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‘AAP’ से बागी होकर भी कैसे ‘सांसद’ बने रहे राघव चड्ढा? समझिए दलबदल विरोधी कानून का वो पेच, जिसने केजरीवाल के हाथों से छीन ली बाजी!

Raghav Chadha और 6 सांसदों ने ‘दो-तिहाई नियम’ के तहत BJP में विलय कर दलबदल कानून से बचाव कर लिया. Rajya Sabha Secretariat ने इसे वैध मानते हुए सभी को BJP सांसद के रूप में मान्यता दे दी…

Raghav chadha latest news: आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों ने जब भाजपा का दामन थामा, तो हर किसी के मन में एक ही सवाल था कि “क्या इनकी सांसदी बचेगी?” रविवार को संजय सिंह की ‘अयोग्यता’ वाली अर्जी को खारिज करते हुए राज्यसभा सचिवालय ने जब राघव चड्ढा और उनके साथियों को भाजपा सांसद के रूप में मान्यता दी, तो इस ‘सियासी चमत्कार’ के पीछे छिपा था संविधान का एक खास गणित.

दरअसल राघव चड्ढा ने दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की उस ‘खिड़की’ का इस्तेमाल किया, जहां से वे सुरक्षित निकल गए और केजरीवाल की शिकायत धरी की धरी रह गई.

10 में से 7: ‘दो-तिहाई’ वाला वो जादुई आंकड़ा

दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के तहत अगर कोई एक सांसद अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता चली जाती है. लेकिन इसका एक बड़ा ‘अपवाद’ (Exception) है. कानून कहता है कि अगर किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसद एक साथ मिलकर किसी दूसरी पार्टी में अपना विलय (Merger) करते हैं, तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होता.

गणित समझिए: ज्ञात रहे राज्यसभा में ‘आप’ के कुल 10 सांसद थे.

नियम: 10 का दो-तिहाई हिस्सा (6.66) यानी कम से कम 7 सांसद चाहिए थे.

हकीकत: राघव चड्ढा ने ठीक 7 सांसदों का गुट बनाया और एक साथ भाजपा में विलय का ऐलान कर दिया. इसी ‘7’ के नंबर ने उन्हें अयोग्य होने से बचा लिया.

विलय बनाम विभाजन: क्यों जीत गए राघव?

साल 2003 में संविधान में किए गए 91वें संशोधन के बाद ‘पार्टी विभाजन’ (Split) के आधार पर सदस्यता बचाना नामुमकिन हो गया था. अब सिर्फ ‘विलय’ (Merger) का ही रास्ता बचा है. राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बार-बार ‘विलय’ शब्द का इस्तेमाल किया. उन्होंने व्यक्तिगत इस्तीफा नहीं दिया बल्कि राज्यसभा सचिवालय को दस्तावेज सौंपे कि ‘आप’ का एक बड़ा हिस्सा अब भाजपा का अंग बन चुका है. सचिवालय ने इसी तकनीकी आधार पर इसे कानूनी रूप से सही माना और नोटिफिकेशन जारी कर दिया.

संजय सिंह की चिट्ठी क्यों हुई बेअसर?(Anti-Defection Law)

‘AAP’ के फायरब्रांड नेता संजय सिंह ने सभापति को चिट्ठी लिखकर इन सातों को ‘विश्वासघाती’ बताया और सदस्यता रद्द करने की मांग की. लेकिन कानून भावनाओं पर नहीं, नंबर्स पर चलता है. चूंकि राघव गुट ने पहले ही सदन के नियमों के मुताबिक दो-तिहाई सांसदों का समर्थन पेश कर दिया था, इसलिए सभापति और सचिवालय के पास उन्हें ‘अयोग्य’ करार देने का कोई ठोस आधार नहीं बचा. संजय सिंह की मांग को ‘संख्याबल’ के आगे खारिज होना ही था.

यह भी पढ़ें: राज्यसभा में केजरीवाल का गेम ओवर!… राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों को BJP सदस्य के तौर पर मिली मान्यता; अब क्या करेंगे संजय सिंह?

राज्यसभा में बढ़ा भाजपा का कद

इस कानूनी लड़ाई (Anti-Defection Law) की जीत का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिला है. अब उच्च सदन में भाजपा के सदस्यों की संख्या 113 पहुँच गई है. वहीं, आम आदमी पार्टी के पास अब इतने भी सांसद नहीं बचे कि वे सदन में कोई बड़ा विरोध दर्ज करा सकें. राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल जैसे चतुर रणनीतिकारों ने न केवल पाला बदला, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि वे अगले 6 साल तक (जब तक उनका कार्यकाल है) भाजपा की बेंच पर मजबूती से बैठे रहेंगे.

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-भारत एक्सप्रेस



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