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भतीजे के निधन के बाद ‘पावर गेम’ शुरू; शरद पवार के साथ गुप्त बैठक, क्या राज्यसभा जाएंगे अजित पवार के बेटे?

बारामती में शरद पवार और उनके पोतों की मुलाकात ने महाराष्ट्र की सियासत में नई सरगर्मी पैदा कर दी है.

महाराष्ट्र की राजनीति में इस वक्त हलचल है. अजित पवार के निधन के बाद अब पर्दे के पीछे बिसात बिछाई जाने लगी है. हाल ही में बारामती के विद्या प्रतिष्ठान में एक ऐसी मुलाकात हुई, जिसने सियासी गलियारों में कयासों का बाजार गर्म कर दिया है. एनसीपी के दिग्गज नेता शरद पवार ने अपने पोतों, पार्थ और जय पवार के साथ लंबी बैठक की. यह मुलाकात दिवंगत अजित पवार के स्मारक को लेकर थी, लेकिन जानकार बता रहे हैं कि असली कहानी ‘राज्यसभा की सीट’ और ‘पवार विरासत’ के इर्द-गिर्द बुनी जा रही है.

पार्थ पवार इस बार कोई छोटा दांव खेलने के मूड में नहीं हैं. सूत्रों की मानें तो पार्थ की दिलचस्पी अपनी मां सुनेत्रा पवार वाली राज्यसभा सीट में बिल्कुल नहीं है. सुनेत्रा पवार का कार्यकाल 2028 में खत्म हो रहा है, यानी पार्थ को वहां से सिर्फ दो साल का वक्त मिलेगा. पार्थ की नजर खाली हो रही 7 राज्यसभा सीटों पर है.

पार्थ उसी सीट पर अपनी दावेदारी देख रहे हैं जो फिलहाल खुद शरद पवार के पास है. वे छह साल का पूरा कार्यकाल चाहते हैं ताकि दिल्ली की राजनीति में अपनी जड़ें मजबूती से जमा सकें.

क्या कहता है जीत का गणित?

राज्यसभा चुनाव का गणित थोड़ा पेचीदा होता है, लेकिन अगर आसान भाषा में समझें तो महाराष्ट्र में एक सीट जीतने के लिए एक खास कोटा पार करना होता है. महाराष्ट्र विधानसभा के 288 विधायकों और 2026 में खाली होने वाली 7 सीटों के हिसाब से देखें तो जीत का नंबर 37 बैठता है. यानी किसी भी उम्मीदवार को दिल्ली जाने के लिए कम से कम 37 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी.

आंकड़ों को देखें तो सत्तारूढ़ गठबंधन (महायुति) बेहद मजबूत स्थिति में है. बीजेपी के पास 135 और शिवसेना के पास 57 विधायक हैं. वहीं, एनसीपी के अपने 41 विधायक हैं. गणित साफ है—एनसीपी अकेले अपने दम पर पार्थ पवार जैसे किसी भी उम्मीदवार को राज्यसभा भेजने की ताकत रखती है.

विरासत की जंग या पारिवारिक सुलह?

अब सब कुछ शरद पवार के फैसले पर टिका है. क्या शरद पवार अपनी विरासत की कमान पार्थ के हाथों में सौंपकर उन्हें आशीर्वाद देंगे? या फिर अजित पवार के जाने के बाद भी दोनों गुटों के बीच सत्ता का यह संघर्ष जारी रहेगा? महाराष्ट्र की जनता और राजनीतिक पंडितों की नजर अब इसी बात पर है कि बारामती की इस बैठक से जो धुआं उठा है, वो आने वाले दिनों में क्या रंग लाता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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