विश्लेषण

जानिए क्यों रातों-रात हजारों ISBN नंबरों वाली किताबें खरीद रही हैं तकनीक कंपनियां?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई तेजी से हमारी जिंदगी का हिस्सा बन रहा है. लेकिन इस बदलाव की कीमत आखिर कौन चुका रहा है? यह सवाल अब किताबों की दुनिया में भी उठने लगा है. ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, यूरोप और दूसरे देशों के कई पुस्तक विक्रेताओं की चिंताएं बताती हैं कि एआई कंपनियों को अच्छी गुणवत्ता वाले डेटा की कितनी बड़ी जरूरत पड़ रही है.

आज किताबें सिर्फ पढ़ने, सीखने या मनोरंजन का जरिया नहीं रह गई हैं. वे बड़े एआई मॉडल के लिए बेहद मूल्यवान डेटा स्रोत बन चुकी हैं. खासकर पुरानी, संपादित और इंसानों द्वारा लिखी गई किताबों की मांग बढ़ रही है. इसकी एक वजह यह भी है कि इंटरनेट पर एआई से बनी सामग्री तेजी से बढ़ रही है.

एआई को किताबों की जरूरत क्यों पड़ रही है?

बड़े भाषा मॉडल यानी LLM ने शुरुआत में इंटरनेट पर मौजूद विशाल मात्रा में टेक्स्ट से सीखना शुरू किया. लेकिन अब इंटरनेट पर खुद एआई द्वारा तैयार की गई सामग्री की भरमार हो रही है. इसे आम तौर पर ‘एआई स्लॉप’ कहा जाता है. समस्या यह है कि अगर भविष्य के एआई मॉडल बड़ी मात्रा में पहले से बनी एआई सामग्री पर ही प्रशिक्षित होने लगें, तो उनकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है. इसे “मॉडल कोलैप्स” का खतरा कहा जाता है.

यहीं पुरानी किताबें खास महत्व रखती हैं. खासकर 2022 से पहले प्रकाशित किताबों में इंसानों द्वारा लिखी गई, संपादित और व्यवस्थित सामग्री मिलती है. उनमें विषयों की विविधता भी होती है और लंबे समय में विकसित हुआ ज्ञान भी.

यानी एआई के लिए किताबें एक तरह से अपेक्षाकृत भरोसेमंद और उच्च गुणवत्ता वाला प्रशिक्षण डेटा बन गई हैं.

एआई कंपनी एन्थ्रोपिक से जुड़ी “प्रोजेक्ट पनामा” योजना ने इस बहस को और तेज किया. कंपनी के आंतरिक दस्तावेजों में दुनिया की बड़ी संख्या में किताबों को डिस्ट्रक्टिव तरीके से स्कैन करने का लक्ष्य सामने आया था.

इस प्रक्रिया में किताबों की जिल्द काटकर उनके पन्नों को स्कैन किया जाता है. स्कैनिंग के बाद मूल किताब को अक्सर रीसायकल कर दिया जाता है. कंपनी ने बड़ी संख्या में किताबें खरीदीं और उन्हें इसी तरह डिजिटल रूप में बदलने की प्रक्रिया अपनाई.

कानूनी स्तर पर इस मामले में अदालत ने खरीदी गई किताबों को डिजिटल कॉपी में बदलने को फेयर यूज के दायरे में माना. लेकिन कानूनी फैसला अपने आप में इस पूरे मुद्दे के नैतिक सवालों का जवाब नहीं देता है.

सेकंड-हैंड किताबों का बाजार भी बदल रहा है

इसका असर पुरानी किताबों के बाजार में भी दिखाई दे रहा है. नीदरलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों के कुछ विक्रेताओं को रातों-रात सैकड़ों या हजारों ISBN नंबरों वाली खरीद सूचियां मिलने की बात सामने आई है.

दिलचस्प बात यह है कि इन सूचियों में हमेशा कोई साफ विषय या खास लेखक नहीं होता. यानी खरीदारी किसी खास तरह के कलेक्शन के लिए नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर डेटा जुटाने के लिए होती दिखती है.

कई बार बीच में बिचौलिये भी होते हैं. Zoom Books और ISBNdb जैसी सेवाओं के जरिए खरीदारी होने पर किताब बेचने वाले को यह पता नहीं चलता कि अंतिम खरीदार कौन है.

कुछ दुकानदारों के लिए यह अच्छी बात है, क्योंकि उन्हें ऐसी किताबों से अतिरिक्त कमाई हो रही है जो सामान्य परिस्थितियों में लंबे समय तक शेल्फ पर पड़ी रहतीं. लेकिन दूसरी तरफ चिंता यह है कि कहीं इस प्रक्रिया में दुर्लभ या सांस्कृतिक महत्व वाली किताबें हमेशा के लिए खत्म न हो जाएं.

इस बदलाव का एक सकारात्मक पहलू भी है. लंबे समय से गोदामों में पड़ी किताबें बिक सकती हैं, पुराने स्टॉक से दुकानदारों को राहत मिल सकती है और बेकार मानी जा रही किताबों की रीसाइक्लिंग बढ़ सकती है.

लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है जब यही प्रक्रिया दुर्लभ किताबों तक पहुंचती है.

