जानिए अफसर से नेता बने कौन हुए पास-फेल (AI जनरेटेड फोटो)
उत्तर प्रदेश कैडर की IAS अफसर रही दिव्या मित्तल ने अब नया रास्ता चुन लिया है. मंगलवार सुबह उन्होंने एक वीडियो जारी करके कहा कि वो राजनीति में आ रही हैं. दिव्या ने किसी पार्टी का नाम नहीं लिया, बस लोगों से सपोर्ट मांगा है. उन्होंने अपनी नौकरी के कुछ किस्से सुनाते हुए कहा कि वो सिस्टम से सवाल पूछना चाहती हैं ताकि आम आदमी की जिंदगी आसान हो सके. दिव्या की कहानी वैसे भी काफी अलग है. IIT दिल्ली से बीटेक किया, फिर IIM से पढ़ाई की, विदेश में बढ़िया कॉर्पोरेट नौकरी कर रही थीं, वो छोड़कर भारत लौट आईं. पहले IPS बनीं, फिर IAS बनीं और अब सब छोड़कर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं.
आम लोगों में जगी नई उम्मीद
दिव्या चुनाव लड़ेंगी या नहीं, लड़ेंगी तो कहां से लड़ेंगी, ये सब अभी तय होना बाकी है. लेकिन उनके इस फैसले ने लोगों के मन में एक उम्मीद तो जगा दी है. अक्सर कहा जाता है कि अच्छे लोग राजनीति से दूर रहते हैं. राजनीति में पैसे और बाहुबल का बोलबाला है. ऐसे में जब कोई पढ़ी-लिखी और ईमानदार छवि वाली अफसर राजनीति में आती है तो लोगों को लगता है कि शायद कुछ बदलेगा. इसी बहाने हम आपको बताते हैं कि अब तक कौन-कौन से अफसर राजनीति में आए, कौन मुख्यमंत्री-मंत्री बना और कौन इस रेस में पिछड़ गया. अजीत जोगी से लेकर यशवंत सिन्हा तक पूरी कहानी समझिए.
अजीत जोगी, कलेक्टर से बने छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री
अजीत जोगी 1968 बैच के IAS थे. मध्य प्रदेश में उन्होंने कई जिलों में कलेक्टर के तौर पर काम किया. अस्सी के दशक में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और कांग्रेस का हाथ थाम लिया. कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा. जब साल 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना तो कांग्रेस ने जोगी को पहला मुख्यमंत्री बना दिया. वो 2003 तक इस पद पर रहे. यानी वो उन गिने-चुने अफसरों में हैं जो सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे. बाद में कांग्रेस से उनकी अनबन हो गई. 2016 में उन्होंने अपनी अलग पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ बना ली. लेकिन उनकी नई पार्टी कांग्रेस और बीजेपी को बड़ी टक्कर नहीं दे पाई. जोगी की कहानी बताती है कि शुरुआत में बड़ी सफलता मिलती है, पर बाद में जनाधार बनाए रखना आसान नहीं होता.
यशवंत सिन्हा, IAS की नौकरी छोड़ बने वित्त और विदेश मंत्री
यशवंत सिन्हा 1960 में IAS बने थे. करीब 24 साल तक सरकारी नौकरी की और 1984 में इस्तीफा देकर राजनीति में आ गए. पहले जनता पार्टी, फिर जनता दल में रहे, बाद में बीजेपी में शामिल हो गए. केंद्र में उन्होंने बड़े-बड़े पद संभाले. चंद्रशेखर सरकार और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री रहे. बाद में विदेश मंत्री भी बने. बीजेपी से मतभेद के बाद 2018 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी. फिर तृणमूल कांग्रेस में चले गए और 2022 में विपक्ष की तरफ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भी बने. सिन्हा का करियर दिखाता है कि ब्यूरोक्रेसी का तजुर्बा राजनीति में बड़े पद दिला सकता है, लेकिन पार्टी बदलना और अंदरूनी खींचतान भी इसी खेल का हिस्सा है.
