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न मोबाइल, न इंटरनेट… भारत के इस हिस्से में बाहरी शख्स को देखते ही मार देते हैं तीर!

अंडमान के घने जंगलों में रहने वाली ‘जारवा’ जनजाति आज भी आधुनिकता की चकाचौंध से कोसों दूर अपनी आदिम परंपराओं को संजोए हुए है. मोबाइल, इंटरनेट और पैसे से अनजान ये लोग शिकार और प्रकृति के बीच जीवन बिताते हैं. 50 हजार साल पहले अफ्रीका से आए इन लोगों का अस्तित्व अब खतरे में है.

Jarawa Tribe

आज के दौर में कोई भी बिना मोबाइल, इंटरनेट या जीपीएस के एक कदम नहीं चल सकता है. लेकिन हमारे ही देश में कुछ ऐसे भी लोग है, जिन्हें ‘स्मार्टफोन’ तो क्या, शायद ‘पैसे’ या ‘शहर’ जैसे शब्दों का मतलब भी नहीं पता होगा. हम बात कर रहे हैं अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की सबसे चर्चित और रहस्यमयी जारवा जनजाति (Jarawa Tribe) की.

हजारों सालों से ये लोग बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे हुए हैं. ये न तो खेती करते हैं, न ही किसी दफ्तर में जाते हैं. इनका रहन-सहन देखकर ऐसा लगता है मानो समय वहीं ठहर गया हो. आइए जानते हैं जारवा लोगों की अनसुनी कहानी.

अफ्रीका से आया कुनबा

इतिहासकारों और वैज्ञानिकों का मानना है कि जारवा लोग मूल रूप से ‘नीग्रिटो’ समुदाय के हैं. इनके पूर्वज करीब 50 से 60 हजार साल पहले अफ्रीका से निकलकर समुद्र के रास्ते अंडमान पहुंचे थे. आज इनकी आबादी महज 400 से 650 के बीच ही बची है. ये लोग मिडिल और साउथ अंडमान के उन घने जंगलों में रहते हैं, जहां सूरज की रोशनी भी मुश्किल से जमीन तक पहुंच पाती है.

कुदरत ही इनका सुपरमार्केट

जारवा लोगों का जीवन पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है. उनके लिए जंगल और समंदर ही सबकुछ हैं. ये लोग छोटे-छोटे समूहों में रहते हैं और खाने के लिए शिकार पर निर्भर हैं. जंगली सूअर का शिकार हो या समंदर से मछली और कछुए पकड़ना, ये इन कामों में माहिर होते हैं. इसके अलावा, ये शहद, जंगली फल और कंद-मूल इकट्ठा करते हैं. हैरानी की बात यह है कि इन्हें जंगल के सैकड़ों पौधों और जड़ी-बूटियों की ऐसी गहरी समझ है, जो शायद किसी बड़े बॉटनिस्ट के पास भी न हो.

तीर-कमान सबसे बड़ी ताकत

इनका पहनावा बेहद साधारण होता है. शरीर पर नाममात्र के कपड़े या पत्तों का इस्तेमाल करते हैं. त्वचा का गहरा रंग और घुंघराले बाल इनकी पहचान हैं. खुद को सजाने के लिए ये शरीर पर सफेद या लाल मिट्टी से नक्काशी करते हैं. इनके हाथ में हमेशा तीर-कमान रहता है. ये हथियार न केवल शिकार के लिए हैं, बल्कि अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए भी हैं.

बाहरी दुनिया से नफरत

अक्सर सुना जाता है कि जारवा लोग बाहरी लोगों पर हमला कर देते हैं. लेकिन इसके पीछे एक दुखद इतिहास है. पहले जब बाहरी लोग इनके संपर्क में आए, तो अपने साथ कई ऐसी बीमारियां ले आए जिनके खिलाफ जारवा लोगों की इम्यूनिटी शून्य थी. खसरा और फ्लू जैसी बीमारियों ने इनकी आबादी को लगभग खत्म कर दिया था. यही वजह है कि ये अपनी निजता को लेकर बहुत ज्यादा संवेदनशील हैं और किसी अजनबी का दखल बर्दाश्त नहीं करते.

बदलते दौर की चुनौतियां

90 के दशक के बाद से जारवा लोगों का बाहरी संपर्क थोड़ा बढ़ा है. कभी-कभी ये मुख्य सड़क (अंडमान ट्रंक रोड) के किनारे दिख जाते हैं और कुछ जरूरी सामानों का लेन-देन भी करते हैं. लेकिन आधुनिकता इनके लिए वरदान से ज्यादा खतरा साबित हो रही है.

एक समय था जब टूरिस्ट इन्हें देखने के लिए “ह्यूमन सफारी” करते थे, जो बेहद शर्मनाक था. अब सरकार ने इस पर कड़ा बैन लगा दिया है. आज इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी जमीन, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को बचाए रखने की है. जारवा सिर्फ एक जनजाति नहीं, बल्कि मानव विकास का वो जीता-जागता इतिहास हैं, जिसे संजोकर रखना हम सबकी जिम्मेदारी है.

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-भारत एक्सप्रेस



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