रिपोर्ट-अतुल यादव
Barasat Assembly Election 2026: कोलकाता की सरहदों से सटा बारासात, जहां विकास की चमक भी है और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष भी. 1951 से लेकर दशकों तक यहां लाल झंडा लहराता रहा लेकिन ममता बनर्जी की ‘परिवर्तन’ लहर ने इस वामपंथी किले को ढहाकर यहां ‘जोड़ा फूल’ खिला दिया.
हालांकि 2026 के इस चुनाव में हवा का रुख कुछ बदला हुआ है. एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को भांपते हुए टीएमसी ने अपने पुराने सिपाही का टिकट काटकर नया चेहरा उतारा है, जिसने इस मुकाबले को त्रिकोणीय और बेहद रोमांचक बना दिया है.
टीएमसी का दांव बनाम बीजेपी का भरोसा
बारासात की सत्ता पर काबिज रहने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने इस बार बड़ा जोखिम उठाया है. मौजूदा विधायक दीपक चटर्जी का पत्ता काटकर टीएमसी ने सब्यसाची दत्ता पर दांव लगाया है. टीएमसी को उम्मीद है कि चेहरा बदलने से जनता की नाराजगी कम होगी.
वहीं बीजेपी ने अपने पुराने और अनुभवी नेता शंकर चटर्जी पर ही भरोसा जताया है, जो पिछले कई चुनावों से जमीन पर टीएमसी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं. दूसरी तरफ, वामपंथी मोर्चे से फॉरवर्ड ब्लॉक के हिमांता दास अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए जीत का दंभ भर रहे हैं.
जातीय समीकरण क्या कहता है?
बारासात की जीत का गणित यहाँ के सामाजिक ताने-बाने में छिपा है. 2 लाख 88 हजार मतदाताओं वाली इस सीट पर हार-जीत का फैसला दो बड़े समुदाय करते हैं:
दलित मतदाता: करीब 17.08 फीसदी आबादी के साथ दलित वोटर यहाँ निर्णायक भूमिका में हैं.
मुस्लिम मतदाता: 16.60 फीसदी मुस्लिम आबादी टीएमसी का मजबूत आधार रही है, लेकिन बीजेपी इसमें सेंधमारी की कोशिश में है.
यही वजह है कि सभी पार्टियों ने अपने घोषणापत्र में इन समुदायों के लिए लोकलुभावन वादों की झड़ी लगा दी है.
बारासात में क्या हैं चुनावी मुद्दे?
बारासात को जिला मुख्यालय होने और कोलकाता के नजदीक होने का फायदा तो मिला, लेकिन बढ़ती आबादी ने यहाँ की व्यवस्थाओं की कमर तोड़ दी है. विपक्ष इन 3 बड़े मुद्दों पर टीएमसी को घेर रहा है:
स्वच्छ पेयजल: शहरी इलाका होने के बावजूद शुद्ध पानी की भारी किल्लत है.
स्वास्थ्य सेवाएं: जिला अस्पताल पर बढ़ता दबाव और बदहाल स्वास्थ्य ढांचा.
कानून व्यवस्था: बढ़ते अपराध और स्थानीय गुंडागर्दी यहाँ एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है.
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हाई वोटिंग और एंटी-इंकंबेंसी: क्या पलटेगा पासा?
बारासात की एक खास बात यहाँ का वोटिंग पैटर्न है. 2011 के बाद से यहाँ हर चुनाव में 80 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ है. रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग अक्सर सत्ता परिवर्तन का संकेत मानी जाती है. बीजेपी का तर्क है कि इस बार जनता टीएमसी के भ्रष्टाचार और सिंडिकेट राज से तंग आ चुकी है जबकि टीएमसी का दावा है कि ममता सरकार की कल्याणकारी योजनाएं उनकी जीत सुनिश्चित करेंगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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