CPI M Political History: आज पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु का जन्मदिन है. वे भारतीय वामपंथी आंदोलन के स्तंभ, लंबे समय तक पश्चिम बंगाल पर राज करने वाले कद्दावर नेता और एक ऐसा शख्सियत थे, जिन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उनकी अपनी पार्टी सीपीआई(एम) ने उन्हें यह पद लेने की अनुमति नहीं दी. इसे बाद में ज्योति बसु स्वयं ‘ ऐतिहासिक भूल’ (Historic Blunder) कह चुके थे.
मुख्यमंत्री के रूप में विरासत
ज्योति बसु 1977 से 2000 तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे कुल 23 वर्ष. यह अवधि भारतीय राज्य राजनीति में सबसे लंबे कार्यकालों में से एक है. उनके नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार ने भूमि सुधार, पंचायती राज को मजबूत करने, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाए. उन्होंने बंगाल को औद्योगिक और कृषि आधार पर स्थिरता दी, हालांकि बाद के वर्षों में उद्योगों के पलायन की आलोचना भी हुई.
वे एक अनुभवी संसदीय नेता, कुशल प्रशासक और वाम विचारधारा के प्रखर समर्थक थे. पूरे देश में उनकी छवि एक सौम्य लेकिन दृढ़ नेता की थी, जो गठबंधन राजनीति को अच्छी तरह समझते थे.
प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव और पार्टी का इनकार
1996 में लोकसभा चुनावों के बाद संयुक्त मोर्चा (United Front) सरकार बनने की स्थिति बनी. जनता दल, वामपंथी दल और अन्य क्षेत्रीय दलों का गठबंधन था, जिसे कांग्रेस बाहर से समर्थन दे रही थी.
विश्वनाथ प्रताप सिंह, लालू प्रसाद यादव सहित कई नेताओं ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार माना. प्रस्ताव सीपीआई(एम) के पास गया. पार्टी की पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति में चर्चा हुई. केंद्रीय नेतृत्व, विशेषकर कुछ हार्डलाइनर नेताओं ने तर्क दिया कि पार्टी अभी ‘ बुर्जुआ’ दलों के साथ गठबंधन करके सरकार चलाने की स्थिति में नहीं है. वे मानते थे कि इससे वामपंथी सिद्धांतों से समझौता होगा और पार्टी की क्रांतिकारी छवि प्रभावित होगी.
पार्टी ने प्रस्ताव ठुकरा दिया. ज्योति बसु ने पार्टी अनुशासन का पालन करते हुए इसे स्वीकार कर लिया. अंततः एच.डी. देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने.
‘Historic Blunder’ ज्योति बसु का अपना बयान
बाद में जब उनसे इस फैसले पर सवाल किया गया, तो ज्योति बसु ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह ‘ ऐतिहासिक भूल’ थी. उन्होंने कहा कि ‘ ऐसा मौका इतिहास में बार-बार नहीं आता.’ कई विश्लेषकों के अनुसार, अगर ज्योति बसु प्रधानमंत्री बनते तो वामपंथी दलों का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार हो सकता था, केंद्र में उनकी नीतियों का प्रभाव पड़ता और भारतीय राजनीति का स्वरूप बदल सकता था.
सीपीआई जैसे सहयोगी दल और कुछ अन्य नेताओं ने भी इस फैसले की आलोचना की. बाद में पार्टी के अंदर भी यह चर्चा होती रही कि यह अवसर गंवाना वाम आंदोलन के लिए नुकसानदायक साबित हुआ.
सबक और विरासत
ज्योति बसु की कहानी पार्टी अनुशासन, वैचारिक कठोरता और राजनीतिक अवसरों के बीच के टकराव को दर्शाती है. वे साबित करते हैं कि एक मुख्यमंत्री कितना लोकप्रिय और सक्षम हो सकता है, फिर भी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पार्टी के आंतरिक फैसलों पर निर्भर करती है.
उनका जन्मदिन हमें याद दिलाता है कि भारतीय राजनीति में व्यक्तिगत योग्यता के साथ-साथ संगठनात्मक निर्णय भी कितने निर्णायक होते हैं. ज्योति बसु आज भी पश्चिम बंगाल और वामपंथी राजनीति के प्रतीक बने हुए हैं- एक नेता जो प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन अपनी पार्टी की इच्छा के आगे झुक गए.
यह भी पढ़ें: जमीनी नेता या नितिन नबीन के करीबी? बांकीपुर से बीजेपी उम्मीदवार अभिषेक कुमार पर सियासत तेज
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