मान लीजिए किसी किताब की दुनिया में सिर्फ एक ज्ञात प्रति मौजूद है. अगर वह भी स्कैनिंग के बाद नष्ट हो जाए, तो भविष्य की पीढ़ियों के लिए उसका मूल स्वरूप देखने का मौका हमेशा के लिए खत्म हो सकता है.

कुछ कंपनियां कहती हैं कि वे दुर्लभ या एंटीक्वेरियन किताबों को निशाना नहीं बनातीं. फिर भी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती, क्योंकि किसी कम प्रसिद्ध किताब का बाजार मूल्य भले कम हो, लेकिन उसका ऐतिहासिक या सांस्कृतिक महत्व काफी बड़ा हो सकता है.

लेखक और प्रकाशक भी दबाव में

इस पूरी कहानी का दूसरा बड़ा हिस्सा लेखक हैं.

एआई अब सिर्फ किताबें पढ़कर उनसे सीख नहीं रहा, बल्कि नई सामग्री तैयार करने में भी इस्तेमाल हो रहा है. इससे लेखकों के सामने कमाई और प्रतिस्पर्धा से जुड़े नए सवाल खड़े हो रहे हैं.

कई उपन्यासकारों और दूसरे लेखकों ने आय में गिरावट की चिंता जताई है. दूसरी तरफ एआई की मदद से किताबें तैयार करने और प्रकाशित करने का चलन भी बढ़ रहा है. कुछ अनुमानों और अध्ययनों में यह संभावना जताई गई है कि 2025 तक नई प्रकाशित होने वाली किताबों के बड़े हिस्से में किसी न किसी रूप में एआई की भूमिका हो सकती है.

इसका मतलब यह नहीं कि हर एआई-सहायता वाली किताब खराब होगी. लेकिन अगर बाजार में बहुत तेजी से बड़ी मात्रा में सामग्री आने लगे, तो पाठकों के लिए अच्छी और औसत सामग्री के बीच फर्क करना मुश्किल हो सकता है.

क्या भविष्य पूरी तरह डिजिटल होगा?

एआई कंपनियां जिस तेजी से भौतिक किताबों को डिजिटल डेटा में बदल रही हैं, उससे एक संभावना यह भी बनती है कि भविष्य में हमारे पास पहले से कहीं बड़ी डिजिटल लाइब्रेरी होगी.

लेकिन डिजिटल संग्रह बनाना और सांस्कृतिक विरासत बचाना एक ही बात नहीं है.

किताब का डिजिटल टेक्स्ट उसके मूल संस्करण की जगह पूरी तरह नहीं ले सकता. कागज, संस्करण, छपाई, लेखक की टिप्पणियां और किताब का भौतिक अस्तित्व भी इतिहास का हिस्सा होते हैं.

इसलिए भविष्य में ऐसे मॉडल विकसित हो सकते हैं जिनमें किताबों और अन्य कॉपीराइट सामग्री के इस्तेमाल के लिए बाकायदा लाइसेंस लिया जाए. लेखक और प्रकाशक को भुगतान मिले और एआई कंपनियों को उच्च गुणवत्ता वाला डेटा भी उपलब्ध हो.

समाधान क्या हो सकता है?

सबसे जरूरी चीज पारदर्शिता है. लेखकों, प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं को यह पता होना चाहिए कि उनकी किताबें किस उद्देश्य से खरीदी और इस्तेमाल की जा रही हैं. सरकारें भी थोक खरीद और डिस्ट्रक्टिव स्कैनिंग को लेकर स्पष्ट नियम बना सकती हैं.

दूसरा रास्ता सार्वजनिक डोमेन की किताबों, लाइसेंस प्राप्त डेटासेट और नए मानव-लिखित डेटा का इस्तेमाल हो सकता है.

दुर्लभ किताबों के मामले में एक सरल नियम बनाया जा सकता है. स्कैन करने के बाद मूल प्रति नष्ट नहीं की जाएगी. उसे किसी पुस्तकालय, संग्रहालय या सुरक्षित अभिलेखागार में रखा जाएगा. अगर एआई कंपनियों को किताबों की जरूरत है तो उसके लिए लेखकों और प्रकाशकों को उचित भुगतान मिलना चाहिए. लाइसेंसिंग और रॉयल्टी पर आधारित व्यवस्था इस टकराव को सहयोग में बदल सकती है.

किताबो की भूमिका बदल रही है

एआई के आने से किताबों का अंत होने वाला नहीं है. बल्कि उनकी भूमिका बदल रही है. एक तरफ पुरानी किताबें एआई के लिए उच्च गुणवत्ता वाले डेटा का स्रोत बन रही हैं. दूसरी तरफ नई किताबें एआई की मदद से पहले से कहीं तेज गति से तैयार की जा रही हैं. असल खतरा एआई नहीं, बल्कि उसे इस्तेमाल करने का तरीका है. अगर तकनीक के नाम पर दुर्लभ किताबें बिना सोचे-समझे नष्ट होती रहीं, तो हम ऐसी चीज खो सकते हैं जिसे बाद में किसी मशीन की मदद से भी वापस नहीं लाया जा सकेगा.

आखिर किताब सिर्फ शब्दों का ढेर नहीं होती. वह किसी दौर की सोच, समाज की स्मृति और इंसानी अनुभव का रिकॉर्ड होती है.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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