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आजादी का अधूरा हिसाब: दो तस्वीरें, तैंतीस साल

1991 economic crisis: 1991 में भारत को 47 टन सोना लंदन भेजना पड़ा था, आज विदेशी मुद्रा भंडार 729 अरब डॉलर के करीब है. 33 साल के आर्थिक सुधारों में भारत ने क्या पाया और क्या अब भी अधूरा है?

India 1991 economic crisis Story

1991 का आर्थिक संकट

Edited by Sahil Singh

1991 economic crisis: जनवरी 1991 में भारत के पास इतनी विदेशी मुद्रा नहीं बची थी कि दो हफ्ते से ज़्यादा का आयात हो सके. जुलाई में सरकार को 47 टन सोना जहाज़ से लंदन भेजना पड़ा गिरवी का कागज नहीं, असली धातु. इस अगस्त, इक्कीस तारीख को खत्म हुए हफ्ते में, वही देश 729.3 अरब डॉलर के भंडार पर बैठा है, और दस दिन बाद आए तिमाही आँकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है.

यह फासला जितना बड़ा दिखता है, उतना आसान नहीं है. असली सवाल यह नहीं कि हम कितना आगे आए. सवाल यह है कि किस तरह की आजादी हमने खरीदी, और किस तरह की आजादी अब भी गिरवी है.

जब बाजार की जगह बाबू तय करता था

1991 से पहले का भारत एक ऐसी व्यवस्था थी जहां बाजार की जगह बाबू तय करता था कि कौन क्या बना सकता है, कितना आयात कर सकता है, किस कीमत पर. यह सिर्फ अक्षमता की बात नहीं थी. यह एक तरह की परतंत्रता थी, जिसमें उद्यमी की स्वतंत्रता किसी दफ्तर की मुहर पर टिकी होती थी. 1990 में सबसे ऊंचा आयात शुल्क 355 प्रतिशत था; औसत दर 113 प्रतिशत, जो दस साल पहले सिर्फ 38 प्रतिशत हुआ करती थी. यानी आजादी घट रही थी, बढ़ नहीं रही थी ठीक उस समय जब दुनिया के बाकी हिस्सों में बाजार खुल रहे थे.

इस परतंत्रता का प्रबंधन जिस दफ्तर के हाथ में था, उसमें तीन हजार कर्मचारी थे और साल में दो लाख अर्जियां निपटती थीं. 1991 के फैसलों ने उस दफ्तर से अधिकार छीन लिया, नाम बदल गया, काम खत्म हो गया. डगलस इरविन के शोध में एक ब्योरा है जो इस बदलाव की कीमत बता देता है: गुस्साए क्लर्क वाणिज्य मंत्री तक पहुँच गए थे; वे कमरे में नहीं थे; दरवाजा टूटा. एक दस्तखत की सत्ता जब छिनती है, तो प्रतिरोध वहीं से आता है जहाँ वह सत्ता टिकी थी. जनता से नहीं, तंत्र से.

वही दवा, दो अलग नतीजे

यहीं से वह सवाल उठता है जो पूरे इतिहास को समझने की कुंजी है: यही तो 1966 में भी किया गया था. रुपये का 57 प्रतिशत अवमूल्यन हुआ, और दो महीने में पलट दिया गया. वाणिज्य मंत्री ने खुद इसे “आजादी के बाद की सबसे बड़ी भूल” कहा. 1991 में वही दवा दोबारा दी गई. दो किस्तों में रुपया 21.1 से 25.6 प्रति डॉलर, कुल 18.7 प्रतिशत पर इस बार पीछे नहीं हटा गया.

फर्क अर्थशास्त्र में नहीं, राजनीति के क्रम में था. 1966 में अवमूल्यन विश्व बैंक की शर्त जैसा दिखा, और भारत में किसी नीति को मारने का सबसे पक्का तरीका यही था कि उसे बाहर से थोपी हुई बता दो. 1991 में यह भूल टाली गई: पहले फैसला अपना, फिर मुद्रा कोष से बातचीत. नतीजा वही निकला, पर मालिकाना अपना रहा और जनतंत्र में सुधार तभी टिकता है जब वह उधार का न लगे.

