उत्तराखंड के प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनाथ धाम को लेकर वैज्ञानिकों ने एक अहम चेतावनी जारी की है. हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच बसे इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ती आबादी और निर्माण गतिविधियों के साथ अब प्राकृतिक जोखिम भी बढ़ता दिखाई दे रहा है. हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में संकेत मिले हैं कि धाम के ऊपरी हिस्से में मौजूद कुछ विशाल हैंगिंग ग्लेशियर भविष्य में गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं. यदि इनमें से किसी ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटता है तो भारी मात्रा में बर्फ नीचे रिहायशी और सार्वजनिक क्षेत्रों की ओर बढ़ सकती है.
तीन हैंगिंग ग्लेशियरों का किया गया विस्तृत अध्ययन
वैज्ञानिकों ने बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र के ऊपर स्थित तीन प्रमुख हैंगिंग ग्लेशियरों का गहन विश्लेषण किया है. ये ग्लेशियर समुद्र तल से करीब 4,700 मीटर से लेकर 5,465 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं. अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट इमेजरी और उन्नत कंप्यूटर मॉडलिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया. इन माध्यमों से यह परखा गया कि यदि ग्लेशियर का कोई बड़ा हिस्सा टूटता है तो बर्फ किस दिशा में जाएगी, उसकी गति कितनी हो सकती है और उसका प्रभाव किस क्षेत्र तक पहुंच सकता है.
283 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आ सकता है हिमस्खलन
अध्ययन में सबसे चिंताजनक स्थिति उस परिदृश्य को माना गया है, जिसमें ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा एक साथ टूटकर नीचे की ओर बढ़े. वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक ऐसी स्थिति में करीब 58.9 लाख घन मीटर बर्फ का विशाल द्रव्यमान नीचे की ओर आ सकता है. इसकी अधिकतम रफ्तार लगभग 283 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है. इतना तेज और विशाल हिमस्खलन रास्ते में आने वाले कई ढांचों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है.
सैकड़ों इमारतें और महत्वपूर्ण ढांचे जोखिम में
शोध के अनुसार संभावित हिमस्खलन का असर बद्रीनाथ क्षेत्र में मौजूद बड़ी संख्या में भवनों और बुनियादी ढांचों पर पड़ सकता है. आकलन बताता है कि करीब 398 इमारतें इसके खतरे के दायरे में आ सकती हैं. इसके अलावा लगभग 2.66 किलोमीटर सड़क मार्ग प्रभावित हो सकता है. दो पुल, पार्किंग क्षेत्र और हेलीपैड जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक ढांचे भी संभावित नुकसान झेल सकते हैं. वैज्ञानिकों ने यह भी बताया है कि बर्फ का प्रवाह कुछ परिस्थितियों में 73.5 मीटर तक ऊंचा हो सकता है.
तेजी से बढ़ती आबादी बढ़ा रही जोखिम
रिपोर्ट में केवल ग्लेशियरों से जुड़े खतरे की बात नहीं की गई है, बल्कि बद्रीनाथ क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बढ़े मानवीय दबाव को भी रेखांकित किया गया है. वर्ष 2000 में यहां की आबादी लगभग 380 थी, जबकि 2030 तक इसके करीब 8,500 तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है. यानी तीन दशकों के भीतर आबादी लगभग 22 गुना बढ़ सकती है. इसी अवधि में निर्मित क्षेत्र में भी करीब 19 गुना विस्तार होने का अनुमान जताया गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आबादी और निर्माण किसी भी प्राकृतिक आपदा के संभावित प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकते हैं.
मुख्य मंदिर को तत्काल खतरे का संकेत नहीं
अध्ययन से यह राहतभरी जानकारी भी सामने आई है कि बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर के सीधे हिमस्खलन की चपेट में आने की संभावना नहीं बताई गई है. हालांकि आसपास मौजूद भवन, सड़कें और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं जोखिम मुक्त नहीं हैं. वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि यदि बर्फ के साथ चट्टानें और अन्य मलबा भी नीचे आता है तो नुकसान का स्तर और अधिक गंभीर हो सकता है.
यह चेतावनी नहीं भविष्य के जोखिम का आकलन
विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन को तत्काल आने वाली आपदा की चेतावनी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह एक वैज्ञानिक आकलन है, जिसे संभावित परिस्थितियों को समझने के लिए तैयार किया गया है. इसका मकसद यह जानना है कि भविष्य में यदि किसी ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटता है तो उसके प्रभाव का दायरा कितना हो सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि संवेदनशील ग्लेशियरों की लगातार निगरानी, जोखिम वाले इलाकों में वैज्ञानिक आधार पर निर्माण नियंत्रण और प्रभावी आपातकालीन निकासी योजना तैयार करना अब बद्रीनाथ क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी होता जा रहा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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