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‘जिन मस्जिदों को नुकसान पहुंचा रहे हो, वो फिर आबाद होंगी’, मौलाना अरशद मदनी ने सरकार पर क्या कहा?

मौलाना अरशद मदनी के नए बयान ने फिर चर्चा छेड़ दी है. मस्जिदों, इस्लाम, मदरसों और मौजूदा हालात पर दिए गए उनके बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है. जानिए क्या कहा और क्यों रहते हैं अक्सर सुर्खियों में?

Arshad Madani in the headlines once again over his statement

एक बार फिर बयान को लेकर सुर्खियों में अरशद मदनी

देश के प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरुओं में शुमार मौलाना सैयद अरशद मदनी एक बार फिर अपने एक बयान को लेकर चर्चा में आ गए हैं. दारुल उलूम देवबंद से जुड़े रहे अरशद मदनी जमीयत उलेमा-ए-हिंद के एक धड़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. उन्होंने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक संदेश साझा किया, जिसमें मस्जिदों, इस्लाम और मौजूदा परिस्थितियों को लेकर अपनी राय रखी. उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई चर्चा शुरू हो गई है.

मस्जिदों को लेकर क्या कहा?

सोशल मीडिया पर जारी अपने संदेश में अरशद मदनी ने कहा कि जिन मस्जिदों को आज नुकसान पहुंचाया जा रहा है या जो खत्म की जा रही हैं, वे भविष्य में फिर से आबाद होंगी. उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा आएगा जब वहां दोबारा धार्मिक गतिविधियां शुरू होंगी और अल्लाहु अकबर की आवाजें गूंजेंगी. उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता में बैठे लोग हमेशा नहीं रहते, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन उनके मुताबिक इस्लाम को दुनिया की कोई ताकत समाप्त नहीं कर सकी है और आगे भी नहीं कर पाएगी.

मौजूदा सरकार पर लगाए आरोप

अरशद मदनी ने अपने बयान में कहा कि पहले भी सरकारों पर मुसलमानों को निशाना बनाने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन वर्तमान दौर में सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि उनकी धार्मिक पहचान, धार्मिक संस्थानों और इस्लाम को भी निशाना बनाए जाने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने सांप्रदायिक ताकतों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें इतिहास से सीख लेनी चाहिए. मदनी ने सोवियत संघ के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि इस्लाम को खत्म करने की सोच रखने वाले लोग इतिहास का हिस्सा बन गए, लेकिन इस्लाम आज भी कायम है.

मदरसों और परिवारों की भूमिका पर क्या कहा?

अपने संदेश में उन्होंने मदरसों की अहमियत पर भी बात की. मदनी ने कहा कि मदारिसे इस्लामिया धार्मिक शिक्षा और पहचान को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नई पीढ़ी की आस्था, नैतिकता और धार्मिक मूल्यों की रक्षा केवल मदरसों की जिम्मेदारी नहीं है. उन्होंने कहा कि माता-पिता को भी अपने बच्चों की धार्मिक और नैतिक परवरिश में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. साथ ही उन्होंने मुसलमानों से मौजूदा हालात से निराश न होने और धैर्य, एकजुटता, समझदारी तथा दृढ़ता के साथ आगे बढ़ने की अपील की.

क्या है जमीयत उलेमा-ए-हिंद?

जमीयत उलेमा-ए-हिंद देश के सबसे पुराने मुस्लिम संगठनों में गिना जाता है. इसकी स्थापना वर्ष 1919 में हुई थी. यह संगठन लंबे समय से धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक मुद्दों पर काम करता आ रहा है. साल 2008 में संगठन दो हिस्सों में बंट गया था. इनमें से एक धड़े की कमान अरशद मदनी के हाथ में है और वह इसी गुट का नेतृत्व करते हैं.

अक्सर विवादों में क्यों रहते हैं मदनी?

अरशद मदनी बीते कई वर्षों से अपने बयानों की वजह से चर्चा का विषय बने रहे हैं. उनके कई बयान राष्ट्रीय स्तर पर बहस का कारण बने हैं.

‘ओम और अल्लाह’ वाले बयान पर हुआ था विवाद

साल 2023 में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान अरशद मदनी ने कहा था कि मनु जिस ईश्वर की उपासना करते थे, वही अल्लाह हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि ओम, ईश्वर, खुदा और अल्लाह अलग-अलग नाम हो सकते हैं, लेकिन उनका संदर्भ एक ही शक्ति से है. उनके इस बयान पर कई धार्मिक नेताओं और जैन संतों ने आपत्ति जताई थी, जिसके बाद कार्यक्रम के दौरान विवाद की स्थिति बन गई थी.

मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को लेकर उठाते रहे सवाल

मदनी समय-समय पर यह भी कहते रहे हैं कि देश में मुसलमानों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है और उनके साथ भेदभाव हो रहा है. उनके ऐसे बयानों पर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के बीच बहस देखने को मिलती रही है.

आरएसएस और हिंदुत्व पर भी देते रहे हैं टिप्पणी

अरशद मदनी कई मौकों पर आरएसएस और हिंदुत्व की राजनीति की आलोचना कर चुके हैं. उन्होंने बीते वर्षों में सांप्रदायिक सद्भाव, अल्पसंख्यकों के अधिकार और समाज में बढ़ती नफरत जैसे विषयों पर सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखी है.

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‘जिहाद’ पर दिए बयान से भी हुआ था विवाद

वर्ष 2026 में मदनी का एक और बयान काफी चर्चा में रहा था. उन्होंने कहा था कि अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए चली आजादी की लड़ाई में ‘जिहाद’ का संदेश भी दिया गया था और इसे उन्होंने दासता के खिलाफ संघर्ष के रूप में पेश किया था. उनके इस बयान पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ धार्मिक संगठनों के बीच भी बहस छिड़ गई थी. इतना ही नहीं, कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी सार्वजनिक रूप से उनके विचारों से असहमति जताई थी.

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-भारत एक्सप्रेस



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