Tata Trusts Infighting: टाटा समूह केवल एक करोबारी घराना नहीं है, बल्कि उस विश्वास का नाम है, जिसे हर कोई सौ फीसदी खरा मानता आया है. लेकिन इस समूह पर नियंत्रण करने वाले टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टियों के बीच चल रहे हितों के टकराव ने इस समूह को सुर्ख़ियों में ला खड़ा किया है. नियंत्रण की इच्छा के कारण शुरू हुए इस विवाद ने उद्योग जगत ही नहीं सरकार को भी परेशान कर दिया है. माना यह भी जा रहा है कि विवाद नहीं सुलझा तो सरकार अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप के जरिए यहां अस्थायी प्रशासक भी नियुक्त कर सकती है.
टाटा जिसे सभी भरोसे का साथी मानते रहे हैं, आज अपने भीतर टूट रहे भरोसे के कारण ऐसे दोराहे पर आ खड़ा हुआ है जहां “सेवा की भावना” और “सत्ता की चाह” निरंतर आपस में टकरा रहे हैं. बात हो रही है देश के सबसे बड़े व्यावसायिक घराने टाटा समूह से जुड़े टाटा ट्रस्ट्स की. जिसमे चल रहे हितों के टकराव ने आर्थिक जगत ही नहीं सरकार को भी परेशान कर दिया है. गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि ट्रस्ट्स में जारी संकट सुलझाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को भी दखल देना पड़ा.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट्स के शीर्ष प्रतिनिधियों से मुलाकात की और मामले पर चर्चा की. जाहिर सी बात है कि मामला पेचीदा होता नजर आ रहा है और गतिरोध यूं ही जारी रहा तो सरकारी हस्तक्षेप की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता. जानकारों की मानें तो कानूनी रूप से, सरकार यहां सीधे प्रशासक की नियुक्ती तो नहीं कर सकती, लेकिन बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट, 1950 की धारा 41-A से 41-D के तहत चैरिटी कमिश्नर को अधिकार है कि यदि किसी ट्रस्ट में “कुप्रबंधन या निर्णयहीनता” हो, तो वह अस्थायी प्रशासक (Administrator) नियुक्त कर सकता है.
नोएल टाटा है विवाद की असली जड़!
जानकारों की मानें तो टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा की नीतियों के कारण टाटा इंटरनेशनल को साईकिल, जूतों और छातों के कारोबार में करीब तीन हजार करोड़ का घाटा उठाना पड़ा. चर्चा है कि इस घटनाक्रम के साथ ही नोएल टाटा ने बाकि ट्रस्टियों को विश्वास में लिए बिना ट्रस्ट्स से करीब एक हजार करोड़ रुपए निकाल लिए. जिससे अविश्वास की खाई इतनी बड़ी हो गई कि विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. सूत्रों की मानें तो अगले एक सप्ताह में टाटा ट्रस्ट्स का विवाद नहीं सुलझा तो सरकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष माध्यम से ट्रस्ट्स में प्रशासक नियुक्त कर देगी. जिसके बाद समूह की मुसीबत बढ़ने के साथ ही विश्वसनीयता भी दांव पर लग जाएगी.
मतभेदों से बिगड़ रही बात
पिछले कुछ समय से आ रही रिपोर्ट्स के अनुसार टाटा ट्रस्ट्स में मतभेद बढ़ रहे हैं. यह वही टाटा ट्रस्ट्स है जो टाटा सन्स में लगभग 66% हिस्सेदारी रखता है. साफ़ शब्दों में समझा जाए तो नमक से लेकर सेमीकंडक्टर तक के कारोबार वाले टाटा समूह का असल मालिक टाटा ट्रस्ट्स है. ट्रस्ट्स से चल रहा विवाद उस समय सामने आया है जब टाटा सन्स की संभावित लिस्टिंग (शेयर बाजार में उतरने) पर भी मतभेद सामने आ रहे हैं. यह मामला लगभग 10 साल बाद फिर से टाटा बनाम शापूरजी पलोनजी समूह के उस टकराव की याद दिला रहा है, जो भारत के कॉरपोरेट इतिहास के सबसे बड़े विवादों में से एक रहा है.
