कट के दौरान BRICS Grain Exchange वैश्विक गेहूं और खाद्य कीमतों को कैसे स्थिर कर सकता है
BRICS Grain Exchange: प्रस्तावित BRICS Grain Exchange अब केवल शिखर सम्मेलनों में होने वाली चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका तकनीकी ढांचा तैयार करने की दिशा में काम आगे बढ़ रहा है. यह ऐसे समय में हो रहा है जब मौसम, माल ढुलाई में रुकावट और काला सागर क्षेत्र को लेकर अनिश्चितता के कारण गेहूं के बाजार पर फिर दबाव बढ़ रहा है. जून 2026 में भारत के इंदौर में हुई BRICS कृषि मंत्रियों की बैठक में कृषि व्यापार, खाद्य सुरक्षा और किसानों के कल्याण को साझा प्राथमिकताओं के रूप में सामने रखा गया. वहीं, प्रतिस्पर्धा से जुड़ी संस्थाओं ने यह भी देखना शुरू किया है कि अनाज के बाजार में कीमतें कैसे तय होती हैं और पारदर्शिता की कमी से लागत कहां बढ़ सकती है. यह एक्सचेंज अभी अकाल रोकने का कोई काम करने वाला तंत्र नहीं है, लेकिन अधिकारी इसे भविष्य में कीमतों को अधिक स्पष्ट बनाने, बाजार तक पहुंच बढ़ाने और संकट के समय तालमेल बेहतर करने वाले एक साधन के तौर पर देख रहे हैं.
गेहूं खरीदने वालों के लिए अभी क्या बदला है?
गेहूं खरीदने वालों के लिए तत्काल बदलाव आज से किसी नए बाजार में व्यापार करने की सुविधा नहीं, बल्कि इस विचार को मिली राजनीतिक गति है. BRICS Grain Exchange को 2024 की कजान घोषणा में मंजूरी दी गई थी और बाद की BRICS चर्चाओं में भी इसे आगे बढ़ाया गया. इसमें 2025 की रियो प्रक्रिया और 2026 का कृषि ट्रैक भी शामिल है. जून 2026 में भारत के कृषि मंत्रालय ने कहा कि BRICS देशों ने इंदौर घोषणा को अपनाया है. इसका मुख्य जोर खाद्य सुरक्षा, कृषि व्यापार, जलवायु के अनुकूल खेती और नवाचार पर है. BRICS देश दुनिया की करीब आधी आबादी और वैश्विक कृषि भूमि तथा खाद्यान्न उत्पादन के करीब 42% हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं.
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गेहूं की कीमतों में एक बार फिर ऐसी अस्थिरता दिखाई दे रही है, जो गेहूं आयात पर निर्भर देशों के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है. FAO ने बताया कि उसका Food Price Index अगस्त 2026 में जुलाई के मुकाबले 1.9% बढ़ा, जबकि उसका Cereal Price Index मई 2024 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया. वैश्विक गेहूं की कीमतें महीने-दर-महीने 2.6% बढ़ीं और पिछले साल की तुलना में 15% ऊपर रहीं. FAO ने इसके पीछे काला सागर से होने वाले निर्यात में रुकावट, यूरोप में उत्पादन की कमजोर संभावनाओं और मुद्रा से जुड़े प्रभावों को वजह बताया.
शिखर सम्मेलन के वादे से बाजार के ढांचे तक
अनाज एक्सचेंज का प्रस्ताव रूस की ओर से शुरू की गई पहल के रूप में सामने आया था. बाद में BRICS नेताओं ने इसे एक अधिक न्यायपूर्ण कृषि व्यापार व्यवस्था विकसित करने की व्यापक कोशिश के हिस्से के रूप में समर्थन दिया. Council on Foreign Relations के मुताबिक, कजान घोषणा में इस एक्सचेंज को BRICS देशों के भीतर अनाज की वस्तुओं के व्यापार के लिए एक मंच के रूप में बताया गया था. इसमें आगे चलकर दूसरे कृषि क्षेत्रों को भी शामिल करने की संभावना रखी गई थी. CFR ने यह भी बताया कि विस्तारित BRICS समूह का अनाज बाजार में काफी प्रभाव है, क्योंकि इसमें बड़े उत्पादक, निर्यातक और आयातक देश शामिल हैं.
