पंडालों की बात करें तो, हर साल वही योजनाएं, वही उपलब्धियां, वही संशोधित आंकड़े और विकास की वही कच्ची पक्की सरकारी गाथाएं. प्रश्न यह है कि क्या राज्योत्सव केवल अपनी पीठ थपथपाने का वार्षिक आयोजन है या अपनी विफलताओं का आईना देखने का भी अवसर?
किसानों के सामने उचित मूल्य मिलने का संकट
सबसे पहले किसान की बात. छत्तीसगढ़ की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है. प्रदेश के कुल फसल क्षेत्र में धान की हिस्सेदारी लगभग 77.5 प्रतिशत है. यानी धान केवल फसल नहीं, छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धड़कन है. लेकिन इस वर्ष मौसम ने किसानों के साथ जैसे कोई क्रूर मजाक किया है. इस साल 9 जून के आसपास मानसून के पहुंचने की घोषणा के बावजूद यह इस बार 25-26 जून को प्रदेश में पहुंचा. उसके बाद इस सितंबर के अंतिम सप्ताह में हुई रिकार्ड तोड़ मूसलाधार बारिश ने प्रदेश व विशेषकर बस्तर अंचल को बुरी तरह प्रभावित किया. अब अक्टूबर के अंतिम दिनों में चक्रवात अर्णव और बेमौसम बारिश ने खड़ी तथा कटी हुई धान की फसलों पर एक और निर्णायक प्रहार कर दिया है.
धान में दाना भरने और पकने के समय खेतों में पानी भर गया. तेज हवाओं से फसलें जमीन पर बिछ गईं. गिरी हुई फसल में अंकुरण, दाने की गुणवत्ता में गिरावट, फफूंद और भंडारण की समस्याएं अलग हैं. जो धान किसी तरह मंडी तक पहुंचेगा, उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठेंगे और किसान को उचित मूल्य मिलने का संकट खड़ा होगा. ऐसे समय किसान को तिहार ,उत्सव, भाषण और उपदेश नहीं, तत्काल सर्वेक्षण, पारदर्शी मुआवजा, फसल बीमा और वास्तविक राहत चाहिए. दीपावली के आसपास जब किसान की आंखों में खुशहाली के बजाय अपनी बर्बाद फसल का दृश्य हो, तब राज्योत्सव की आतिशबाजी उसे कितनी अच्छी लगेगी?
दूसरा गंभीर सवाल बस्तर के भविष्य का है. बस्तर जो क्षेत्रफल की दृष्टिकोण से विश्व के कई छोटे देशों से बड़ा है. लंबे समय तक दो तरफा हिंसा और भय में जीने वाले बस्तर में अब शांति की उम्मीद जग रही है. यह स्वागत योग्य है. लेकिन हिंसा समाप्त होने के बाद बस्तर को मिलेगा क्या? क्या नक्सलवाद से मुक्ति का अर्थ केवल बड़ी कंपनियों के लिए भयमुक्त वातावरण और संसाधनों के दोहन का रेड कारपेट है, या स्थानीय आदिवासी समाज भी विकास की इस केक का अपना हिस्सा पाएगा?
सरकारी पैसे को पॉकेट मनी समझ रहे अधिकारी
जिला खनिज न्यास (DMF) इसी उद्देश्य से बना था कि खनन प्रभावित लोगों और क्षेत्रों का कल्याण हो. लेकिन भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ में डीएमएफ के संचालन, नियोजन, पारदर्शिता और धन के उपयोग पर गंभीर सवाल उठाए हैं. कई जिलों के अधिकारियों ने तो इसे अपनी पॉकेट मनी समझ कर मनमाना तरीके खर्च किया. खनिजों से हजारों करोड़ कमाने वाली व्यवस्था में स्थानीय समुदायों को उनका न्यायपूर्ण हिस्सा क्यों नहीं मिलता? कई जगह प्रभावित लोगों की पहचान और योजनाओं के लाभार्थियों का निर्धारण तक सवालों के घेरे में रहा है. झूठ के मुंह में जीरे के बराबर हिस्सा देकर क्या आने वाली पीढ़ियों के संसाधन छीनने का हिसाब पूरा हो जाता है? और यदि इन निधियों के खर्च की निष्पक्ष सामाजिक जांच हो तो क्या-क्या सामने आएगा? हमाम में सब नंगे हों तो जांच की शुरुआत कौन करेगा?
