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ममता के गढ़ में कमल की धमक, क्या आंकड़ों ने बढ़ा दी दीदी की टेंशन? जानिए समीकरण

Bengal Election 2026: कोलकाता का बेहाला पूर्व इलाका, जो कभी लेफ्ट का गढ़ था और अब TMC का मजबूत किला है, वहां की सियासी जमीन खिसकने लगी है. आंकड़ों की मानें तो BJP ने पिछले 10 साल में अपना वोट शेयर 1% से बढ़ाकर 38% तक पहुंचा दिया है.

Bengal Election 2026

कोलकाता के दक्षिण में बसा ‘बेहाला पूर्व’ इलाका इन दिनों पश्चिम बंगाल की राजनीति में चर्चा का केंद्र बना हुआ है. कभी लेफ्ट का अभेद्य किला रहा यह क्षेत्र आज तृणमूल कांग्रेस (TMC) का गढ़ है, लेकिन हाल के वर्षों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जिस रफ्तार से यहां अपना आधार बढ़ाया है, उसने सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है.

वामपंथ से ममता के जादू तक का सफर

बेहाला पूर्व का इतिहास बड़ा दिलचस्प रहा है. आजादी के बाद जब 1951 में यह सीट वजूद में आई, तब यहां लाल झंडे का बोलबाला था. 1967 से लेकर 2006 तक हुए 11 चुनावों में से 9 बार माकपा (CPI-M) ने यहां एकतरफा जीत हासिल की. लेकिन 2011 की ‘परिवर्तन की लहर’ ने सब कुछ बदल दिया. सोवन चटर्जी ने यहां ममता बनर्जी का झंडा बुलंद किया और तब से यह इलाका टीएमसी का वफादार बना हुआ है. 2021 में रत्ना चटर्जी ने बीजेपी की उम्मीदवार और अभिनेत्री पायल सरकार को हराकर इस सिलसिले को बरकरार रखा.

BJP की बढ़ती ‘रफ्तार’

भले ही पिछले तीन विधानसभा चुनावों में टीएमसी यहां जीतती रही हो, लेकिन असली कहानी आंकड़ों में छिपी है. 2011 में जिस बीजेपी के पास महज 1.9% वोट थे, वह 2021 तक आते-आते 33% से ज्यादा वोट हासिल करने लगी. लोकसभा चुनावों की बात करें, तो 2024 में टीएमसी और बीजेपी के बीच फासला काफी कम रह गया है. बीजेपी का वोट शेयर 38% के पार पहुंच जाना यह बताता है कि शहरी वोटर अब विकल्प की तलाश में है.

वोटरों की ‘खामोशी’ और चुनावी गणित

बेहाला पूर्व मुख्य रूप से एक शहरी और मध्यमवर्गीय इलाका है. यहां 90% से ज्यादा आबादी शहरी है और साक्षरता दर भी काफी ऊंची है. लेकिन चिंता की बात यह है कि यहां का वोटर अब थोड़ा उदासीन दिख रहा है. 2016 में जहां करीब 74% मतदान हुआ था, वहीं 2024 में यह गिरकर 68.5% पर आ गया.

सियासी जानकारों का मानना है कि इस बार मुकाबला त्रिकोणीय होने की जगह ज्यादा जटिल हो सकता है. एक तरफ बीजेपी टीएमसी के 14 साल के शासन के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency) का फायदा उठाना चाहती है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस और लेफ्ट का अलग-अलग चुनाव लड़ना टीएमसी के लिए चुनौती खड़ी कर सकता है, क्योंकि इससे विपक्ष के वोटों का बंटवारा होगा.

क्या है जमीनी हकीकत?

तारातला से मंटन तक फैले इस इलाके में आज भी रोजमर्रा की परेशानियां चुनावी मुद्दा बनती हैं. डायमंड हार्बर रोड की कनेक्टिविटी और मेट्रो के आने से जीवन तो आसान हुआ है, लेकिन छोटे व्यापारियों और रिटेल सेक्टर में रोजगार की चिंता बनी हुई है.

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-भारत एक्सप्रेस



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