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कभी गांधी की हत्या का ठीकरा, कभी फिल्मों में विलेन: ब्राह्मणों पर क्यों बरसते हैं सियासी तीर, वोट बैंक की जंग या कोई गहरी साजिश?

Brahmin Controversy: ब्राह्मण समाज पर विवादित बयानबाज़ी का इतिहास गांधी हत्या से लेकर आज तक जारी है. कभी फिल्मों में नकारात्मक छवि तो कभी नेताओं के विवादित से ब्रह्माण समाज आहत होता रहता है. आखिर ऐसा क्यों होता है?

Brahmin Controversy: ब्राह्मण समाज पर राजनीतिक बयानबाज़ी कोई नई बात नहीं है. कभी गांधी की हत्या का ठीकरा पूरे समुदाय पर फोड़ा गया, कभी फिल्मों में उन्हें खलनायक दिखाया गया और आज भी कई नेता विवादित टिप्पणियों से सुर्खियां बटोरते हैं. भारत में ब्राह्मणों की संख्या महज 4 से 6 प्रतिशत है, इसके बावजूद उन पर लगातार हमले होते रहे हैं. यह सब वोट बैंक की राजनीति और जातीय ध्रुवीकरण की चाल का हिस्सा माना जाता है. सवाल यही है कि क्या किसी समाज और धर्म को गाली देकर राजनीति करना सही है या यह समाज को बांटने की गहरी साजिश है.

ब्राह्मणों पर सियासी निशाना क्यों?

भारतीय राजनीति में जाति हमेशा से हथियार रही है. ब्राह्मण समाज शिक्षा और संस्कृति से जुड़ा रहा है, लेकिन उन्हें ‘सत्ता और ज्ञान का प्रतीक’ मानकर विरोधियों ने बार-बार निशाना बनाया. दलों को लगता है कि ब्राह्मणों पर हमला करके वे अन्य जातियों का समर्थन हासिल कर सकते हैं. लेकिन क्या ये सही है?

गांधी की हत्या के बाद का माहौल

1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद देशभर में गुस्से का माहौल था. इस घटना का सीधा असर महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण समुदाय पर पड़ा. नाथूराम गोडसे, जिसने गांधीजी की हत्या की थी, इसी समाज से आता था. इसके चलते पूरे समुदाय को दोषी ठहराने का सिलसिला शुरू हो गया.

कई जगहों पर चितपावन ब्राह्मणों पर हिंसक हमले हुए, उनके घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया. यह स्थिति दिखाती है कि किसी एक व्यक्ति के अपराध का ठीकरा पूरे समाज पर फोड़ दिया गया. राजनीतिक और सामाजिक गुस्से का निशाना बनकर ब्राह्मण समुदाय को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. इस घटना ने साफ कर दिया कि बड़े राजनीतिक हादसों का असर अक्सर जातीय आधार पर पूरे समाज पर डाल दिया जाता है, चाहे वे सीधे तौर पर शामिल हों या नहीं.

राजकुमार भाटी का हालिया विवाद

2026 में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने एक कार्यक्रम में कहा कि ‘न ब्राह्मण भला, न वेश्या’. इस बयान का वीडियो वायरल हुआ और यूपी पुलिस ने उनके खिलाफ केस दर्ज किया. बाद में उन्होंने माफी मांगी, लेकिन इस घटना ने सपा की सोच पर सवाल खड़े किए.

आजम खान और स्वामी प्रसाद मौर्य (SP)

सपा नेता आजम खान ने पहले भारत माता को ‘डायन’ कहा था. वहीं, स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरितमानस को जलाकर विरोध जताया. इन बयानों को भी ब्राह्मण विरोधी मानसिकता से जोड़ा गया.

पेरियार और द्रविड़ आंदोलन

दक्षिण भारत में ई.वी. रामासामी पेरियार ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ तीखे बयान दिए. उन्होंने हिंदू धर्म को ब्राह्मणों का ‘सामाजिक नियंत्रण का औजार’ बताया था. उनके आंदोलन ने तमिलनाडु की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया.

उदयनिधि स्टालिन (DMK)

2023 में DMK नेता उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को ‘डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारी’ बताया. इस बयान को ब्राह्मण विरोधी राजनीति से जोड़ा गया. जिसके बाद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे ‘तमिलनाडु में सक्रिय ब्राह्मण विरोधी राजनीति’ कहा.