आर के सिंह, गृह सचिव से केंद्रीय मंत्री तक का सफर
राज कुमार सिंह 1975 बैच के IAS अफसर थे और देश के गृह सचिव जैसे बड़े पद पर रहे. रिटायर होने के बाद 2013 में उन्होंने बीजेपी जॉइन की. बिहार के आरा से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीतकर सांसद बने. मोदी सरकार में उन्हें ऊर्जा और नई-नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय दिया गया. उन्होंने मंत्री के तौर पर ठीक-ठाक काम किया. लेकिन हर अफसर को लगातार जीत मिले ये जरूरी नहीं. आर के सिंह आजकल राजनीति में थोड़े साइडलाइन पर हैं और कई बार अपनी ही पार्टी के खिलाफ बयान देते दिखते हैं. इस वक्त वो किसी भी सदन के मेंबर नहीं हैं.
अल्फोंस कन्ननथानम, अफसर से विधायक और फिर केंद्रीय मंत्री
अल्फोंस कन्ननथानम 1979 बैच के IAS थे. नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने केरल में राजनीति शुरू की. पहले विधायक बने और बाद में बीजेपी में आ गए. 2017 में उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया गया. उनका रास्ता धीरे-धीरे आगे बढ़ा. पहले लोकल लेवल पर काम किया, फिर राज्य और फिर दिल्ली तक पहुंचे. इससे पता चलता है कि अफसर से नेता बनने में टाइम लगता है और कई पड़ाव पार करने पड़ते हैं.
शाह फैसल, जल्दी राजनीति में आए और जल्दी बाहर भी हो गए
शाह फैसल 2010 बैच के IAS थे. 2019 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और जम्मू-कश्मीर में अपनी पार्टी बना ली. मीडिया में उनकी काफी चर्चा हुई, लेकिन उनका राजनीतिक सफर लंबा नहीं चला. कुछ समय बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी और एक्टिव पॉलिटिक्स से हट गए. उनका केस बताता है कि सिर्फ पॉपुलर होने से चुनावी राजनीति नहीं चलती, जमीन पर टिकना पड़ता है.
तमिलनाडु की अफसर वीएस चंद्रलेखा का हाल
तमिलनाडु कैडर की IAS वीएस चंद्रलेखा ने भी नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ा था. लेकिन उन्हें अजीत जोगी या यशवंत सिन्हा जैसी बड़ी सफलता नहीं मिली. वो चुनाव हार गईं और राजनीति में ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाईं. इससे साफ है कि हर अफसर की किस्मत एक जैसी नहीं होती.
IRS से निकले और दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल IAS नहीं बल्कि IRS अफसर थे. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में काम किया. बाद में RTI और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनों से जुड़े. 2012 में आम आदमी पार्टी बनाई और 2013 में दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए. 2015 में उनकी पार्टी ने दिल्ली में बड़ी जीत हासिल की. आज आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय पार्टी बन चुकी है. केजरीवाल की कहानी बताती है कि सिविल सेवा की दूसरी ब्रांच से आकर भी अपनी पार्टी बनाकर बड़ा मुकाम हासिल किया जा सकता है.
विदेश सेवा से लोकसभा स्पीकर तक पहुंची मीरा कुमार
मीरा कुमार IFS अफसर थीं. 1973 में विदेश सेवा जॉइन की और बाद में राजनीति में आ गईं. 1985 में लोकसभा सांसद बनीं, फिर केंद्र में मंत्री रहीं और 2009 में लोकसभा की पहली महिला स्पीकर बनीं. ये पद संसद में बहुत बड़ा माना जाता है. उनकी कहानी बताती है कि राजनीति में कामयाबी सिर्फ मुख्यमंत्री बनना नहीं है, संसद के बड़े पद भी बड़ी उपलब्धि होते हैं.
विदेश सेवा के और अफसर जो मंत्री बने
इस लिस्ट में और भी नाम हैं. मणिशंकर अय्यर ने विदेश सेवा छोड़कर कांग्रेस जॉइन की और सांसद व केंद्रीय मंत्री बने. नटवर सिंह भी IFS से राजनीति में आए और विदेश मंत्री बने. हरदीप सिंह पुरी ने भी लंबी विदेश सेवा के बाद बीजेपी जॉइन की और केंद्र में मंत्री हैं. मौजूदा विदेश मंत्री एस जयशंकर भी IFS अफसर रहे हैं और अब बीजेपी के बड़े नेता के तौर पर काम कर रहे हैं.
