14 नवम्बर, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन, राजनीति में प्रतीक के तौर पर हमेशा कांग्रेस के आत्ममंथन और परंपराओं की याद दिलाने वाला दिन. पर इस बार माहौल कुछ और ही था. शांति वन में सुबह-सुबह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने औपचारिक श्रद्धांजलि दी, कुछ मिनटों में कार्यक्रम समाप्त, और फिर चुप्पी. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तो पहले ही विदेश रवाना हो चुके थे, और बाकी बड़े नेता भी दूरी बनाए रहे.
24 अकबर रोड का सूनापन
चुनाव नतीजों के दिन आमतौर पर कांग्रेस मुख्यालय का माहौल जोश बयानबाजी से भरा होता है. पर 24 अकबर रोड इस बार कुछ और ही कहानी कह रहा था. मीडिया कैमरे वहां तैनात थे, लेकिन पार्टी की तरफ से वही प्रवक्ता आए जिनकी सुबह चैनलों में ड्यूटी लगी थी-आलोक शर्मा, डॉ अजय उपाध्याय, शुभ्रांश राय आदि.
कार्यकर्ताओं की संख्या भी बेहद कम रही. राहुल-प्रियंका सेना के नेता जगदीश शर्मा अपने समर्थकों के साथ पहुंचे तो सही, पर सुबह की उम्मीद जैसे-जैसे रुझान बदलते गए, ढोलकें बिना बजे वापस गईं और मिठाइयों की जगह आरोपों वाली तख्तियां निकल आईं-“वोट चोरी”, “चुनाव आयोग पक्षपाती” आदि.
सुबह मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा पहुंचे और एनडीए की बढ़त को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की “बढ़त” बताते हुए राजनीतिक नैरेटिव सेट करने की कोशिश की.
लेकिन जैसे ही 12 बजे होते-होते कांग्रेस की बढ़त 20 से घटकर 10 से भी नीचे पहुंची, खेड़ा वापस नहीं आए. और न ही कोई अन्य वरिष्ठ नेता. धीरे-धीरे कार्यकर्ता भी छंटने लगे. दोपहर की धूप में खाली पड़े मैदान में बिछे गमछों पर मायूस कार्यकर्ता झपकी लेते दिखाई दिए, जैसे पार्टी का मनोबल धूप में पिघल गया हो.यह पहला मौका नहीं जब कांग्रेस को बिहार में निराशा मिली. 2010 में तो पार्टी केवल 4 सीटों पर सिमट गई थी. उस समय सोनिया गांधी खुद मुख्यालय आई थी.
सबसे बड़ा सवाल…
2014 लोकसभा चुनाव की ऐतिहासिक हार के बाद भी सोनिया और राहुल शाम को मीडिया से मुखातिब हुए थे संदेश जवाबदेही का था. मगर इस बार न कोई नेतृत्व दिखा, न जवाबदेही की परंपरा. न कोई बयान, न कोई स्पष्ट रणनीति. सिर्फ आरोप-वोट चोरी, चुनाव आयोग, एनडीए की मिलीभगत.
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या लगातार हारों के बाद ‘सिस्टम की मिलीभगत’ वाला नैरेटिव जनता में असर खो रहा है? क्योंकि चुनाव प्रचार में ऊर्जा और नतीजों के दिन की सुस्ती में जो गहरा अंतर दिखा, उसने जनता का वह विश्वास नहीं जगाया जिसकी एक विपक्षी दल से उम्मीद होती है.
पार्टी चुनावी रणनीति में पिछे
कांग्रेस के नेताओं की गैर-मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि पार्टी चुनावी रणनीति में पिछड़ रही है. सबसे बड़ा संदेश-जब सबसे ज्यादा जरूरत थी तब नेतृत्व नदारद रहा. रुझानों से स्पष्ट था कि बिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन 2010 जैसी बदतर स्थिति में नहीं था-इस बार छह सीटें मिलीं. लेकिन कई बार संख्या नहीं, पार्टी का बर्ताव बड़ा संकेत देता है.
14 नवंबर को कांग्रेस जिस तरह सन्नाटे में डूबी रही-वह बताता है कि झटका न सिर्फ बड़ा था, बल्कि अप्रत्याशित भी. सवाल यह है कि क्या पार्टी इस झटके को समझ पाएगी, या यह भी बीते चुनावों की तरह शोर-शराबे में दब जाएगा?
-भारत एक्सप्रेस
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