संदीप सौरव का बयान

माले विधायक संदीप सौरव ने बिहार विधानसभा में कहा था कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत आधार पर भेदभाव लगातार बढ़ रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि जब UGC गाइडलाइन को लागू करने की कोशिश हुई तो ‘ब्राह्मणवादी ताकतों’ के दबाव में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी.

फिल्मों में ब्राह्मणों की छवि

भारतीय सिनेमा में कई बार ब्राह्मण पात्रों को नकारात्मक रूप में दिखाया गया है. उन्हें लालची पुजारी, चालाक पंडित या समाज को दबाने वाले किरदार के तौर पर पेश किया गया. इससे समाज में उनकी छवि पर असर पड़ा और यह धारणा बनी कि फिल्मों ने भी राजनीतिक और सामाजिक पूर्वाग्रह को आगे बढ़ाया. बॉलीवुड और क्षेत्रीय सिनेमा में ब्राह्मण पात्रों को अक्सर खलनायक या चालाक व्यक्ति के रूप में दिखाया गया. यह प्रस्तुति समाज में उनकी छवि को कमजोर करने का काम करती रही.

कुछ फिल्मों का उदाहरण –

घूसखोर पंडित

इस फिल्म के शीर्षक को लेकर ब्राह्मण समाज ने तीखा विरोध किया. उनका कहना था कि घूसखोर पंडित नाम देकर पूरे समुदाय को बदनाम करने की कोशिश की गई है.

फुले (2025)

महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले पर बनी इस बायोपिक के ट्रेलर पर ब्राह्मण संगठनों ने आपत्ति जताई. आरोप था कि इसमें 19वीं सदी के ब्राह्मणों को उत्पीड़क और नकारात्मक रूप में दिखाया गया है. रिलीज से पहले ही फिल्म विवादों में घिर गई.

आर्टिकल 15 (2019)

इस फिल्म में जाति-आधारित अत्याचारों को दिखाया गया. आलोचकों का कहना था कि इसमें उच्च जातियों, खासकर ब्राह्मणों को एकतरफा खलनायक के रूप में पेश किया गया.

सदगति (1981)

सत्यजीत रे द्वारा निर्देशित और मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित इस फिल्म में एक ब्राह्मण पुजारी को दलित पात्र के प्रति अमानवीय और अत्याचारी दिखाया गया. यह फिल्म सामाजिक असमानता पर तीखी टिप्पणी थी लेकिन ब्राह्मण समाज ने इसे अपनी छवि पर हमला माना.

पराशक्ति (1952)

तमिल फिल्म पराशक्ति में ब्राह्मण पुजारी को भ्रष्ट और लालची दिखाया गया. यह फिल्म उस दौर में बनी जब दक्षिण भारत में एंटी-ब्राह्मण आंदोलन जोर पकड़ रहा था. फिल्म ने उस विचारधारा को और मजबूत किया.

नाला दमयंती (2003)

इस फिल्म में भी ब्राह्मण पात्रों को हास्यास्पद और नकारात्मक रूप में दिखाया गया. दर्शकों के बीच यह धारणा बनी कि ब्राह्मण समाज को मजाक और आलोचना का पात्र बनाया जा रहा है.

भक्त नंदनार (1935)

इस फिल्म में भी ब्राह्मणों को कठोर और असंवेदनशील दिखाया गया. यह प्रस्तुति उस समय के सामाजिक माहौल को दर्शाती है, जहां ब्राह्मण विरोधी भावनाएं उभर रही थीं.

आहा (1996)

हालांकि यह फिल्म अपेक्षाकृत आधुनिक दौर की है, इसमें भी ब्राह्मण पात्रों को नकारात्मक रूप में दिखाया गया.

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ब्राह्मण समाज पर विवादित बयानबाजी का इतिहास लंबा है. कभी गांधी हत्या के बाद, कभी फिल्मों में और आज भी नेताओं की जुबान से. यह सब वोट बैंक की राजनीति और जातीय ध्रुवीकरण का हिस्सा है. सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ चुनावी रणनीति है या समाज को बांटने की गहरी साजिश?

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-भारत एक्सप्रेस



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