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‘संसद न सरकार की है न विपक्ष की, ये जनता की है’, विपक्ष को रिजिजू का करारा जवाब

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने अपने लेख में लिखा कि संसद बहस और तर्क के लिए है न कि राजनीतिक ब्लैकमेल के लिए.

Kiren Rijiju attacks the opposition through an article.

संसद में बहस की जगह हंगामा- किरेन रिजिजू

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू अपने एक लेख की शुरुआत में ही विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतंत्र की चिंता जताने वाले कुछ नेता संसद में बहस रोकते हैं, प्रश्नकाल नहीं होने देते, मंत्रियों की बात बीच में काटते हैं और प्रस्तावों को ठुकरा देते हैं. इसके बाद वही लोग लेख लिखकर कहते हैं कि संसद में चर्चा नहीं हो रही. उन्होंने इसे बहस वाले कमरे में आग लगाने और फिर धुएं पर शोकगीत लिखने जैसा बताया. रिजिजू का कहना है कि संसद बहस और तर्क के लिए है, न कि राजनीतिक दबाव बनाने के लिए.

मानसून सत्र का हाल

रिजिजू ने लिखा कि आलोचक बार-बार मानसून सत्र के आंकड़े दिखाते हैं. लोकसभा अपने तय समय का सिर्फ 15 प्रतिशत और राज्यसभा 33 प्रतिशत ही चल पाई. लेकिन यह आंकड़े बिना कारण बताए अधूरे हैं. सत्र के दौरान बार-बार हंगामे हुए, कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी और कई बार बैठक कुछ ही मिनटों में खत्म करनी पड़ी. विपक्ष की रणनीति साफ थी
पहले संसद को ठप करो और फिर उसी ठप समय को सरकार के खिलाफ सबूत बताओ.

विपक्ष का अधिकार और सीमा

लेख में कहा गया है कि संविधान विपक्ष को सवाल पूछने, विरोध दर्ज करने और संशोधन लाने का पूरा हक देता है. लेकिन यह अधिकार संसद को बंद करने का रिमोट कंट्रोल नहीं है. सरकार जनादेश को विपक्ष के सामने समर्पित नहीं कर सकती. लोकतंत्र विपक्ष को बोलने का मौका देता है लेकिन वीटो का अधिकार नहीं. सरकार को जनादेश सिर्फ सत्ता संभालने के लिए नहीं बल्कि शासन चलाने के लिए मिला है.

जंतर-मंतर से संसद तक

रिजिजू ने जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध-प्रदर्शन का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में लंबी चर्चा का प्रस्ताव दिया. उन्होंने कहा कि दोपहर तीन बजे से अगले दिन तीन बजे तक बहस हो सकती है और वे हर सवाल का जवाब देंगे. विपक्षी नेता राहुल गांधी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि उन्हें शाह के भाषण में दिलचस्पी नहीं. रिजिजू ने लिखा कि जब विपक्ष खुद चर्चा से इनकार करता है, तो यह शिकायत नहीं कर सकता कि संसद की आवाज दबा दी गई.

राहुल गांधी का रिकॉर्ड

लेख में उन्होंने राहुल गांधी के संसदीय रिकॉर्ड पर भी सवाल उठाए गए. 17वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति सिर्फ 51 प्रतिशत रही. उन्होंने राष्ट्रीय औसत 46.7 बहसों के मुकाबले केवल आठ बहसों में हिस्सा लिया. औसतन 210 सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन उन्होंने सिर्फ 99 सवाल पूछे. कोई निजी विधेयक भी पेश नहीं किया. इसके बावजूद वे कहते हैं कि लोकतंत्र खत्म हो गया है. रिजिजू ने लिखा कि विदेश जाकर वे भारत की आलोचना करते हैं, लेकिन संसद में जवाबदेही तय करने से बचते हैं.

विधेयकों पर चर्चा

‘विदेशी अंशदान संशोधन विधेयक’ पर जब चिंताएं उठीं तो सरकार ने इसे सीधे पारित नहीं किया बल्कि संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा. विपक्ष ने पहले ज्यादा जांच की मांग की फिर जेपीसी को भेजने का भी विरोध किया और कहा कि विधेयक वापस लिया जाए. रिजिजू ने लिखा कि इससे साफ होता है कि असली समस्या बहस नहीं बल्कि विपक्ष की मांगों को पहले से ही स्वीकार कराना है.

परीक्षा कानून पर बहस

‘सार्वजनिक परीक्षा संशोधन विधेयक’ पर लोकसभा में 11 घंटे और राज्यसभा में साढ़े छह घंटे चर्चा हुई. दर्जनों सांसदों ने हिस्सा लिया. कानून में सजा को सख्त किया गया, फास्ट-ट्रैक कोर्ट और विशेष वकील का प्रावधान किया गया, जांच और मुकदमों की समयसीमा तय की गई और धोखाधड़ी रोकने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाई गई. रिजिजू ने लिखा कि यह कानून बहस और जवाबदेही के बाद ही पारित हुआ.

लोकतांत्रिक प्रक्रिया का क्रम

लेख में बताया गया कि विरोध प्रदर्शन हुआ, नागरिक समाज की चिंताओं को सुना गया, मंत्रियों ने बातचीत की, लिखित आश्वासन दिए, प्रधानमंत्री ने जवाब दिया, संसद में बहस हुई और कानून मजबूत किया गया. यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आदर्श उदाहरण है. सरकार ने बातचीत से इनकार नहीं किया.

‘संसद जनता की है’

रिजिजू ने कहा कि संसद न तो सरकार की निजी संपत्ति है और न ही विपक्ष की. यह भारत के लोगों की है. जनादेश कोई सजावटी प्रमाणपत्र नहीं है जिसे विपक्ष के हंगामे से रद्द किया जा सके. सदन के बाहर लगाए गए नारे, सदन के भीतर की बहस की जगह नहीं ले सकते. नुक्कड़ नाटक संसदीय जिम्मेदारी का विकल्प नहीं हो सकते.

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लेख के अंत में केंद्रीय मंत्री ने लिखा कि जो लोग बहस या वोट से सरकार को चुनौती नहीं दे सकते, उन्हें शोर-शराबे से संसद को हराने की इजाजत नहीं दी जा सकती. लोकतंत्र का असली आधार बहस और जवाबदेही है, न कि हंगामा और अवरोध. संसद का कामकाज जनता के लिए है और इसे चलाना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.

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-भारत एक्सप्रेस



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