2029 का लोकसभा चुनाव अभी काफी दूर है, लेकिन देश की सियासत में उसकी आहट अभी से सुनाई देने लगी है. भारतीय जनता पार्टी जहां संगठन को मजबूत करने, नई टीम तैयार करने और चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने की दिशा में आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस के सामने अपने ही संगठन से जुड़े कई सवाल खड़े हैं. पार्टी मोदी सरकार को चुनौती देने की तैयारी तो कर रही है, लेकिन उससे पहले उसे अपने घर की कई उलझनों को सुलझाना होगा.
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल सिर्फ चुनावी मुद्दों का नहीं, बल्कि संगठन की तैयारियों का है. पार्टी के कई बड़े राज्यों में प्रभारी पद खाली हैं. कुछ राज्यों में नेतृत्व को लेकर खींचतान चल रही है और कई अहम फैसले अब भी लंबित दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर राज्यों में संगठन पूरी तरह सक्रिय नहीं होगा, तो 2029 की बड़ी चुनावी लड़ाई के लिए कांग्रेस जमीन कैसे तैयार करेगी?
प्रियंका गांधी की भूमिका पर भी सवाल
कांग्रेस में एक महत्वपूर्ण मुद्दा प्रियंका गांधी की संगठनात्मक भूमिका को लेकर है. प्रियंका गांधी पार्टी की महासचिव हैं और वायनाड से सांसद भी हैं. इसके बावजूद फिलहाल उन्हें किसी राज्य का प्रभारी नहीं बनाया गया है.
कांग्रेस के दूसरे महासचिवों को अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारियां दी गई हैं, लेकिन प्रियंका की भूमिका को लेकर अब तक कोई वैसी स्पष्टता सामने नहीं आई है. पार्टी के भीतर यह सवाल स्वाभाविक तौर पर उठ रहा है कि संगठन में उनकी ताकत और अनुभव का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा.
दूसरी तरफ राहुल गांधी लगातार युवाओं और खासकर Gen Z तक अपनी पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं. कांग्रेस नई पीढ़ी के मतदाताओं से संवाद बनाने और अपने राजनीतिक संदेश को नए तरीके से पेश करने की कोशिश कर रही है. लेकिन सिर्फ अभियान और नैरेटिव से चुनावी मुकाबला मजबूत नहीं होता. उसके लिए संगठन का मजबूत होना भी उतना ही जरूरी है.
राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र में कांग्रेस के सामने फिलहाल संगठनात्मक नियुक्ति का सवाल बना हुआ है. पार्टी के प्रभारी रहे रमेश चेन्निथला अब केरल सरकार में मंत्री हैं. उनके बाद महाराष्ट्र के लिए अब तक पूर्णकालिक प्रभारी की नियुक्ति नहीं हुई है.
असम में भी विधानसभा चुनाव में हार के बाद संगठन को लेकर सवाल उठे थे. प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह के इस्तीफे की स्थिति पर भी पूरी तरह स्पष्टता नहीं है. उनकी जगह नया प्रभारी नियुक्त किए जाने का इंतजार बना हुआ है.
ये दोनों राज्य कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से अहम हैं. ऐसे में संगठन की कमान को लेकर लंबे समय तक बनी अनिश्चितता पार्टी की चुनावी तैयारियों पर असर डाल सकती है.
पंजाब में गुटबाजी बनी चुनौती
पंजाब कांग्रेस की मुश्किलें भी अभी खत्म होती नहीं दिख रही हैं. प्रदेश संगठन से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए पार्टी ने एक समिति बनाई, लेकिन इसके बाद ही कांग्रेस के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे.
पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा समेत कुछ नेताओं की ओर से प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को हटाने की मांग की जा रही है. हालांकि, इस मामले में कांग्रेस आलाकमान की ओर से अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है.
पंजाब जैसे राज्य में, जहां कांग्रेस का मजबूत राजनीतिक आधार रहा है, लगातार चल रही अंदरूनी खींचतान पार्टी के लिए चिंता का विषय है. नेताओं के बीच मतभेद अगर लंबे समय तक बने रहते हैं, तो उसका सीधा असर कार्यकर्ताओं और जमीनी संगठन पर पड़ सकता है.
कांग्रेस की कोशिश है कि मोदी सरकार के खिलाफ एक मजबूत राजनीतिक विकल्प तैयार किया जाए. राहुल गांधी युवाओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने पर काम कर रहे हैं और पार्टी अपने मुद्दों को ज्यादा प्रभावी तरीके से जनता तक पहुंचाने की कोशिश में है.
लेकिन चुनावी राजनीति का अनुभव बताता है कि सिर्फ बड़े चेहरे, सोशल मीडिया अभियान या मजबूत नैरेटिव काफी नहीं होते. चुनाव जीतने के लिए बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ता, राज्यों में स्पष्ट नेतृत्व, मजबूत स्थानीय संगठन और समय पर लिए गए राजनीतिक फैसले भी बेहद अहम होते हैं.
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