दुनिया में पहली बार मोटर रेस फ्रांस में आयोजित की गई थी.
First Motor Race History: कल्पना कीजिये एक ऐसी दुनिया की, जहां घोड़ों की सवारी अब बीते जमाने की बात हो. पक्की सड़कों पर दनदनाती कारें दौड़ रही हों. इंजन से धुएं की लहरें निकल रही हों और स्टेयरिंग थामे इंसान घोड़े से भी तेज गति से सरपट भागे जा रहे हों. ऐसा लग रहा हो कि ये लोग वक्त से आगे चल रहे हैं, ये कोई कल्पना नहीं है. 18वीं सदी तक इंसान ऐसा ही सोचा करते थे. उस समय इंसानों के लिए सबसे तेज वाहन घोड़े ही हुआ करते थे.
आज हम फॉर्मूला-1 जैसी हाईटेक मोटर रेस के बारे में बात करते हैं. जिसमें कारें 300 किलोमीटर प्रति घंटा से भी तेज रफ्तार से हवा को चीरती हुई चलती हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि पहली बार मोटर रेस कब आयोजित हुई थी और आज के दिन से उसका क्या रिश्ता है.
पहली बार मोटर रेस फ्रांस में हुई आयोजित
दुनिया में पहली बार मोटर रेस फ्रांस में आयोजित की गई थी. उस रेस में कुल 21 मोटर वाहनों ने हिस्सा लिया. इस रेस को कराने वाले पियरे गिफार्ड ने इसे तकनीक की क्रांति बताया था. जो आगे चलकर सच साबित हुआ. क्योंकि इस रेस ने यूरोप में जो मोटर वाहनों को लेकर प्रयोग की जो दौड़ शुरू की उसने पूरी दुनिया के इतिहास को बदल दिया.
कैसे शुरू हुआ ये सफर
19वीं सदी का अंत तकनीकी बदलावों का दौर लेकर आया. ट्रेन इंजनों से निकलकर भाप इंजन अब वाहनों में प्रयोग में आने लगे. जनता इन बदलावों को देखकर हंस रही थी, लेकिन उनमें एक ऐसा भी आदमी था जो समय से आगे की सोच रहा था और वो था फ्रेंच अखबार स्टेयरिंग ले पेटिट जर्नल (Le Petit Journal) के संपादक पियरे गिफार्ड (Pierre Giffard).
पियरे दुनिया में हो रहे इन बदलावों को लेकर काफी उत्सुक रहते थे. वो जनता को तकनीक की जानकारी और तरक्की के बारे में बताने के लिए साइकिल की रेस आयोजित कराते थे. उनका कहना था कि विश्व में हो रहे इन बदलावों को लेकर जनता में भी अवेयरनेस होनी चाहिये.
पहली बार बिना घोड़े की गाड़ियों की प्रतियोगिता का आयोजन
एक दिन उन्होंने सोचा कि क्यों ना ऐसी रेस कराई जाए जो बिना घोड़े के गाड़ियों की हो. उन्होंने 19 दिसंबर 1993 के ले पेटिट जर्नल के अंक में ‘जीन सैंस टेरे’ नाम से लेख लिखकर लोगों को इसके बारे में बताया. फिर उन्होंने अगले साल अपने जर्नल में एक और लेख लिखा. इसका नाम रखा ‘Concours des Voitures sans Chevaux’ यानी बिना घोड़े की गाड़ियों की प्रतियोगिता.
प्रतियोगिता में ये रखी गई शर्त
इस प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार उस कार को दिया जाना था जिसने बिना किसी खतरे के आसानी से ड्राइव करने वाली और मजबूती से इस प्रतियोगिता को जीता हो. उन्होंने लेख में बताया कि यह दौड़ पेरिस के पोर्टे मैलोट से लेकर रूएन तक (कुल लगभग 126 किलोमीटर की तूरी) होगी. इस दौड़ में सफल उसी कार को माना जाएगा जो अपनी शक्ति से चले. यानी उसे कोई खींच कर ना ले जाए.
22 जुलाई 1894 थी मुकाबले की तारीख
मुकाबले की तारीख थी 22 जुलाई 1894. प्रतियोगिता में कुल 21 कारों ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम सुबह के 8 बजे शुरू हुआ. भविष्य के इन वाहनों को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ जमा थी. जब रेस खत्म हुई, उस समय मौके पर लाखों लोगों की भीड़ जमा हो गई थी.
24 जुलाई के अंक में जारी किया गया परिणाम
24 जुलाई के अंक में ले पेटिट जर्नल में परिणाम जारी किया गया. जिसमें 5000 फ्रैंक का पहला पुरस्कार, पैनहार्ड एंड लेवासोर और प्यूजो के बीच बांटा गया. इन दोनों ने अपने मोटर वाहन में पेट्रोल मोटर का यूज किया था. वहीं दूसरा पुरस्कार 2000 फ्रैंक का था. जिसे मेसर्स डी डायोन, बाउटन एट सी को मिला. उन्होंने रेस में स्टीम ट्रैक्टर लाये थे. वो चढ़ाई वाली जगहों पर जबरदस्त ताकत से चढ़ती थी. जो उस समय कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.
तीसरा पुरस्कार मौरिस ले ब्लांट को दिया गया
वहीं तीसरा पुरस्कार मौरिस ले ब्लांट को दिया गया. उन्हें 1500 फ्रैंक दिया गया. उन्होंने अपने मोटर वाहन को सर्पोलेट प्रणाली पर बनाया था. जिसमें 9 सीटें लगी थी.
इस मोटर रेस ने यूरोप में शुरू की मोटर वाहनों की दौड़
फ्रांस की इस पहली मोटर रेस ने यूरोप में मोटर वाहनों पर रिसर्च और उन्हें और बेहतर बनाने की होड़ शुरू की. Le Petit Journal के इस अनोखे प्रयोग ने भविष्य की गति को बदल दिया.
उस मोटर वाहन रेस में शामिल होने वाली अधिकतर कंपनियां आज भी मौजूद हैं. पैनहार्ड एंड लेवासोर आज भी सैन्य वाहनों का उत्पादन करती है. वहीं पैनहार्ड एंड लेवासोर के साथ पहले स्थान पर रहे प्योजो कंपनी आज भी कारें, बाइक और स्कूटर बनाती है. वहीं बाउटन एट सी कंपनी आज F-1 रेसिंग कार बनाती है.
– भारत एक्सप्रेस
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