बस्तर के विकास का आईना दिखाने के लिए केवल एक उदाहरण दे रहा हूं वह है बस्तर की यातायात का. यातायात का सबसे तेज माध्यम है हवाई संपर्क. कभी जगदलपुर से रायपुर की नियमित हवाई सेवा वायूदूत 1991-92 से शुरू हुआ, लेकिन आज 35 साल बाद भी राजधानी से पर्याप्त और नियमित हवाई संपर्क बस्तर की जरूरतों के अनुरूप नहीं है.
दूसरी ओर, बस्तर की रेल कनेक्टिविटी का सपना पिछली तीन पीढ़ियों से सुना जा रहा है. दल्लीराजहरा-रावघाट परियोजना में कछुआ गति से प्रगति हुई है, लेकिन रावघाट से आगे जगदलपुर और व्यापक बस्तर के लिए रेल सेवा आज भी सपना है, और इस सपने के जल्द सच होने के आसार भी नहीं दिखते .
तीसरा उदाहरण राष्ट्रीय राजमार्ग-30 है, जो रायपुर को बस्तर से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण जीवनरेखा है. भीषण कमीशन खोरी भ्रष्टाचार के चलते इसकी दुर्दशा और निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल हैं. मेरा अपना अनुभव है कि आज से तीस साल पहले 1996-97 में कोंडागांव से रायपुर की कार यात्रा यात्रा लगभग तीन घंटे में पूरी हो जाती थी, जबकि आज इसमें साढ़े चार घंटे तक लग जाते हैं. इसे किस पैमाने पर विकास कहेंगे?
एक और बानगी पेश है. धमतरी-रायपुर पुराने वैकल्पिक रास्ते से रायपुर लगभग 20 किलोमीटर कम पड़ता है इसलिए लोग इसलिए लोग इस रास्ते का भी काफी प्रयोग करते थे. पिछले कुछ समय में इस सड़क पर में जगह-जगह बने अनगिनत अवैज्ञानिक स्पीड ब्रेकर बना दिए गए. सौ से ज्यादा तो मैंने गिने फिर गिनना बंद कर दिया. इन स्पीड ब्रेकरों का आकार प्रकार तो इंजीनियरिंग की समझ पर ही प्रश्नचिह्न हैं. यह स्पीड ब्रेकर है या व्हीकल ब्रेकर यह तो बनाने वाले ही बता सकते हैं. सड़क बेहतर एवं सुविधा पूर्ण यात्रा हेतु है या वाहन चालकों को प्रताड़ित करने का इंतजाम? और यह सब बेवजह है या फिर इसके पीछे रायपुर धमतरी राष्ट्रीय राजमार्ग पर टोल-टैक्स वसूलने वाली कंपनी का हाथ है अथवा और कोई कारण यह जांच का विषय हो सकता है. प्रदेश में ऐसे सैकड़ो उदाहरण मिलेंगे. इन अव्यवस्थाओं को ठीक कौन करेगा?
लगातार उत्सव, इवेंट्स, तिहार मना रहे प्रदेश में इन विषयों पर सवाल कौन उठायेगा और जवाब कौन देगा. कार्पोरेट मीडिया त्योहारों के विज्ञापन छापने, माल बटोरने में व्यस्त है. नेता अपनी ब्रांडिंग करने में, पार्टियां अगले चुनाव में फिर से सत्ता हासिल करने की तैयारी करने में, और जनता टुकुर टुकुर यह मीना बाजार देख रही है, जहां उसके लिए कुछ भी नहीं है.
जड़ी-बूटियों का केंद्र रहा है बस्तर
एक और विडंबना यह भी कि,कभी हर्बल स्टेट कहलाने वाले प्रदेश की जड़ी-बूटियों का प्रमुख केंद्र बस्तर है, लेकिन प्रदेश बनने के 26 साल बाद जब उसकी मंडी शुरू करने की पहल होती है तो वह धमतरी में होती है, जो बस्तर से लगभग 200 से 300 किलोमीटर दूर है. स्थानीय उत्पादकों को उनके अपने क्षेत्र में बाजार, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की सुविधाएं क्यों नहीं मिलतीं?
