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दवाओं की खरीद में कीमतों का खेल? दूसरे राज्यों से तुलना में झारखंड की दरों पर उठे गंभीर सवाल

Jharkhand News: झारखंड में सरकारी अस्पतालों के लिए दवाओं की खरीद की प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में है. हाल में सामने आए कुछ मामलों में दावा किया गया है कि समान दवाओं की खरीद के लिए झारखंड में दूसरे राज्यों अथवा राज्य के दूसरे जिलों की तुलना में कई गुना अधिक कीमत चुकाई जा रही है.

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दवाओं की खरीद को लेकर झारखंड सरकार पर उठे सवाल

Jharkhand News: झारखंड में सरकारी अस्पतालों के लिए दवाओं की खरीद की प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में है. हाल में सामने आए कुछ मामलों में दावा किया गया है कि समान दवाओं की खरीद के लिए झारखंड में दूसरे राज्यों अथवा राज्य के दूसरे जिलों की तुलना में कई गुना अधिक कीमत चुकाई जा रही है. मामला सामने आने के बाद खरीद प्रक्रिया, टेंडर की शर्तों और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ की जांच की मांग उठी है.

रामगढ़ में दवाइयों और चिकित्सा सामग्री की खरीद के लिए जारी टेंडर की दरों को लेकर हाल ही में शिकायत दर्ज कराई गई. शिकायत में रांची के वर्ष 2026 के टेंडर और रामगढ़ की मौजूदा दरों की तुलना का हवाला दिया गया है. शिकायतकर्ता के मुताबिक 333 दवाओं की तुलनात्मक सूची में 253 दवाओं की दरें दो गुने से अधिक, 166 की तीन गुने से अधिक और 81 दवाओं की दरें पांच गुने से अधिक होने का दावा किया गया. 18 दवाओं में दस गुने से अधिक का अंतर बताए जाने से मामला और गंभीर हो गया है. सिल्वर सल्फाडियाजीन क्रीम का उदाहरण देते हुए शिकायत में रामगढ़ की दर करीब 725.95 रुपये और रांची की तुलनात्मक दर करीब 18 रुपये बताई गई है.

बिहार और झारखंड की दवा दरों पर भी सवाल

इसी बीच बीजेपी की ओर से सरकारी अस्पतालों में दवा खरीद को लेकर अलग आरोप सामने आया है. पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता अजय साह ने दावा किया कि Amoxicillin 500 mg की खरीद बिहार में करीब 1.15 रुपये की दर से होने की बात सामने आई है, जबकि झारखंड में इसी दवा के लिए करीब 3.50 रुपये खर्च किए जा रहे हैं. ORS की खरीद दर को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. बीजेपी का कहना है कि राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही चरमराई हुई है. एंबुलेंस की सेवा को लेकर हर रोज सवाल उठते हैं और कांग्रेस पार्टी के नेता और राज्य सरकार में स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी राज्य भर में घूम घूम कर वोट चोरी पर भाषण देते हैं.बीजेपी मांग करती है कि दवाओं की खरीद में बरती जा रही अनियमितता की जांच होनी चाहिए.

हालांकि बीजेपी के इन दावों पर सरकार की ओर से सच को सामने लाया जाना अभी बाकी है लेकिन जिन्हें जनता के इन सवालों की चिंता होनी चाहिए, वो कांग्रेस पार्टी बीजेपी पर ही आरोपों की बौछार कर रही है. पार्टी के मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा का कहना है कि बीजेपी आज दवाओं की खरीद में आरोप लगा रही है जबकि झारखंड के सबसे बड़े दवा घोटालेबाज मंत्री भानु प्रताप शाही को अपनी गोद में बिठाए हुए है.

गौर करने वाली बात यह है कि झारखंड की सरकारी खरीद एजेंसी JMHIDPCL की वेबसाइट पर उपलब्ध रेट-कॉन्ट्रैक्ट में Amoxicillin 500 mg कैप्सूल की एक L-1 दर 1.67 रुपये प्रति कैप्सूल दर्ज है.

CAG पहले भी उठा चुका है दवाओं की खरीद पर सवाल

दवाओं की खरीद व्यवस्था को लेकर झारखंड में सवाल नए नहीं हैं. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की झारखंड की स्वास्थ्य सेवाओं पर रिपोर्ट में दवा खरीद और प्रबंधन की व्यवस्था में कई कमियां पहले ही दर्ज कर चुका है. CAG ने पाया था कि दवाओं की खरीद में प्रक्रिया संबंधी समस्याएं थीं. कुछ मामलों में आवश्यक दवाओं की खरीद नहीं हुई जबकि दवाओं की गुणवत्ता जांच, स्टोरेज और आपूर्ति व्यवस्था को लेकर भी गंभीर कमियां सामने आई थीं. पूर्व की CAG रिपोर्ट में तो और भी स्पष्ट रूप से सामने आया था कि कुछ जिलों में स्वीकृत रेट-कॉन्ट्रैक्ट से अधिक दर पर दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद की गई. ऑडिट के मुताबिक इससे सरकार को करीब 42.86 लाख रुपये का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ा था.

सवाल सिर्फ कीमत का नहीं, खरीद की पूरी प्रक्रिया का है

सरकारी अस्पतालों के लिए दवाओं की खरीद का उद्देश्य प्रतिस्पर्धी दर पर अच्छी गुणवत्ता की दवाएं उपलब्ध कराना है. JMHIDPCL को राज्य में दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की केंद्रीकृत खरीद की जिम्मेदारी दी गई है और उसके घोषित उद्देश्यों में प्रतिस्पर्धी कीमत पर गुणवत्तापूर्ण दवाओं की खरीद भी शामिल है. ऐसे में यदि समान दवा, समान शक्ति, समान पैकिंग और समान गुणवत्ता मानकों के बावजूद अलग-अलग सरकारी खरीद की कीमतों में कई गुना अंतर है, तो इसकी वजह सामने आनी चाहिए.

जांच से सामने आ सकता है असली सच

पूरे मामले में यह देखना जरूरी होगा कि संबंधित दवाओं की खरीद किस टेंडर के तहत हुई, कितने आपूर्तिकर्ताओं ने बोली लगाई, L-1 दर कैसे निर्धारित हुई, क्या बाजार अथवा दूसरे राज्यों की दरों से तुलना की गई और क्या खरीद के बाद वास्तविक आपूर्ति एवं भुगतान भी उसी दर पर हुआ. साथ ही यह भी जांच का विषय है कि क्या अलग-अलग जिलों में समान दवाओं की खरीद के लिए एक समान दर लागू की जा सकती थी और यदि नहीं, तो कीमत में अंतर का तकनीकी एवं वित्तीय आधार क्या था. फिलवक्त इतना तो तय है कि दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर के दावे सामने आए हैं.

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CAG पहले भी खरीद व्यवस्था में वित्तीय और प्रक्रिया संबंधी कमियां दर्ज कर चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सरकार संबंधित टेंडर, L-1 दर, खरीद आदेश और भुगतान का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करेगी क्योंकि संबंधित विभाग के मंत्री तो इन तमाम दावों को पहले से भी दरकिनार करते रहे हैं और अभी भी इसे सिर्फ बीजेपी की राजनीतिक साजिश करार दे रहे हैं.

-भारत एक्सप्रेस



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