अब इस पहल पर व्यावहारिक काम केवल नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि बाजार के ढांचे पर ध्यान दिया जा रहा है. 2026 में BRICS Competition Centre ने वैश्विक अनाज व्यापार की संयुक्त क्षेत्रीय जांच की घोषणा की. इसे BRICS प्रतिस्पर्धा प्राधिकरणों की ओर से उनके सहयोग ढांचे के तहत वैश्विक अनाज बाजार में प्रतिस्पर्धा का पहला संयुक्त आकलन बताया गया. इसमें कीमतों की निगरानी, डिजिटल अनाज सप्लाई चेन और किसानों से लेकर उपभोक्ताओं तक की पूरी श्रृंखला में मुनाफा कहां जमा हो रहा है, इसे समझने की जरूरत पर चर्चा हुई.
यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है. अनाज एक्सचेंज तभी बाजार को स्थिर कर सकता है, जब खरीदार और विक्रेता उसके कॉन्ट्रैक्ट, बेंचमार्क, संचालन व्यवस्था और डेटा पर भरोसा करें. अगर ये चीजें नहीं होंगी तो यह एक भरोसेमंद कीमत तय करने वाले बाजार की जगह सिर्फ एक और राजनीतिक मंच बनकर रह सकता है.
एक्सचेंज संकट के दौरान कीमतों में अचानक बढ़ोतरी को कैसे कम कर सकता है?
अगर BRICS Grain Exchange को सही तरीके से तैयार किया जाता है तो यह कई व्यावहारिक तरीकों से गेहूं और खाद्य कीमतों को स्थिर रखने में मदद कर सकता है:
कीमत तय होने की प्रक्रिया में ज्यादा पारदर्शिता: एक साझा प्लेटफॉर्म BRICS देशों से आने वाले अनाज के लिए ज्यादा स्पष्ट संदर्भ कीमतें जारी कर सकता है. इससे कमी के समय आयातकों को अलग-अलग ऑफर की तुलना करने में मदद मिलेगी, बजाय इसके कि वे बिखरे हुए, निजी या बहुत सीमित क्षेत्रीय संकेतों पर निर्भर रहें.
ज्यादा सप्लायर की जानकारी: खाद्य संकट का सामना कर रहे देशों के खरीदार कई BRICS उत्पादक देशों से उपलब्ध ऑफर देख सकेंगे. इससे किसी एक व्यापार मार्ग, बंदरगाह या बिचौलिए पर निर्भरता कम हो सकती है.
मुनाफे की बेहतर निगरानी: BRICS की क्षेत्रीय जांच यह देख रही है कि अनाज की पूरी सप्लाई चेन में मूल्य का हिस्सा किस तरह बंट रहा है. इसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म और सीमा पार होने वाले कारोबार भी शामिल हैं. इससे ऐसे नियम बनाने में मदद मिल सकती है, जो आपात स्थिति में छिपे हुए अतिरिक्त मुनाफे या कीमत बढ़ाने की गुंजाइश को सीमित करें.
आपात स्थिति में बेहतर तालमेल: BRICS कृषि मंत्रियों ने पहले ही खाद्य कमी और कीमतों में अचानक बढ़ोतरी के दौरान सहयोग पर जोर दिया है. इससे संकेत मिलता है कि भविष्य में एक्सचेंज का ढांचा तेजी से जानकारी साझा करने और सप्लाई को लेकर आपसी तालमेल में मदद कर सकता है.
प्रतिस्पर्धा की सुरक्षा: 2026 की जांच से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि एक्सचेंज को प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने वाले सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के बेहतर तरीकों के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए. यह जरूरी शर्त है, अगर इस प्लेटफॉर्म को उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए उपयोगी बनाना है.
इसका संभावित फायदा यह नहीं है कि कोई एक्सचेंज गेहूं पैदा कर देगा. ऐसा नहीं है. फायदा यह है कि बेहतर जानकारी, एक जैसे कॉन्ट्रैक्ट और सप्लाई के बेहतर तालमेल से बाजार में रुकावट की आशंका के समय घबराहट के कारण बढ़ने वाली अतिरिक्त कीमत को कम किया जा सकता है.
अकाल रोकने के लिए कीमतों के साथ लॉजिस्टिक्स भी जरूरी
खाद्य संकट आमतौर पर तब और गंभीर हो जाता है, जब कई समस्याएं एक साथ सामने आती हैं. इनमें कमजोर फसल, महंगी खाद, बंद बंदरगाह, मुद्रा पर दबाव और सरकारी भंडार की कमी शामिल हैं. ऐसी स्थिति में गेहूं की बेंचमार्क कीमत में मामूली बढ़ोतरी भी ब्रेड को महंगा कर सकती है, आयात का बिल बढ़ा सकती है और सरकारों के सामने सब्सिडी को लेकर मुश्किल फैसले खड़े कर सकती है. FAO के अगस्त 2026 के आंकड़े बताते हैं कि अनाज की कीमतों पर मांग, मौसम से जुड़ी चिंताओं और काला सागर से होने वाली सप्लाई को लेकर अनिश्चितता का दबाव बढ़ रहा है. इन सभी का सीधा असर गेहूं आयात करने वाली अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है.