जो सुधार कभी संसद तक नहीं पहुंचा

पर यहाँ ठहरना जरूरी है, क्योंकि आधा सच आधा झूठ जितना ही भ्रामक हो सकता है. 1991 में जो सुधार हुए, वे लगभग सभी वहीं तक सीमित रहे जहाँ तक कार्यपालिका अकेले पहुंच सकती थी. विनिमय दर, आयात शुल्क, लाइसेंस, ये सब मंत्रालय की अधिसूचना से बदल गए, संसद की मंजूरी के बिना. मनमोहन सिंह ने बाद में खुद स्वीकार किया कि उन्होंने मुख्यतः वही किया जिसके लिए सदन जाने की जरूरत नहीं थी. जो सुधार संसद से गुजरने थे. श्रम कानून, कृषि, भूमि वे तब भी नहीं छुए गए. आज भी नहीं छुए गए हैं.

यह अंतर सिर्फ नीतिगत नहीं, नैतिक है. जिस आजादी की कीमत किसी को नहीं चुकानी पड़ी आयातक की, निर्यातक की, शहरी उपभोक्ता की वह आसानी से मिल गई. जिस आजादी की कीमत किसान या मजदूर को चुकानी थी, वह टाल दी गई. और यह कोई तीस साल पुरानी बात नहीं इसी तिमाही के आंकड़े इसे दोहराते हैं. कृषि की वृद्धि 3.6 प्रतिशत पर सिमटी है, जबकि वित्तीय और पेशेवर सेवाएँ 12 प्रतिशत से बढ़ रही हैं. और उर्वरक सब्सिडी, जिसकी कटौती पर 1991 में सत्ताधारी दल के अपने सांसद तीन दिन संसद में बरसे थे, आज 57 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है. जो राजनीतिक रूप से महँगा था, वह तब भी टाला गया, आज भी टाला जा रहा है.

7.8 प्रतिशत- किसके लिए, किस कीमत पर?

तो जब हम कहते हैं कि अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत बढ़ी, हमें पूछना चाहिए. किसके लिए, और किस कीमत पर. स्थिर मूल्यों पर निर्यात 12 प्रतिशत बढ़ा और आयात सिर्फ 1 प्रतिशत घटा, पर चालू मूल्यों पर आयात 31 प्रतिशत बढ़ा क्योंकि तेल और गैस की कीमतें 58 प्रतिशत ऊपर गईं. यह ठीक वही पुराना प्रश्न है जिसे 1991 के अनुभव ने हल करने की कोशिश की थी: भारत की तकलीफ कभी “बहुत ज्यादा आयात” नहीं थी, तकलीफ यह थी कि जरूरी आयात का भुगतान कैसे हो. तब जवाब था निर्यात बढ़ाओ, नियंत्रण घटाओ. आज का जवाब उतना साफ नहीं है, क्योंकि सीमा शुल्क राजस्व में 36 प्रतिशत की उछाल यह भी बता सकती है कि हम चुपचाप संरक्षण की तरफ लौट रहे हैं बिना यह पूछे कि ऊँचा शुल्क किसे बचाता है और किसकी कीमत पर.

नाप एक चीज है, हकीकत दूसरी

आँकड़े की भाषा में भी एक चेतावनी छिपी है. इस साल अपनाई गई नई गणना-पद्धति में विनिर्माण की वास्तविक वृद्धि 9.2 प्रतिशत है, पर नाममात्र सिर्फ 7.7 क्योंकि कच्चे माल की कीमत उत्पाद से तेज बढ़ी है. सरकार ने यह विसंगति खुद अपने दस्तावेज में दर्ज की है, और यह पारदर्शिता की मिसाल है. पर इससे एक विनम्र सच सामने आता है: विकास दर एक नाप है, कोई ठोस चीज नहीं. और 1996 के एक सर्वेक्षण में 80 प्रतिशत मतदाता यह भी नहीं जानते थे कि “आर्थिक सुधार” शब्द का मतलब क्या है. तीस साल बाद, कितने लोग जानते हैं कि यह नाप किस पैमाने से बनी है. यह भी उतना ही जरूरी सवाल है जितना नाप खुद.

अगली बार, आधा नहीं

भारत ने जो आजादी सस्ती थी, वह खरीद ली. बाजार खुला. भंडार भरा. वृद्धि लौटी. जो आजादी महंगी थी. खेत में, फैक्ट्री के फर्श पर, जमीन के कागज में वह टल गई. तीस साल पहले भी, आज भी.

अगला संकट कब आएगा, यह पूछना ही गलत सवाल है. संकट आता रहेगा 1966 में आया, 1991 में आया. असली सवाल यह है: जब आए, तो हम फिर आधा काम करेंगे, या पूरा? 729 अरब डॉलर संकट टाल सकते हैं. आजादी नहीं खरीद सकते. वह सिर्फ एक फैसले से आती है. जो अब तक किसी सरकार ने नहीं लिया.

-भारत एक्सप्रेस



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