विकास का एक और चेहरा सरकारी दफ्तरों में दिखाई देता है. भू-अभिलेखों को ऑनलाइन करने का उद्देश्य आम आदमी को सुविधा देना था, लेकिन बी-1,नकल नक्शा की प्रमाणित प्रतियां हासिल करने की प्रक्रिया और सुविधाशुल्क के खर्च को लेकर नागरिकों की परेशानियां और शिकायतें और बढ़ गई हैं.
कई मामलों में सुविधा शुल्क ? व स्टांप ड्यूटी पहले से कई गुना बढ़ने और एक अतिरिक्त प्रक्रिया जुड़ने की शिकायत पूरे प्रदेश में है. रजिस्ट्री के फर्जीवाड़े रोकने की बातें होती हैं, लेकिन शहरी जमीनों के नामांतरण में महीनों की देरी और कथित रिश्वतखोरी की शिकायतें आज भी आम हैं. सरकारी दफ्तर में बिना घूस काम नहीं होने की धारणा यदि मजबूत हो रही है तो यह भी विकास का ही एक पैमाना है, बस शर्मनाक वाला! महंगाई भत्ता बढ़ने से यदि रिश्वत की दरें भी महंगाई के अनुपात में बढ़ती रहें तो आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो की कार्रवाई में छोटे कर्मचारियों के पास करोड़ों की नकदी मिलने की खबरें आखिर किस व्यवस्था का परिचय देती हैं?
सरकारें योजनाओं और अनुदानों से तत्काल राजनीतिक लोकप्रियता अर्जित कर सकती हैं. महतारी-वंदन जैसी योजनाओं से महिलाओं को आर्थिक सहायता मिलना स्वागतयोग्य है. लेकिन केवल योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या गिनकर स्वस्थ, शिक्षित, रोजगारयुक्त और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण नहीं हो जाता.
मैं किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं हूं और न किसी दल का पक्षधर. मेरी कलम की प्रतिबद्धता अपने देश, प्रदेश और जनता के प्रति है. छत्तीसगढ़ मेरा भी है, बस्तर मेरा भी है. यह बातें कड़वी लग सकती हैं, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से ये कालमेघ और गिलोय की तरह प्रदेश के स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं.
फोटो खिंचवाने में मशगूल हैं नेता
राज्योत्सव केवल चाट-पकौड़ी खाने, बिजली की झालरों में तस्वीरें खिंचवाने और उपलब्धियों के विज्ञापन देखने का अवसर नहीं होना चाहिए. यह अपनी गलतियों को स्वीकारने, जवाबदेही तय करने और नए संकल्प लेने का दिन होना चाहिए. शुरुआत उन लोगों से होनी चाहिए जो जनसेवा के नाम पर कुर्सी के लिए जीवन लगा देते हैं. सत्ता पद नहीं, उत्तरदायित्व है.
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया केवल कह देने से कोई प्रदेश सबसे बढ़िया नहीं बन जाता. अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने से बेहतर है कि अपने काम से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की जाए. किसान की आंख में भरोसा हो, आदिवासी के हाथ में संसाधनों का अधिकार हो, बस्तर के गांव तक सड़क, रेल और हवाई संपर्क पहुंचे, सरकारी दफ्तर में बिना रिश्वत काम हो और विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, तभी यह नारा सार्थक होगा तुकबंदी बनकर रह जाएगा. और यह कार्य हम सबको मिलकर करना होगा.
छत्तीसगढ़ के 26 वर्षों का उत्सव हम मनाएं, जरूर मनाएं. लेकिन उत्सव के शोर में उन सवालों को ना दबाएं, जिनके जवाब ही प्रदेश की आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करने वाले हैं. क्योंकि प्रदेश का वास्तविक विकास मंच पर लगे पोस्टर बैनर , झालरों और निर्जीव आंकड़ों से नहीं, आम आदमी के जीवन में आए सकारात्मक बदलाव से मापा जाता है.
(लेखक डॉ. राजाराम त्रिपाठी छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के प्रगतिशील किसान, कृषि उद्यमी और हर्बल फार्मिंग विशेषज्ञ हैं)
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