BRICS Grain Exchange तभी अकाल रोकने में मदद कर सकता है, जब वह एक बड़े सिस्टम का हिस्सा हो. सरकारों को इसके साथ भौतिक खाद्य भंडार, भरोसेमंद शिपिंग, निर्यात से जुड़े अनुशासन, वित्तीय साधन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की भी जरूरत होगी. एक्सचेंज बाजार की स्थिति को ज्यादा स्पष्ट कर सकता है और कुछ रुकावटों को कम कर सकता है, लेकिन यह मानवीय सहायता या काम करने वाले बंदरगाहों की जगह नहीं ले सकता.
प्लेटफॉर्म के काम करने से पहले बड़ी चुनौतियां अभी बाकी
सबसे बड़ी अनसुलझी समस्या भरोसे की है. CFR के विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि आंतरिक मतभेद, कीमतों में संभावित हस्तक्षेप और पारदर्शिता की कमी प्रस्तावित एक्सचेंज को कमजोर कर सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि इससे जुड़े कुछ लोगों ने माना है कि समूह को ऐसा प्लेटफॉर्म शुरू करने में कई साल लग सकते हैं.
निर्यातकों और आयातकों के बीच एक स्वाभाविक तनाव भी है. उत्पादक बेहतर कीमत चाहते हैं, जबकि गेहूं खरीदने वाले देश सस्ती रोटी और तय समय पर सप्लाई चाहते हैं. अगर एक्सचेंज किसी एक पक्ष के पक्ष में दिखाई देता है तो उसके लिए इतना कारोबार आकर्षित करना मुश्किल हो सकता है, जो वैश्विक बेंचमार्क को प्रभावित करने के लिए जरूरी है.
मुद्रा भी एक बड़ा सवाल है. BRICS की चर्चा का एक हिस्सा डॉलर पर आधारित व्यापार ढांचे पर निर्भरता कम करने की व्यापक कोशिश से जुड़ा है. कुछ सरकारों को यह विचार पसंद आ सकता है, लेकिन अनाज कारोबारियों को ऐसे कॉन्ट्रैक्ट की जरूरत होगी जो मुद्रा के जोखिम, भुगतान के जोखिम और डिलीवरी में नाकामी जैसे जोखिमों को इस तरह संभालें कि वाणिज्यिक खरीदार उन पर भरोसा कर सकें.
अब आगे क्या देखना होगा?
अगला चरण तय करेगा कि BRICS Grain Exchange एक गंभीर बाजार संस्था बनता है या सिर्फ एक रणनीतिक लक्ष्य बनकर रह जाता है. इन संकेतों पर खास नजर रहेगी:
- स्पष्ट संचालन नियम जारी होना
- गेहूं की गुणवत्ता, डिलीवरी के स्थान और कॉन्ट्रैक्ट के मानकों पर सहमति
- बड़े निजी कारोबारी, सरकारी खरीदार और निर्यातकों की भागीदारी
- कीमतों के बेंचमार्क की पारदर्शी रिपोर्टिंग
- विवादों के समाधान की प्रक्रिया
- इस बात के सबूत कि प्रतिस्पर्धा से जुड़ी संस्थाएं बाजार में हेरफेर को रोक सकती हैं
फिलहाल इस प्रस्ताव की अहमियत इसलिए बढ़ रही है क्योंकि गेहूं की कीमतों में अस्थिरता भी बढ़ रही है. अगर BRICS राजनीतिक समर्थन को पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और जमीन पर काम करने वाले ढांचे में बदल पाता है तो यह एक्सचेंज पहले से कमजोर खाद्य व्यवस्था को स्थिर रखने वाला एक और साधन बन सकता है. अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो अकाल की रोकथाम मुख्य रूप से मौजूदा एक्सचेंजों, आपातकालीन सहायता, राष्ट्रीय खाद्य भंडार और वैश्विक शिपिंग मार्गों की विश्वसनीयता पर ही निर्भर रहेगी.
-भारत एक्सप्रेस
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