इस पूरे मामले के केंद्र में हैं “मेहली मिस्त्री”, जो सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट दोनों के ट्रस्टी हैं. मिस्त्री के कार्यकाल के नवीनीकरण की समय-सीमा में महज एक दिन बचा है, लेकिन इसके लिए तीन ट्रस्टीज़ की मंज़ूरी अभी तक नहीं मिली है. सूत्रों के मुताबिक, मंज़ूरी भेजने की अंतिम तिथि 28 अक्टूबर है.अगर मिस्त्री, जो रतन टाटा के करीबी माने जाते हैं, सभी ट्रस्टीज़ से अपनी अवधि बढ़ाने की मंज़ूरी नहीं ले पाए, तो यह एक अभूतपूर्व स्थिति होगी जो मौजूदा तनाव को और बढ़ा सकती है. सूत्रों के अनुसार, इस मामले पर सर्वसम्मति बन पाना अब मुश्किल लग रहा है.
ट्रस्ट्स में मिस्त्री के कार्यकाल पर विवाद
जानकारी के अनुसार मिस्त्री के कार्यकाल के नवीनीकरण के लिए तीन ट्रस्टियों, जिनमे वरिष्ठ वकील दारियस खंबाटा, बैंकर प्रमीत झावेरी और जहांगीर एच.सी. जहांगीर (जहांगीर अस्पताल के चेयरमैन और सीईओ) ने समर्थन किया है. वहीं प्रस्ताव पर अभी तक टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और उपाध्यक्ष वीणु श्रीनिवासन तथा विजय सिंह ने जवाब नहीं दिया है. नोएल टाटा, रतन टाटा के सौतेले भाई हैं और कई टाटा समूह कंपनियों में नेतृत्व पदों पर हैं. रतन टाटा के निधन के बाद उन्हें टाटा ट्रस्ट्स का चेयरमैन बनाया गया.

बीते सप्ताह श्रीनिवासन ने सभी ट्रस्टीज़ से अपनी कार्यावधि अवधि बढ़ाने की मंज़ूरी ले ली थी, हालांकि, मिस्त्री ने शर्त रखी कि अगर एक ट्रस्टी का कार्यकाल बढ़ाया जाता है, तो सभी का बढ़ाया जाना चाहिए. मिस्त्री के समर्थक पक्ष का कहना है कि कार्यकाल का नवीनीकरण अपने आप हो जाना चाहिए और उसके बाद ट्रस्टी आजीवन ट्रस्टी बन जाते हैं. दूसरी ओर, विरोधी पक्ष का मत है कि ऐसा स्वतः नहीं होता. रतन टाटा के निधन के बाद, पिछले वर्ष टाटा ट्रस्ट्स ने यह प्रस्ताव पारित किया था कि हर ट्रस्टी को कार्यकाल नवीनीकृत होने पर आजीवन ट्रस्टीशिप (life trusteeship) मिल जाएगी. लेकिन इस मुद्दे पर कानूनी विशेषज्ञ भी दो भागों में बंटे हुए हैं.
पूर्व रक्षा सचिव के कारण आई दरार
ट्रस्टीज़ के बीच दरार उस समय सामने आई जब मिस्त्री गुट ने पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह को टाटा सन्स बोर्ड में ट्रस्ट्स के प्रतिनिधि के रूप में नामित करने का प्रस्ताव वापस ले लिया. गौरतलब है कि टाटा सन्स बोर्ड में नोएल टाटा और वीणु श्रीनिवासन भी नामित सदस्य हैं. टाटा ट्रस्ट्स को टाटा सन्स के बोर्ड में एक-तिहाई निदेशक नियुक्त करने और वीटो पावर का अधिकार है. विवाद को लेकर भारतीय उद्योग जगत में सरगर्मी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि टाटा ट्रस्ट्स में जारी संकट के कारण गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ट्रस्ट्स के शीर्ष प्रतिनिधियों से मुलाकात की और मामले पर चर्चा की.

जानकारी के अनुसार उन्होंने सलाह दी है कि टाटा समूह में स्थिरता बनी रहनी चाहिए, क्योंकि इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव है. इसके साथ ही, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने भी टाटा सन्स को 30 सितंबर 2025 तक सूचीबद्ध (लिस्ट) करने का निर्देश दिया था, जो अक्टूबर 2022 में लागू किए गए स्केल-आधारित नियामक ढांचे का हिस्सा है. हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा सन्स को RBI से बातचीत कर पब्लिक लिस्टिंग रोकने की सलाह दी थी. वहीं, शापूरजी पलोनजी समूह, जिसकी टाटा सन्स में लगभग 18% हिस्सेदारी है, ने हाल ही में फिर से टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी की लिस्टिंग की मांग दोहराई है.
