रिपोर्ट- मनोज सिंह
छत्तीसगढ़ के सुकमा से एक खबर सामने आई है. बस्तर के जंगलों में पिछले कई दशकों से जारी हिंसा के बीच शांति की एक नई किरण दिखाई दे रही है. सुकमा पुलिस को एक बड़ी कामयाबी मिली है, जहां एक साथ 26 ‘हार्डकोर’ नक्सलियों ने हथियार डालकर मुख्यधारा में शामिल होने का फैसला किया है.
यह कोई मामूली सरेंडर नहीं है, क्योंकि आत्मसमर्पण करने वाले इन नक्सलियों पर कुल मिलाकर 64 लाख रुपये का इनाम घोषित था. इसमें सबसे खास बात यह है कि सरेंडर करने वालों में 7 महिला नक्सली भी शामिल हैं.
कौन हैं ये नक्सली और क्यों था इनका खौफ?
ये सभी नक्सली कोई साधारण सदस्य नहीं बल्कि संगठन के काफी पुराने और सक्रिय चेहरे रहे हैं. पुलिस के मुताबिक, ये आत्मसमर्पित नक्सली माड़ डिवीजन, PLGA (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) और सुकमा जिले के अलग-अलग इलाकों में सक्रिय थे. इनका नेटवर्क सिर्फ छत्तीसगढ़ तक ही सीमित नहीं था, बल्कि ओडिशा और माड़ के सीमावर्ती इलाकों में हुई कई बड़ी वारदातों में भी इनका हाथ रहा है.
लंबे समय से सुरक्षाबल इनकी तलाश में थे, लेकिन अब इन्होंने खुद हिंसा का रास्ता छोड़कर लोकतंत्र पर भरोसा जताया है. इनके पास से भारी मात्रा में हथियार भी बरामद किए गए हैं, जो इस बात का सबूत है कि ये किसी बड़ी साजिश का हिस्सा थे.
आखिर क्यों बदला इनका मन?
अक्सर यह सवाल उठता है कि सालों से जंगल में लड़ रहे ये लोग अचानक बाहर क्यों आ रहे हैं? सुकमा के एसपी किरण चव्हाण ने बताया कि ये सभी नक्सली शासन की ‘पुनर्वास नीति’ और विकास कार्यों से प्रभावित हुए हैं. बस्तर के अंदरूनी इलाकों में अब सड़कें, स्कूल और अस्पताल पहुंच रहे हैं, जिससे इन नक्सलियों को यह समझ आने लगा है कि ‘बंदूक की लड़ाई’ से उनका या उनके समाज का भला नहीं होने वाला. साथ ही, संगठन के अंदर होने वाले शोषण और बाहरी दबाव ने भी इन्हें यह कदम उठाने पर मजबूर किया.
अब आगे क्या होगा?
सरेंडर करने वाले सभी 26 नक्सलियों को अब सरकार की पुनर्वास नीति के तहत मदद दी जाएगी. उन्हें न केवल आर्थिक सहायता मिलेगी, बल्कि समाज में सम्मान के साथ रहने के लिए रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराए जाएंगे.
एसपी किरण चव्हाण ने इस मौके पर एक भावुक अपील भी की. उन्होंने कहा, “जो नक्सली अब भी जंगलों में भटक रहे हैं, उन्हें हिंसा छोड़कर वापस लौट आना चाहिए. सरकार और प्रशासन उनका स्वागत करने के लिए तैयार है. मुख्यधारा में लौटकर ही वे अपने परिवार और क्षेत्र का भला कर सकते हैं.”
यह सरेंडर बस्तर में सुरक्षाबलों की रणनीति और सरकार के भरोसे की जीत मानी जा रही है. अगर इसी तरह नक्सलियों का मोहभंग होता रहा, तो वो दिन दूर नहीं जब सुकमा और बस्तर के जंगलों में गोलियों की गूंज की जगह शांति और खुशहाली का शोर होगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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