भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी (2047) की ओर बढ़ते हुए एक वैश्विक महाशक्ति बनने का लक्ष्य रखता है. इस यात्रा में एक प्रमुख चुनौती ऊर्जा आयात पर निर्भरता है. भारत हर साल 130 अरब डॉलर से अधिक का तेल और गैस आयात करता है, जो हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ डालता है. इस निर्भरता से मुक्त होना न केवल एक आर्थिक आवश्यकता है, बल्कि यह रणनीतिक दृष्टिकोण से भी अधिक महत्वपूर्ण है.
पूरे विश्व में ऊर्जा परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव आ रहा है. परिवहन, हीटिंग और पारंपरिक उद्योग सभी जीवाश्म ईंधन से हरे बिजली पर स्थानांतरित हो रहे हैं. सूर्य और पवन भविष्य के ईंधन बन रहे हैं. लेकिन एक समस्या अभी भी मौजूद है—तत्काल बिजली का वैश्विक व्यापार संभव नहीं है. जहां तेल की कीमतें सभी देशों में समान होती हैं, वहीं बिजली की कीमतें बहुत भिन्न होती हैं. लेकिन अब हालात बदलने जा रहे हैं. उच्च वोल्टेज डायरेक्ट करंट (HVDC) ट्रांसमिशन, बैटरी स्टोरेज की घटती लागत और गहरे महासागरों में काम करने योग्य सबमरीन केबल्स के साथ वैश्विक बिजली ग्रिड अब संभव है.
भारत का ‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ मिशन
भारत का ‘वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड’ मिशन पहले से ही एक वैश्विक ऊर्जा नेटवर्क बनाने का सपना देखता है. भारत के पास विश्व के सबसे विस्तृत और मजबूत पावर ग्रिड में से एक है और अगले आठ वर्षों में ग्रिड विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए 100 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया जाएगा. भारत पहले ही नेपाल, भूटान और बांगलादेश के साथ अपनी पावर ग्रिड जोड़ चुका है. अगला कदम सऊदी अरब से जापान तक एक 50 GW “ऊर्जा सुपरहाईवे” बनाने का है.
भारत और सऊदी अरब के बीच 10 GW का लिंक पांच साल में बन सकता है, और सऊदी अरब का पहले से ही यूरोप से जुड़ने का रास्ता तैयार है. इससे भारत को यूरोपीय ग्रिड से जुड़ने का मौका मिलेगा. जापान से जुड़ने से भारत के सूरज से प्राप्त विद्युत ऊर्जा जापान की शाम की बिजली मांग को पूरा करेगी, जहां बिजली की कीमत 23 सेंट प्रति यूनिट तक पहुंच सकती है.
स्टोरेज की समस्या और समाधान
क्लीन ऊर्जा संक्रमण में एक बड़ी बाधा स्टोरेज की है. ब्लूमबर्ग के अनुसार, 2050 तक नेट ज़ीरो हासिल करने के लिए 4,000 GW की ऊर्जा स्टोरेज क्षमता की आवश्यकता होगी. लेकिन अच्छी बात यह है कि स्टोरेज की लागत तेजी से घट रही है. भारत के पास जल विद्युत क्षमता है, जिसे पंप्ड स्टोरेज समाधान के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. HVDC ट्रांसमिशन के साथ बड़े पैमाने पर स्टोरेज को एकीकृत करके हम एक वैश्विक ऊर्जा नेटवर्क बना सकते हैं जो अधिशेष ऊर्जा को सीमा पार भेज सके.
भारत को ऊर्जा हब बनाने का रोडमैप
भारत को दुनिया के ऊर्जा हब में बदलने के लिए HVDC कन्वर्टर्स, सबमरीन केबल्स, ऊर्जा स्टोरेज और विशेष केबल-लेइंग जहाजों के निर्माण में तेजी लानी होगी. अगले दशक में हर साल 50 GWh की बैटरी ऊर्जा स्टोरेज और पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS) को लागू करना होगा. इसके साथ ही, भारत को पड़ोसी देशों को एकीकृत करने के लिए अपने ग्रिड का विस्तार करना होगा, जैसे हम अब अपने राज्यों में करते हैं.
भारत को वैश्विक ऊर्जा व्यापार का केंद्र बनाने के लिए अगले कुछ वर्षों में यूरोप, मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया पैसिफिक के देशों को हमारे विद्युत एक्सचेंज में जोड़ने की आवश्यकता होगी. यह हमें 24 घंटे तक नवीनीकरण ऊर्जा का उत्पादन और निर्यात करने में सक्षम बनाएगा. 2035 तक, वैश्विक ग्रिड इंटरकनेक्टेड होगा और भारत रूस, यूरोप और अमेरिका से ऊर्जा व्यापार कर सकेगा.
2047 में भारत का ऊर्जा दृष्टिकोण
2047 तक, भारत को 130 अरब डॉलर के ऊर्जा आयातक से 100 अरब डॉलर के क्लीन बिजली निर्यातक में बदलना संभव है. इससे भारतीय मुद्रा मजबूत होगी, मुद्रास्फीति कम होगी, और हमारे क्रेडिट रेटिंग में सुधार होगा. यह भारत के विकास के रास्ते में एक महत्वपूर्ण कदम होगा और भारत को एक प्रमुख ऊर्जा शक्ति बना देगा.
भारत का अगला दशक न केवल ऊर्जा स्वावलंबन के लिए, बल्कि दुनिया के ऊर्जा हब बनने के लिए भी महत्वपूर्ण होगा. तकनीक तैयार है, आर्थिक दृष्टिकोण मजबूत है, और पूरी दुनिया ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ रही है. अगर हम अब कार्य करें, तो 2047 तक भारत न केवल ऊर्जा स्वतंत्र होगा, बल्कि ऊर्जा का वैश्विक नेता बनकर उभरेगा, जो पूरी दुनिया को अपनी सौर और पवन ऊर्जा से शक्ति प्रदान करेगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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