अनिश्चितता से मंडरा रहे संकट के बादल
वर्तमान स्थिति के कारण भले ही टाटा समूह का भविष्य असुरक्षित न हो, लेकिन अनिश्चितता के बादल जरूर मंडरा रहे हैं. जानकारों की मानें तो टाटा ट्रस्ट्स में विभाजन (मेहील मिस्त्री बनाम नोएल टाटा) महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि नीति-निर्धारण और नियंत्रण का संघर्ष है. क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा सन्स में लगभग 66% हिस्सेदारी है, यानी वे असली नियंत्रक हैं. और यदि ट्रस्टी एकमत नहीं होते, तो निर्णय-प्रक्रिया धीमी हो जाएगी. जिससे नई नियुक्तियां, निवेश, CSR, और Tata Sons की रणनीतियाँ प्रभावित होंगी. और विवाद बढ़े, तो निवेशकों के विश्वास पर भी असर पड़ सकता है. जानकार यह भी मानते हैं कि टाटा समूह की कंपनियाँ जैसे TCS, Tata Steel, Tata Motors आदि का मजबूत वित्तीय आधार पर हैं, इसलिए व्यवसायिक रूप से समूह स्थिर रहेगी. लेकिन शासन-संबंधी अस्थिरता बनी तब तक जारी रह सकती हैं जब तक की टाटा ट्रस्ट्स के भीतर सहमति नहीं बनती.
सरकारी दखल की आशंका
जानकार यह भी मानते हैं कि सीमित परिस्थितियों में सरकार सीधे दखल देने के बजाए बल्कि नियामक और कानूनी रूप से हस्तक्षेप कर सकती है. दरअसल टाटा ट्रस्ट्स “पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट्स” हैं, जिनका पंजीकरण बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट, 1950 के तहत हुआ है. इस कानून की धारा 41-A से 41-D के तहत यदि किसी ट्रस्ट में गंभीर कुप्रबंधन, संपत्ति का दुरुपयोग या ट्रस्ट के उद्देश्य से विचलन हो तो चारिटी कमिश्नर (को अधिकार है कि वह ट्रस्ट को निर्देश जारी कर सकता है, जांच करा सकता है या अस्थायी प्रशासक (Administrator/Receiver) भी नियुक्त कर सकता है. यदि ट्रस्ट बोर्ड निर्णय नहीं ले पा रहा और पब्लिक फंड्स प्रभावित हो रहे हैं तो इसकी संभावना बहुत ज्यादा है.
NCLT में भी जा सकता है मामला
जानकारों का मानना है कि टाटा सन्स एक होल्डिंग कंपनी है और उस पर कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय (MCA) और RBI (as NBFC) का नियंत्रण है. कंपनी एक्ट की धारा 241-242 के तहत अगर किसी कंपनी में कुछ गलत होता है तो केंद्र सरकार NCLT (National Company Law Tribunal) में आवेदन देकर प्रशासक या निदेशक मंडल को बदलने का आदेश दिला सकती है. यह वही धारा है जिसके तहत सायरस मिस्त्री मामला NCLT में चला था.
“सेवा या सत्ता” चल रहा द्वन्द
टाटा ट्रस्ट्स आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ “सेवा की भावना” और “सत्ता की चाह” आमने-सामने हैं. मेहली मिस्त्री का कार्यकाल अब सिर्फ एक व्यक्ति का मुद्दा नहीं बचा है. अब सरकार इस विवाद की जगह स्थिरता चाहती है और ट्रस्ट्स से जुड़े लोग इस पर अपना नियंत्रण, लेकिन बाजार केवल पारदर्शिता चाहता है. ऐसे में आने वाला समय ही बताएगा कि क्या टाटा समूह अपनी नैतिक विरासत को कायम रख पाएगा या ये भी उन कॉरपोरेट घरानों में शामिल हो जाएगा, जहाँ सिद्धांत धीरे-धीरे बोझ तले दब जाते हैं!
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-भारत एक्सप्रेस
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