अफसरों का तजुर्बा काम आता है पर जीत की गारंटी नहीं
अफसरों के पास सरकार चलाने का, नीतियां बनाने का अच्छा अनुभव होता है. वो फाइलों, योजनाओं और सिस्टम को अंदर से जानते हैं. ये चीजें राजनीति में काम आती हैं. लेकिन सिर्फ इसी से चुनाव नहीं जीते जाते. चुनाव जीतने के लिए पार्टी का संगठन, लोगों से जुड़ाव, लोकल मुद्दों की समझ और अपनी इमेज भी बहुत जरूरी है. इसलिए IAS या किसी और सेवा से आकर राजनीति में आना न तो सफलता की गारंटी है और न ही फेल होने का ठप्पा. कुछ लोग टॉप तक पहुंचे, कुछ बीच में ही अटक गए. आखिर में फैसला तो वोटर ही करता है कि अफसर का अनुभव वोट में बदलेगा या नहीं.
IPS से मंत्री बने असीम अरुण
असीम अरुण 1994 बैच के IPS थे. यूपी में कई बड़े पदों पर रहे, कानपुर के पहले पुलिस कमिश्नर भी बने. 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने VRS लिया और बीजेपी में आ गए. बीजेपी ने उन्हें कन्नौज सदर से टिकट दिया, वो जीत गए और योगी सरकार में समाज कल्याण राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार बन गए. उनकी कहानी इसलिए अलग है क्योंकि नौकरी छोड़ते ही सीधे चुनाव जीता और मंत्री बन गए.
IPS से बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बने अन्नामलाई
के अन्नामलाई कर्नाटक कैडर के IPS थे. 2019 में पुलिस की नौकरी छोड़ी और 2020 में बीजेपी जॉइन की. जुलाई 2021 में उन्हें तमिलनाडु बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया. उन्होंने राज्य में पार्टी को मजबूत करने की कोशिश की. लेकिन चुनावी मैदान में उन्हें जीत नहीं मिली. 2021 में विधानसभा चुनाव हारे, 2024 में कोयंबटूर से लोकसभा चुनाव भी हार गए. 2025 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और जून में उन्होंने बीजेपी से इस्तीफा दे दिया. उनका सफर आधा सफल, आधा असफल कहा जाएगा. पद तो बड़ा मिला, पर चुनावी जीत नहीं मिली.
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आखिर कितने अफसर हुए सफल और कितने फेल?
अब सवाल है कि कितने अफसर सफल हुए और कितने फेल? इसका कोई एक आंकड़ा देना मुश्किल है क्योंकि हर किसी के लिए सफलता का मतलब अलग है. लेकिन आम भाषा में देखें तो वही अफसर ज्यादा कामयाब हुए जिन्होंने बड़ी पार्टी का साथ पकड़ा. जो अकेले चले, अपनी पार्टी बनाई या निर्दलीय लड़े, उन्हें आमतौर पर वो कामयाबी नहीं मिली जिसे जनता कामयाबी कहती है. मुख्यमंत्री बनना बड़ी बात है. सांसद, विधायक, केंद्रीय मंत्री या लोकसभा स्पीकर बनना भी बड़ा पद है. चुनाव हारना या पार्टी छोड़ना ये नहीं बताता कि पूरा करियर फेल हो गया. अजीत जोगी मुख्यमंत्री बने, यशवंत सिन्हा वित्त और विदेश मंत्री बने, केजरीवाल मुख्यमंत्री बने, मीरा कुमार स्पीकर बनीं, आर के सिंह और अल्फोंस मंत्री बने. वहीं शाह फैसल और चंद्रलेखा का सफर छोटा रहा. तो कुल मिलाकर अफसर से नेता बनने की राह आसान नहीं, यहां अनुभव के साथ-साथ किस्मत और जनता का साथ भी चाहिए.
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