अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के प्रदर्शन को लेकर बहस हो रही है, वहीं चुनाव जीतने वाले मुस्लिम उम्मीदवार भी सुर्खियों में हैं. इस बार 7 मुस्लिम नेताओं ने जीत दर्ज कर संसद तक पहुंचने में सफलता हासिल की है. इनमें सीनेट चुनाव जीतने वाले अब्दुल सईद का नाम खास तौर पर चर्चा में बना हुआ है.
अमेरिकी संसद में कितनी है मुस्लिम मौजूदगी?
अमेरिका की संसद दो सदनों, सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, से मिलकर बनी है. दोनों को जोड़ दें तो कुल 535 सीटें होती हैं. हालिया चुनाव के बाद इनमें 7 मुस्लिम सांसद पहुंचे हैं. इस हिसाब से अमेरिकी संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व लगभग 1.3 प्रतिशत के आसपास बैठता है.
भारत में स्थिति अमेरिका से अलग
अगर भारत की बात करें तो यहां मुस्लिम सांसदों की संख्या अमेरिका की तुलना में अधिक है. लोकसभा की 543 सीटों में 24 सांसद मुस्लिम समुदाय से आते हैं. वहीं राज्यसभा में कुल 245 सदस्य हैं, जिनमें 12 मुस्लिम सांसद शामिल बताए जाते हैं. दोनों सदनों को मिलाकर देखें तो भारतीय संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व करीब 4.6 प्रतिशत है.
ब्रिटेन और फ्रांस में क्या है तस्वीर?
यूरोप के प्रमुख देशों में भी मुस्लिम सांसदों की संख्या लगातार चर्चा का विषय बनी रहती है. ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में कुल 650 सीटें हैं. वर्ष 2024 में हुए चुनाव के बाद 25 मुस्लिम सांसद संसद पहुंचे. इस तरह वहां संसद में मुस्लिम प्रतिनिधियों की हिस्सेदारी लगभग 3.89 प्रतिशत बनती है.
दूसरी ओर फ्रांस की संसद के निचले सदन में 577 सीटें हैं. यहां 19 मुस्लिम सांसद चुने गए हैं. प्रतिशत के आधार पर देखा जाए तो फ्रांस में मुस्लिम सांसदों की हिस्सेदारी करीब 3.30 प्रतिशत है.
इजराइल और कनाडा में भी मौजूद है प्रतिनिधित्व
हाल ही में इजराइल में भी आम चुनाव हुए थे. वहां की संसद, जिसे नेसेट कहा जाता है, में कुल 120 सीटें हैं. चुनाव के बाद 19 मुस्लिम सांसद जीतकर पहुंचे हैं. वहीं कनाडा के हाउस ऑफ कॉमन्स में 343 सीटें हैं और इनमें 13 मुस्लिम सांसद शामिल हैं.
आबादी और संसद में भागीदारी पर उठते हैं सवाल
कई देशों में मुस्लिम समुदाय की आबादी और संसद में उनकी मौजूदगी की तुलना को लेकर बहस होती रहती है. अमेरिका में मुसलमान कुल आबादी का 1.9 प्रतिशत हैं. फ्रांस में यह आंकड़ा लगभग 9 प्रतिशत है. भारत में मुस्लिम आबादी करीब 20 प्रतिशत मानी जाती है. इसी तरह ब्रिटेन में मुसलमानों की आबादी लगभग 6 प्रतिशत है, जबकि इजराइल में यह संख्या 18 प्रतिशत के आसपास है. कनाडा में मुस्लिम आबादी 4.6 प्रतिशत बताई जाती है. इन आंकड़ों की तुलना संसद में मौजूद प्रतिनिधियों से करने पर कई जगह हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है.
लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व क्यों माना जाता है अहम?
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यहीं कानून बनाए जाते हैं और नीतियों पर फैसले लिए जाते हैं. इसलिए अलग-अलग समुदायों की राजनीतिक भागीदारी को प्रतिनिधिक लोकतंत्र का अहम हिस्सा माना जाता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि किसी बड़े समुदाय की उपस्थिति संसद में कम हो तो उसकी समस्याओं और जरूरतों की आवाज उतनी मजबूती से नहीं पहुंच पाती.
शोध में बताई गईं तीन बड़ी वजहें
साल 2021 में प्रकाशित कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक शोध पत्र में संसदों में मुस्लिम प्रतिनिधित्व कम होने के पीछे तीन प्रमुख कारण बताए गए थे.
पहला कारण यह बताया गया कि कई राजनीतिक दल टिकट वितरण के दौरान विविधता की बजाय जीत की संभावना को प्राथमिकता देते हैं, जिससे मुस्लिम उम्मीदवारों को अपेक्षाकृत कम अवसर मिलते हैं.
दूसरा कारण यह माना गया कि अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में अल्पसंख्यक समुदायों की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं है. चूंकि कई देशों में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, इसलिए उनका प्रतिनिधित्व सीमित रह जाता है.
तीसरा बड़ा कारण दक्षिणपंथी राजनीति का बढ़ता प्रभाव बताया गया है. शोध के अनुसार कई देशों में दक्षिणपंथी ताकतों के मजबूत होने के साथ मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी में गिरावट देखने को मिली है.
दुनिया भर में जारी है प्रतिनिधित्व पर बहस
मुस्लिम सांसदों की संख्या और उनकी हिस्सेदारी का मुद्दा केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है. अमेरिका, भारत, ब्रिटेन, फ्रांस, इजराइल और कनाडा जैसे देशों में समय-समय पर इस विषय पर चर्चा होती रही है. यही वजह है कि हालिया अमेरिकी चुनाव में 7 मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत को केवल राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और भागीदारी के नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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