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एआई पर बढ़ती निर्भरता: सहायक तकनीक या रचनात्मकता के लिए खतरा?

नई दिल्ली में चल रहे अंतरराष्ट्रीय AI प्रभाव शिखर सम्मेलन में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि एआई ने जीवन को आसान बनाया, लेकिन अब हम बिना इसके सोच भी नहीं पाते. छात्रों में कॉपी-पेस्ट संस्कृति, रचनात्मकता में 40% कमी और आत्मा-रहित कला के खतरे पर बहस; समाधान में एआई-मुक्त शिक्षा और डिजिटल डिटॉक्स की मांग..

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Dependability of AI: आजकल कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे जीवन का इस कदर हिस्सा बन चुकी है कि स्मार्टफोन से लेकर स्मार्ट होम तक हर जगह AI की छाप दिखाई देती है. इस सप्ताह नई दिल्ली में शुरू हुए अंतरराष्ट्रीय AI प्रभाव शिखर सम्मेलन में विश्व के नेता और विशेषज्ञ इसी पर चर्चा कर रहे हैं. इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य एआई के वैश्विक प्रभावों को समझना और नीतियां बनाना है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हम एआई को अपनाते हुए अपनी स्वतंत्रता और रचनात्मकता को खो नहीं रहे? एआई ने सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन साथ ही हमें इतना आश्रित बना दिया है कि बिना इसके सोचना भी मुश्किल हो गया है.

दैनिक जीवन का हिस्सा बना AI

बता दें कि AI की निर्भरता अब दैनिक जीवन का हिस्सा बन गई है. सुबह उठते ही गूगल असिस्टेंट या सिरी मौसम, ट्रैफिक और समाचार बता देता है. तो वहीं कार्यालय में ईमेल लिखने से लेकर डेटा विश्लेषण तक, चैटजीपीटी जैसे टूल्स सब कुछ तुरंत कर देते हैं. भारत में डिजिटल इंडिया अभियान ने 80 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता पैदा किए हैं. उबर, जोमैटो, ब्लिंकिट जैसे एआई आधारित ऐप्स ने जीवन को अभूतपूर्व सरलता प्रदान की है. लेकिन यह निर्भरता खतरनाक साबित हो रही है. शिक्षा क्षेत्र में यह निर्भरता सबसे अधिक दिखाई दे रही है जहां छात्र अब निबंध लिखने के बजाय एआई से कॉपी-पेस्ट कर लेते हैं. कोटा के कोचिंग संस्थानों से लेकर आईआईटी तक, एआई टूल्स ने होमवर्क को आसान बना दिया, लेकिन समझ की गहराई कम कर दी है.

क्या रचनात्मकता को खतम कर रहा AI?

बताते चलें कि AI का सबसे घातक प्रभाव रचनात्मकता पर पड़ रहा है. पहले कलाकार, लेखक और संगीतकार अपनी कल्पना से कृतियां रचते थे लेकिन अब मिडजर्नी या डैल-ई जैसे टूल्स प्रॉम्प्ट पर चित्र बना देते हैं. लेकिन क्या यह रचनात्मकता है? AI जनित कला में आत्मा का अभाव है. यह डेटा पर आधारित नकल मात्र है. बॉलीवुड में एआई स्क्रिप्ट राइटर आ रहे हैं, जो पुरानी फिल्मों के पैटर्न दोहराते हैं. नतीजा? नवीनता का लोप. एक अध्ययन बताता है कि एआई सहायता से बनी कहानियां 40% कम मूल होती हैं. एआई की ‘परफेक्शन’ मानव प्रयास को कमजोर बनाती है. कल्पना कीजिए एक चित्रकार को, वह घंटों ब्रश चलाता है, गलतियां सुधारता है और यही प्रक्रिया रचनात्मकता को परिपक्व बनाती है. परंतु एआई में यह संघर्ष नहीं होता.

क्या हैं सोल्यूशंस?

अब बात करते हैं कि इस निर्भरता का समाधान क्या है? इसके लिए सबसे पहले शिक्षा में AI को सहायक न मानकर चुनौती बनाएं. स्कूलों में ‘एआई-मुक्त’ घंटे रखें, जहां बच्चे स्वयं रचें. दूसरा, नीतियां बनाएं जैसे यूरोप का GDPR, जो AI पारदर्शिता सुनिश्चित करता है. भारत को शिखर सम्मेलन से प्रेरणा लेनी चाहिए और ‘एआई साक्षरता’ अभियान चलाना चाहिए. तीसरा, रचनाकारों को प्रोत्साहित करें, उन्हें सरकारी अनुदान दें जो एआई-रहित कला को बढ़ावा दे. व्यक्तिगत स्तर पर ‘डिजिटल डिटॉक्स’ अपनाएं. एआई जीवन का हिस्सा बने रहना चाहिए, लेकिन इस पर निर्भरता और रचनात्मक विनाश को रोकना होगा. ज्ञात रहे कि रचनात्मकता मानव का मूल गुण है, इसे बचाना हमारा कर्तव्य है.

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-भारत एक्सप्रेस



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